अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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सर्ग २ ] अयोध्याकाण्ड ४९
| त्वां तोषयन् सदा राजा प्रियवाक्यान भापते ॥५८॥<br>कामुकोऽतथ्यवादी च त्वां वाचा परितोषयन् ।<br>कार्यं करोति तस्या वै राममातुः सुपुष्कलम् ॥५९॥<br>मनस्येतन्निधायैव प्रेषयामास ते सुतम् ।<br>भरतं मातुलकुले प्रेषयामास सानुजम् ॥६०॥<br>सुमित्रायाः समीचीनं भविष्यति न संशयः ।<br>लक्ष्मणो राममन्वेति राज्यं सोऽनुभविष्यति ॥६१॥<br>भरतो राघवस्याग्रे किङ्करो वा भविष्यति ।<br>विवास्यते वा नगरात्प्राणैर्वा हाप्यतेऽचिरात् ॥६२॥<br>त्वं तु दासीव कौसल्यां नित्यं परिचरिष्यसि ।<br>ततोऽपि मरणं श्रेयो यत्सपल्याः पराभवः ॥६३॥<br>अतः शीघ्रं यतस्वाद्य भरतस्याभिषेचने ।<br>रामस्य वनवासार्थं वर्षाणि नव पञ्च च ॥६४॥<br>ततो रूढोऽभये पुत्रस्तव राज्ञि भविष्यति ।<br>उपायं ते प्रवक्ष्यामि पूर्वमेव सुनिश्चितम् ॥६५॥<br>पुरा देवासुरे युद्धे राजा दशरथः स्वयम् ।<br>इन्द्रेण याचितो धन्वी सहाय्यार्थं महारथः ॥६६॥<br>जगाम सेनया सार्धं त्वया सह शुभानने ।<br>युद्धं प्रकुर्वतस्तस्य राक्षसैः सह धन्विनः ॥६७॥<br>तदाक्षकीलो न्यपतच्छिन्नस्तस्य न वेद सः ।<br>त्वं तु हस्तं समावेश्य कीलरन्ध्रेऽतिधैर्यतः ॥६८॥<br>स्थितवत्यसितापाङ्गि पतिप्राणपरीप्सया ।<br>ततो हत्वाऽसुरान्सर्वान् ददर्श त्वामरिन्दमः ॥६९॥<br>आश्चर्यं परमं लेभे त्वामालिङ्ग्य मुदान्वितः ।<br>वृणीष्व यत्ते मनसि वाञ्छितं वरदोस्म्यहम् ॥७०॥<br>वरद्वयं वृणीष्व त्वमेवं राजाऽवदत्स्वयम् ।<br>त्वयोक्तो वरदो राजन्यदि दत्तं वरद्वयम् ॥७१॥ | मेरी बात सुनो, वास्तवमें तुम्हारे लिये बड़ा संकट उपस्थित हुआ है । राजा तुम्हें सन्तुष्ट करनेके लिये ही सदा चिकनी-चुपड़ी बातें बना दिया करते हैं ॥ ५८ ॥ वे बड़े कामी और मिथ्यावादी हैं; तुम्हें इस प्रकार केवल बातोंसे ही बहलाकर रामकी माताका ही पूरा-पूरा कार्य किया करते हैं ॥ ५९ ॥ अपने मनमें यही ठानकर उन्होंने छोटे भाई शत्रुघ्नके सहित तुम्हारे पुत्र भरतको ननिहाल भेज दिया है ॥ ६० ॥ इसमें सुमित्राके लिये तो निस्सन्देह सब कुछ ठीक ही होगा, क्योंकि लक्ष्मण रामके अनुगामी हैं इसलिये वे तो राज्य ही भोगेंगे ॥ ६१ ॥ किन्तु भरतको या तो रामका दास होकर रहना पड़ेगा या उन्हें शीघ्र ही नगरसे निकाल दिया जायगा अथवा उनका प्राणाघात किया जायगा ॥ ६२ ॥ और तुम्हें दासीके समान सदा कौसल्याकी सेवा करनी पड़ेगी । इस प्रकार सौतसे अपमानित होकर रहनेकी अपेक्षा तो मरना ही अच्छा है ॥ ६३ ॥ इसलिये अब तुम शीघ्र ही भरतके राज्याभिषेक और रामके चौदह वर्षतक वनवासके लिये प्रयत्न करो ॥ ६४ ॥ हे रानी ! ऐसा होनेपर तुम्हारे पुत्र भरत निर्भय और निष्कण्टक हो जायेंगे। इसके लिये मैंने जो पहलेसे ही सोच रक्खा है वह उपाय तुम्हें बताती हूँ ॥ ६५ ॥ पूर्वकालमें देवासुर-संग्रामके समय स्वयं इन्द्रने धनुर्धर महारथी राजा दशरथसे सहायताके लिये प्रार्थना की थी ॥ ६६ ॥ हे सुमुखि ! उस समय सेनाके सहित वे तुम्हें साथ लेकर वहाँ गये थे। जिस समय धनुर्धर महाराज दशरथ राक्षसोंसे युद्ध करनेमें निमग्न थे उस समय उनके बिना जाने रथकी धुरीकी कील निकलकर गिर गयी, तब अत्यन्त धैर्यपूर्वक तुमने अपना हाथ उस कीलके छिद्रमें लगा दिया ॥ ६७-६८ ॥ और हे कृष्णाक्षि ! पतिकी प्राणरक्षाके लिये तुम बहुत देरतक इसी स्थितिमें रही। तदनन्तर समस्त दैत्योंको मार चुकनेपर शत्रुदमन महाराज दशरथने तुम्हें देखा ॥ ६९ ॥ तुम्हें ऐसी स्थितिमें देखकर उन्हें अति आश्चर्य हुआ और अति प्रसन्नतासे तुम्हें गले लगाकर वे बोले- "मैं तुम्हें वर देना चाहता हूँ, तुम्हें जो इच्छा हो सो माँग लो ॥ ७० ॥ इस समय तुम. दो वर माँग सकती हो ।" राजाके इस प्रकार कहनेपर तुमने कहा- "राजन् ! यदि आप प्रसन्नतापूर्वक मुझे दो |
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