भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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३८०अध्यात्मरामायण[ सर्ग ९

श्रुत्वा प्रोचु रघूश्रेष्ठं सर्वे वानरराक्षसाः ।
तवानुगमने विद्धि निश्चिताथीन्न्र्हिनः प्रभो ॥२९॥
एतस्मिन्नन्तरे रामं सुग्रीवोऽपि महाबलः ।
यथावदभिवाद्याह राघवं भक्तवत्सलम् ॥३०॥
अभिषिच्याङ्गदं राज्ये आगतोऽस्मि महाबलम् ।
तवानुगमने राम विद्धि मां कृतनिश्चयम् ॥३१॥
श्रुत्वा तेषां दृढं वाक्यं ऋक्षवानररक्षसाम् ।
विभीषणमुवाचेदं वचनं मृदु सादरम् ॥३२॥
धरिष्यति धरा यावत्प्रजास्तावत्प्रशाधि मे ।
वचनाद्राक्षसं राज्यं शापितोऽसि ममोपरि ॥३३॥
न किंचिदुत्तरं वाच्यं त्वया मत्कृतकारणात् ।
एवं विभीषणं तूक्त्वा हनूमन्तमथाब्रवीत् ॥३४॥
मारुते त्वं चिरञ्जीव ममाज्ञां मा मृषा कृथाः ।
जाम्बवन्तमथ प्राह तिष्ठ त्वं द्वापरान्तरे ॥३५॥
मया सार्धं भवेद्युद्धं यत्किञ्चित्कारणान्तरे ।
ततस्तान् राघवः प्राह ऋक्षराक्षसवानरान् ।
सर्वानैव मया सार्धं प्रयातेति दयान्वितः ॥३६॥
उतः प्रयाते रघुवंशनाथो
विशालवक्षाः सितकञ्जनेत्रः ।
पुरोधसं प्राह वसिष्ठमार्यं
यान्त्वग्निहोत्राणि पुरो गुरो मे ॥३७॥
ततो वसिष्ठोऽपि चकार सर्वं
प्रास्थानिकं कर्म महद्विधानात् ।
क्षौमाम्बरो दर्भपवित्रपाणि-
र्महाप्रयाणाय गृहीतबुद्धिः ॥३८॥
निष्क्रम्य रामो नगरात्सिताभ्रा-
च्छशीव यातः शशिकोटिकान्तिः ।
रामस्य सव्ये सितपद्महस्ता
पद्मा गता पद्मविशालनेत्रा ॥३९॥
पार्श्वेऽथ दक्षेऽरुणकञ्जहस्ता
श्यामा ययौ भूरपि दीप्यमाना ।


[हिन्दी अनुवाद]

सुनकर उनसे कहने लगे—"प्रभो ! आप हमें भी अपने पीछे चलनेके लिये कटिबद्ध समझें" ॥२६—२९॥
इतनेहीमें महाबली सुग्रीवने भी यथावत् प्रणाम करके भक्तवत्सल रघुनाथजीसे कहा—॥३०॥ "हे राम ! मैं महाबली अंगदको राजतिलक कर आपके साथ चलने का निश्चय करके आया हूँ—ऐसा आप जानें" ॥३१॥

तब उन रीछ, वानर और राक्षसोंके ऐसे दृढ़ वाक्य सुनकर श्रीरघुनाथजीने विभीषणसे आदरपूर्वक इस प्रकार मधुर वचन कहा—॥३२॥ "मैं तुम्हें अपनी शपथ कराता हूँ, जबतक पृथिवी प्रजा धारण करे तबतक मेरे कहने- से तुम राक्षसोंका राज्य करो ॥३३॥ तुम मेरे लिये ऐसा करो, अब इस विषयमें कुछ और उत्तर न देना।
विभीषणसे इस प्रकार कह फिर वे हनुमान्जीसे बोले—॥३४॥ "हे मारुते ! तुम चिरकालतक जीवित रहो, मेरी (पूर्व) आज्ञाको मिथ्या मत करो।" फिर जाम्बवान्‌से कहा—"तुम द्वापरके अन्ततक रहो ॥३५॥ किसी कारणवश मेरे साथ तुम्हारा युद्ध होगा।" फिर श्रीरघुनाथजीने शेष सब रीछ, वानर और राक्षसोंसे दयापूर्वक कहा—"तुम सब लोग मेरे साथ चलो" ॥३६॥

दूसरे दिन सबेरे ही विशालहृदय कमलनयन भगवान् रामने पूज्य पुरोहित वसिष्ठजीसे कहा—"हे गुरो ! मेरे आगे अग्निहोत्रकी आहवनीयादि अग्नियाँ चलें" ॥३७॥ तब वसिष्ठजीने बड़े विधिपूर्वक समस्त प्रास्थानिक कर्म किये। उस समय करोड़ों चन्द्रमाओं- के समान कान्तिमान् भगवान् राम रेशमी वस्त्र धारण किये, कुशाकी पवित्री हाथमें पहने तथा महाप्रयाणमें चित्त लगाये नगरसे इस प्रकार निकले जैसे श्वेत बादलोंमेंसे चन्द्रमा निकलता हो। उनके बायीं ओर हाथमें श्वेत कमल लिये कमलके समान विशाल नेत्रवाली लक्ष्मीजी चलीं ॥३८-३९॥ तथा दायीं ओर हाथमें लाल कमल लिये अत्यन्त दीप्तिशालिनी श्यामवर्णा पृथिवी