भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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सर्ग ९] उत्तरकाण्ड ३८३


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
शेषो बभूवेश्वरतल्पभूतः<br>सौमित्रिरत्यद्भुतभोगधारी ।<br>बभूवतुश्चक्रदरौ च दिव्यौ<br>कैकेयिसूनुर्लवणान्तकश्च ॥५७॥की शय्यारूप शेषनाग हो गये, तथा कैकेयीपुत्र भरत और लवणान्तक शत्रुघ्न दिव्य चक्र और शंख हो गये ॥ ५७ ॥
सीता च लक्ष्मीर्भवत्पुरैव<br>रामो हि विष्णुः पुरुषः पुराणः ।<br>सहानुजः पूर्वशरीरकेण<br>बभूव तेजोमयदिव्यमूर्तिः ॥५८॥सीताजी तो पहले ही लक्ष्मीजी हो गयी थीं। भगवान् राम पुराणपुरुष विष्णुभगवान् ही हैं। वे भाइयोंके सहित अपने पूर्व-शरीरसे तेजोमय दिव्य-स्वरूपवाले हो गये ॥ ५८ ॥
विष्णुं समासाद्य सुरेन्द्रमुख्या<br>देवाश्च सिद्धा मुनयश्च यक्षाः ।<br>पितामहाद्याः परितः परेशं<br>स्तवैर्गृणन्तः परिपूजयन्तः ॥५९॥<br>आनन्दसम्प्लावितपूर्णचित्ता<br>बभूविरे प्राप्तमनोरथास्ते ।<br>तदाह विष्णुर्द्रुहिणं महात्मा<br>एते हि भक्ता मयि चानुरक्ताः ॥६०॥फिर उन विष्णुभगवान्‌के पास चारों ओरसे इन्द्रादि देवता, सिद्ध, मुनि, यक्ष और ब्रह्मा आदि प्रजापतिगण आकर उन परमेश्वरकी स्तोत्रोंद्वारा स्तुति करते हुए पूजा करने लगे और अपना मनोरथ पूर्ण हो जानेसे मन-ही-मन आनन्दमग्न हो गये। तब महात्मा विष्णुभगवान्‌ने ब्रह्माजीसे कहा—"ये सब मेरे भक्त और मुझमें प्रीति रखनेवाले हैं ॥ ५९-६० ॥
यान्तं दिवं मामनुयान्ति सर्वे<br>तिर्यक्शरीरा अपि पुण्ययुक्ताः ।<br>वैकुण्ठसाम्यं परमं प्रयान्तु<br>समाविशस्वाशु ममाज्ञया त्वम् ॥६१॥मेरे साथ ये सब भी स्वर्गलोकको जाना चाहते हैं। इनमें जो तिर्यक्शरीरधारी हैं वे भी बड़े पुण्यात्मा हैं। ये सब वैकुण्ठके समान उत्तम लोकोंको प्राप्त हों; मेरी आज्ञासे तुम शीघ्र वहाँ इनका प्रवेश करा दो" ॥ ६१ ॥
श्रुत्वा हरेर्वाक्यमथाब्रवीत्कः<br>सान्तानिकान्यान्तु विचित्रभोगान् ।<br>लोकान्मदीयोपरि दीप्यमानां-<br>स्त्वद्भक्तियुक्ताः कृतपुण्यपुञ्जाः ॥६२॥भगवान्‌के ये वचन सुनकर ब्रह्माजीने कहा—"भगवन् ! आपकी भक्तिसे युक्त ये महापुण्यशाली लोग मेरे लोकसे भी ऊपर अत्यन्त दीप्तिशाली और विचित्र भोगोंसे सम्पन्न सान्तानिक लोकोंको प्राप्त हों ॥ ६२ ॥
ये चापि ते राम पवित्रनाम<br>गृणन्ति मर्त्या लयकाल एव ।<br>अज्ञानतो वापि भजन्तु लोकां-<br>स्तानेव योगैरपि चाधिगम्यान् ॥६३॥हे राम ! और भी जो लोग मरनेके समय ही आपका पवित्र नाम लेंगे अथवा जो भूलकर भी आपका भजन करेंगे वे भी योगियोंको प्राप्त होनेयोग्य उन्हीं लोकोंको जायेंगे" ॥ ६३ ॥
ततोऽतिहृष्टा हरिराक्षसाद्याः<br>स्पृष्ट्वा जलं त्यक्तकलेवरास्ते ।<br>प्रपेदिरे प्राक्तनमेव रूपं<br>यदंशजा ऋक्षहरीश्वरास्ते ॥६४॥यह सुनकर समस्त वानर और राक्षसादि अति प्रसन्न हुए और जलस्पर्श करके शरीर छोड़ने लगे। ये रीछ और वानर आदि जिस-जिसके अंशसे उत्पन्न हुए थे उस-उस देवताके पूर्वरूपको ही प्राप्त हो गये ॥ ६४ ॥
प्रभाकरं प्राप हरिप्रवीरः<br>सुग्रीव आदित्यजवीर्यवत्त्वात् ॥६५॥वानरराज सुग्रीव सूर्यके वीर्यसे उत्पन्न हुए थे अतः वे सूर्यमें लीन हो गये ॥ ६५ ॥ तदनन्तर