अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
DevanagariHindipublished423 पृष्ठ
पृष्ठ 416, कुल 423 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 416
सर्ग ९ ] उत्तरकाण्ड ३८५
| रामायणं जनमनोहरमादिकाव्यं<br>ब्रह्मादिभिः सुरवरैरपि संस्तुतं च।<br>श्रद्धान्वितः पठति यः शृणुयात्तु नित्यं<br>विष्णोः प्रयाति सदनं स विशुद्धदेहः॥७३॥ | ब्रह्मा आदि सुरश्रेष्ठोंसे प्रशंसित और मनुष्योंके मनको हरनेवाले इस आदिकाव्य रामायणको जो पुरुष नित्यप्रति श्रद्धापूर्वक पढ़ता या सुनता है वह विशुद्ध शरीर धारण कर भगवान् विष्णुके धामको प्राप्त होता है ॥ ७३ ॥ |
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
उत्तरकाण्डे नवमः सर्गः ॥९॥
समाप्तमिदमुत्तरकाण्डम्।
पार्वत्यै परमेश्वरेण गदिते ह्याध्यात्मरामायणे
काण्डैः सप्तभिरन्वितेऽतिशुभदे सर्गाश्चतुःषष्टिकाः।
श्लोकानान्तु शतद्वयेन सहितान्युक्तानि चत्वारि वै
साहस्राणि समासतः श्रुतिशतान्युक्तानि तत्त्वार्थतः॥
साक्षात् परमेश्वर (श्रीमहादेवजी) द्वारा पार्वतीजीके प्रति कहे हुए, सात काण्डोंसे युक्त इस शुभप्रद अध्यात्मरामायणमें चौंसठ सर्ग हैं। इसकी समाप्तिपर्यन्त कुल चार हजार दो सौ श्लोक कहे गये हैं तथा तत्त्वार्थका विवेचन करते हुए सैकड़ों श्रुतियाँ कही गयी हैं।
(समाप्त)