भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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सर्ग ९ ] उत्तरकाण्ड ३७९

ज्ञात्वा तेषां मनोदाढर्यं कालस्य वचनं तथा ॥१४॥ भक्तं पौरजनं चैव बाढमित्याह राघवः । कृत्वैवं निश्चयं रामस्तस्मिन्नेवाहनि प्रभुः ॥१५॥ अस्थापयामास च तौ रामभद्रः कुशीलवौ । अष्टौ रथसहस्राणि सहस्रं चैव दन्तिनाम् ॥१६॥ षष्टिं चाश्वसहस्राणामेकैकस्मै ददौ बलम् । बहुरत्नों बहुधनौ हृष्टपुष्टजनावृतौ ॥१७॥ अभिवाद्य गतौ रामं कृच्छ्रेण तु कुशीलवौ । शत्रुघ्नानयने दूतान्प्रेषयामास राघवः ॥१८॥ ते दूतास्त्वरितं गत्वा शत्रुघ्नाय न्यवेदयन् । कालस्यागमनं पश्चादत्रिपूत्रस्य चेष्टितम् ॥१९॥ लक्ष्मणस्य च निर्याणं प्रतिज्ञां राघवस्य च । पुत्राभिषेचनं चैव सर्वं रामचिकीर्षितम् ॥२०॥ श्रुत्वा तद्भूतवचनं शत्रुघ्नः कुलनाशनम् । व्यथितोऽपि धृतिं लब्ध्वा पुत्रावाहूय सत्वरः । अभिषिच्य सुबाहुं वै मथुरायां महाबलः ॥२१॥ यूपकेतुं च विदिशानगरे शत्रुसूदनः । अयोध्यां त्वरितं प्रागात्स्वयं रामदिदृक्षया ॥२२॥ ददर्श च महात्मानं तेजसा ज्वलनप्रभम् । दुकूलयुगसंवीतं ऋषिभिश्चाक्षयैर्वृतम् ॥२३॥ अभिवाद्य रमानांथं शत्रुघ्नो रघुपूङ्गवम् । प्राञ्जलिर्धर्मसहितं वाक्यं प्राह महामतिः ॥२४॥ अभिषिच्य सुतौ तत्र राज्ये राजीवलोचन । तवानुगमने राजन्विद्धि मां कृतनिश्चयम् ॥२५॥ त्यक्तुं नार्हसि मां वीर भक्तं तव विशेषतः । शत्रुघ्नस्य दृढां बुद्धिं विज्ञाय रघुनन्दनः ॥२६॥ सज्जीभवतु मध्याह्ने भवानित्यब्रवीद्वचः । अथ क्षणात्समुत्पेतुर्वानराः कामरूपिणः ॥२७॥ ऋक्षाश्च राक्षसाश्चैव गोपुच्छाश्च सहस्रशः । ऋषीणां देवतानां च पुत्रा रामस्य निर्गमम् ॥२८॥

भी जायें अब हम स्त्री-पुत्रादिके सहित सर्वथा आपका ही अनुसरण करेंगे ।" तब रघुनाथजीने उनके मन की दृढता और कालका वचन समझकर उन भक्त पुरवासियोंसे 'बहुत अच्छा, ऐसा ही करो' यह कह दिया । फिर, ऐसा निश्चय कर प्रभु रामने उसी दिन कुश और लवको (अपने-अपने राज्यपर) भेजा । उनमेंसे प्रत्येकको आठ हजार रथ, एक हजार हाथी और साठ हजार घोड़े दिये तथा बहुत-से रत्न, धन और हृष्ट-पुष्ट मनुष्योंको साथ कर दिया ॥१३-१७॥ कुश और लव रामजीको प्रणाम करके बड़ी कठिनतासे चले । इसी समय रघुनाथजीने शत्रुघ्नजीको लानेके लिये दूत भेजे ॥१८॥

उन दूतोंने तुरन्त ही जाकर कालका आगमन, दुर्वासा- जीकी करतूत, लक्ष्मणजीका महाप्रयाण, रघुनाथजीकी प्रतिज्ञा, पुत्रोंका अभिषेक और अब राम क्या करना चाहते हैं- ये सब समाचार शत्रुघ्नजीसे निवेदन कर दिये ॥१९-२०॥ इस प्रकार दूतोंके मुखसे अपने कुलके नाशका समाचार सुनकर शत्रुघ्नजी अति व्याकुल हुए, किन्तु फिर धैर्य धारण कर तुरन्त ही अपने दोनों पुत्रोंको बुलाया; और उनमेंसे महाबली सुबाहुं- को मथुराके और यूपकेतुको विदिशा नगरीके राज्य- पर अभिषिक्त कर स्वयं बड़ी शीघ्रतासे रघुनाथेजीके दर्शनके लिये अयोध्याको चले ॥ २१-२२ ॥

वहाँ पहुँचनेपर उन्होंने अपने तेजसे अग्निके समान देदीप्यमान महात्मा रामको दो वस्त्र धारण किये और चिरजीवी ऋषियोंसे घिरे हुए देखा ॥२३॥ महामति शत्रुघ्नजीने लक्ष्मीपति श्रीरघुनाथजीको प्रणाम किया और फिर हाथ जोड़कर ये धर्मयुक्त वाक्य कहे-॥२४॥ "हे कमलनयन ! मैं अपने राज्यपर दोनों पुत्रोंका अभिषेक कर आया हूँ; हे राजन् ! अब मैंने भी आपही- का अनुगमन करनेका निश्चय कर लिया है- ऐसा आप जानें ॥२५॥ हे वीर ! मैं आपका भक्त हूँ, अतः आपको मुझे छोड़ना न चाहिये ।" शत्रुघ्नका दृढ़ निश्चय जान श्रीरघुनाथजीने कहा-'तुम आज दोपहरके समय तैयार रहो ।'

इसी समय इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले वानर, रीछ, राक्षस और गोपुच्छ वानर हजारोंकी संख्यामें आ कूदे, तथा ऋषि और देवताओंके पुत्ररूप वे समस्त वानर और राक्षसगण रघुनाथजीका निर्याण