अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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| ३८२ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ९ |
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| अथागतस्तत्र पितामहो महान्<br>देवाश्च सर्वे ऋषयश्च सिद्धाः ।<br>विमानकोटीभिरपारपारं<br>समावृतं खं सुरसेविताभिः ॥४९॥<br>रविप्रकाशाभिरभिस्फुरत्स्वं<br>ज्योतिर्मयं तत्र नभो बभूव ।<br>स्वयंप्रकाशैर्महतां महद्भिः<br>समावृतं पुण्यकृतां वरिष्ठैः ॥५०॥ | इसी समय, वहाँ पितामह ब्रह्माजी तथा अन्य समस्त देवता, ऋषि और सिद्धगण आये । उस समय जिनमें देवगण विराजमान थे ऐसे सूर्यके समान तेजस्वी करोड़ों विमानोंसे अनन्तपार आकाश खचाखच भर गया । (उनके प्रकाशसे) प्रज्वलित होकर वह स्वयं भी देदीप्यमान हो उठा । (इनके अतिरिक्त पुण्यलोकोंसे आये हुए) पुण्यवानोंमें श्रेष्ठ तथा महात्माओंमें महान् स्वयंप्रकाशमय दिव्य पुरुषोंसे भी आकाश मानो ढँक गया ॥४९-५०॥ |
| ववुश्च वाताश्च सुगन्धवन्तो<br>ववर्ष वृष्टिः कुसुमावलीनाम् ।<br>उपस्थिते देवमृदङ्गनादे<br>गायत्सु विद्याधरकिन्नरेषु ॥५१॥<br>रामस्तु पद्भ्यां सरयूजलं सकृ-<br>त्स्पृष्ट्वा परिक्रामदनन्तशक्तिः ॥५२॥ | उस समय सुगन्धमय वायु चलने लगा और कुसुमसमूहोंकी (निरन्तर) वर्षा होने लगी । तब देवताओंका मृदंगनाद और विद्याधर तथा किन्नरोंका गान होते हुए अनन्तशक्ति भगवान् रामने एक बार सरयूजलका स्पर्श (आचमन) कर चरणोंसे उसकी परिक्रमा की ॥ ५१-५२ ॥ |
| ब्रह्मा तदा प्राह कृताञ्जलिस्तं<br>रामं परात्मन् परमेश्वरस्त्वम् ।<br>विष्णुः सदानन्दमयोऽसि पूर्णो<br>जानासि तत्त्वं निजमैशमेकम् ।<br>तथापि दासस्य ममाखिलेश<br>कृतं वचो भक्तपरोऽसि विद्वन् ॥५३॥ | उस समय,ब्रह्माजी हाथ जोड़कर भगवान् रामसे कहने लगे—"हे परमात्मन् ! आप सबके स्वामी, नित्यानन्दमय, सर्वत्र परिपूर्ण और साक्षात् विष्णुभगवान् हैं। अपने एकमात्र ईश्वरीय तत्त्वको आप ही जानते हैं। तथापि हे अखिलेश्वर ! आपने मुझ दासका निवेदन पूर्ण कर दिया, (सो ठीक ही है, क्योंकि) हे विद्वन् ! आप भक्तवत्सल हैं॥ ५३ ॥ |
| त्वं भ्रातृभिर्वैष्णवमेवमाद्यं<br>प्रविश्य देहं परिपाहि देवान् ।<br>यद्वा परो वा यदि रोचते तं<br>प्रविश्य देहं परिपाहि नस्त्वम् ॥५४॥ | हे प्रभो ! अब आप भाइयोंसहित अपने आदिविग्रह विष्णुदेहमें प्रविष्ट होकर देवताओंकी रक्षा कीजिये, अथवा यदि आपको कोई और शरीर प्रिय हो तो उसीमें प्रवेश करके हम सबका पालन कीजिये ॥ ५४ ॥ |
| त्वमेव देवाधिपतिश्च विष्णु-<br>र्जानान्ति न त्वां पुरुषा विना माम् ।<br>सहस्रकृत्वस्तु नमो नमस्ते<br>प्रसीद देवेश पुनर्नमस्ते ॥५५॥ | आप ही देवाधिपति विष्णुभगवान् हैं। इस बातको मेरे सिवा और कोई पुरुष नहीं जानता। हे देवेश ! आपको हजारों बार नमस्कार है, आप प्रसन्न होइये, आपको पुनः-पुनः नमस्कार है" ॥ ५५ ॥ |
| पितामहप्रार्थनया स रामः<br>पश्यत्सु देवेषु महाप्रकाशः ।<br>मुष्णंश्च चक्षूंषि दिवौकसां तदा<br>बभूव चक्रादियुतश्चतुर्भुजः ॥५६॥ | तब पितामह ब्रह्माजीकी प्रार्थनासे महातेजोमय भगवान् राम सब देवताओंके देखते-देखते उनकी दृष्टिको चुराते हुए चक्रादि आयुधोंसे युक्त चतुर्भुजरूप हो गये ॥ ५६ ॥ लक्ष्मणजी अद्भुत फणा धारण कर भगवान्- |