अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
DevanagariHindipublished423 पृष्ठ
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| ४८ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग २ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| मन्थरां प्रविशस्त्वादौ कैकेयीं च ततः परम् ॥४५॥<br>ततो विघ्ने समुत्पन्ने पुनरेहि दिवं शुभे ।<br>तथेत्युक्त्वा तथा चक्रे प्रविवेशाथ मन्थराम् ॥४६॥ | करो। प्रथम तो तुम मन्थरामें प्रवेश करना और फिर कैकेयीमें ॥ ४५ ॥ हे शुभे ! इस प्रकार विघ्न उपस्थित हो जानेपर तुम फिर स्वर्गलोकको लौट आना ।' इसपर सरस्वतीने 'बहुत अच्छा' कहकर वैसा ही किया और प्रथम मन्थरामें प्रवेश किया ॥ ४६ ॥ |
| सापि कुब्जा त्रिवक्रा तु प्रासादाग्रमथारुहत् ।<br>नगरं परितो दृष्ट्वा सर्वतः समलङ्कृतम् ॥४७॥<br>नानातोरणसम्बाधं पताकाभिरलङ्कृतम् ।<br>सर्वोत्सवसमायुक्तं विस्मिता पुनरागमत् ॥४८॥ | तब तीन स्थानसे टेढ़ी वह कुबड़ी मन्थरा महलकी अट्टालिकापर चढ़ी और उसने देखा कि नगर सब ओरसे सजाया गया है ॥ ४७ ॥ उसमें नाना प्रकारकी बन्दनवारें बँधी हुई हैं, चित्र-विचित्र पताकाएं सुशोभित हो रही हैं और सब ओर उत्सव हो रहे हैं । यह देखकर वह अत्यन्त विस्मिता हो नीचे उतर आयी ॥ ४८ ॥ |
| धात्रीं पप्रच्छ मात: किं नगरं समलङ्कृतम् ।<br>नानोत्सवसमायुक्ता कौसल्या चातिहर्षिता ॥४९॥<br>ददाति विप्रमुख्येभ्यो वस्त्राणि विविधानि च ।<br>तामुवाच तदा धात्री रामचन्द्राभिषेचनम् ॥५०॥<br>श्वो भविष्यति तेनाद्य सर्वतोऽलङ्कृतं पुरम् ।<br>तच्छ्रुत्वा त्वरितं गत्वा कैकेयीं वाक्यमब्रवीत् ॥५१॥ | और धायसे पूछा--- "मैया ! आज नगर क्यों सजाया गया है और महारानी कौसल्या भी नाना प्रकारसे उत्सव मनाती हुई अत्यन्त हर्षपूर्वक ब्राह्मणोंको विविध वस्त्राभूषण क्यों दे रही हैं ?" तब धायने उससे कहा- "कल श्रीरामजीका राज्याभिषेक होगा, इसलिये आज सब ओरसे नगर सजाया गया है ।" यह सुनते ही उसने तुरन्त ही कैकेयीके पास जाकर कहा ॥ ४९-५१ ॥ |
| पर्यङ्कस्थां विशालाक्षीमेकान्ते पर्यवस्थिताम् ।<br>किं शेषे दुर्भगे मूढे महद्भयमुपस्थितम् ॥५२॥<br>न जानीषेऽतिसौन्दर्यमानिनी मत्तगामिनी ॥५३॥<br>रामस्यानुग्रहाद्राज्ञः श्वोऽभिषेको भविष्यति । | विशालाक्षी कैकेयी उस समय एकान्तमें पलंगपर बैठी थी, उससे मन्थरा बोली--- "अयि अभागिनि मूढ़े ! कैसे सो रही हो, तुम्हारे लिये बड़ा भारी संकट उपस्थित हुआ है ॥ ५२ ॥ हे मत्तवाली चालवाली ! तुम्हें अपनी सुन्दरताका बड़ा घमण्ड है, इसलिये तुम्हें किसी बातका पता ही नहीं रहता ॥ ५३ ॥ देखो, महाराजकी कृपासे कल रामका राज्याभिषेक होनेवाला है ।" |
| तच्छ्रुत्वा सहसोत्थाय कैकेयी प्रियवादिनी ॥५४॥<br>तस्यै दिव्यं ददौ स्वर्णनूपुरं रत्नभूषितम् ।<br>हर्षस्थाने किमिति मे कथ्यते भयमागतम् ॥५५॥<br>भरतादधिको रामः प्रियकृन्मे प्रियंवदः ।<br>कौसल्यां मां समं पश्यन् सदा शुश्रूषते हि माम् ५६<br>रामाद्भयं किमापन्नं तव मूढे वदस्व मे । | यह सुनकर प्रियवादिनी कैकेयी सहसा उठ खड़ी हुई ॥ ५४ ॥ और उसे अति दिव्य रत्नजटित सुवर्णनूपुर देकर कहा, "अरी ! यह तो बड़े आनन्दकी बात है, इसमें तू संकट उपस्थित हुआ कैसे बतलाती है ? ॥ ५५ ॥ राम तो भरतकी अपेक्षा मेरा अधिक प्रिय करनेवाला और मधुरभाषी है, वह तो कौसल्या तथा मुझे समान भावसे देखता हुआ सदा ही मेरी सेवा किया करता है ॥ ५६ ॥ अरी मूर्खे ! तू यह तो बता कि तुझे रामसे क्या भय उपस्थित हुआ है ?" |
| तच्छ्रुत्वा विषसादाथ कुब्जाऽकारणवैरिणी ॥५७॥<br>शृणु मद्बचनं देवि यथार्थं ते महद्भयम् । | यह सुनकर बिना कारण वैर करनेवाली मन्थरा विषाद करने लगी ॥ ५७ ॥ और बोली, "देवि ! |