भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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५०अध्यात्मरामायण[ सर्ग २
मूल श्लोकहिन्दी अनुवाद
त्वय्येव तिष्ठतु चिरं न्यासभूतं ममानघ ।<br>यदा मेऽवसरो भूयात्तदा देहि वरद्वयम् ॥७२॥<br>तथेत्युक्त्वा स्वयं राजा मन्दिरं व्रज सुव्रते ।<br>त्वत्तः श्रुतं मया पूर्वमिदानीं स्मृतिमागतम् ॥७३॥वर देना चाहते हैं ॥ ७१ ॥ तो हे अनघ ! मेरी यह धरोहर बहुत समयतक आप ही रखिये, जिस समय इनका अवसर आवे उस समय आप ये दोनों वर मुझे दे दीजियेगा' ॥ ७२ ॥ तब राजाने 'बहुत अच्छा' कहकर तुमसे कहा 'हे सुव्रते ! अब घर चलो।' महारानीजी ! यह सम्पूर्ण वृत्तान्त पहले तुम्हींसे मैंने सुना था, इस समय मुझे यह स्मरण हो आया है ॥ ७३ ॥
अतः शीघ्रं प्रविश्याद्य क्रोधागारं रुषान्विता ।<br>विमुच्य सर्वाभरणं सर्वतो विनिकीर्य च ।<br>भूमावेव शयाना त्वं तूष्णीमतिष्ठ भामिनि ॥७४॥<br>यावत्सत्यं प्रतिज्ञाय राजाऽभीष्टं करोति ते ।<br>श्रुत्वा त्रिवक्रयोक्तं तत्तदा केकयनन्दिनी ॥७५॥<br>तथ्यमेवाखिलं मेने दुःसङ्गाहितविभ्रमा ।<br>तामाह कैकेयी दुष्टा कुतस्ते बुद्धिरीदृशी ॥७६॥अतः हे भामिनि ! अब तुम शीघ्र ही रोषपूर्वक कोपभवनमें जाओ और अपने समस्त आभूषण उतारकर इधर-उधर बिखेर दो तथा जबतक सत्य प्रतिज्ञापूर्वक राजा तुम्हारा अभीष्ट कार्य करनेको तत्पर न हों तबतक चुपचाप पृथिवीपर पड़ी रहो ।”<br>त्रिवक्रा मन्थराकी ये बातें सुनकर दुःसंगवश बुद्धि भ्रष्ट हो जानेके कारण दुष्टा कैकेयीने उस समय उसका कथन सर्वथा ठीक मान लिया और उससे कहा—"तुझमें ऐसी बुद्धि कहाँसे आ गयी ? ॥७४—७६॥
एवं त्वां बुद्धिसम्पन्नां न जाने वक्रसुन्दरि ।<br>भरतो यदि राजा मे भविष्यति सुतः प्रियः ॥७७॥<br>ग्रामानू शतं प्रदास्यामि मम त्वं प्राणवल्लभा ।<br>इत्युक्त्वा कोपभवनं प्रविश्य सहसा रुषा ॥७८॥<br>विमुच्य सर्वाभरणं परिकीर्य समन्ततः ।<br>भूमौ शयाना मलिना मलिनाम्बरधारिणी ॥७९॥<br>प्रोवाच शृणु मे कुब्जे यावद्रामो वनं व्रजेत् ।<br>प्राणांस्त्यक्ष्येऽथ वा वक्रे शयिष्ये तावदेव हि ॥८०॥अरी बाँकी सुन्दरी ! मैं तुझे इतनी बुद्धिमती नहीं जानती थी ! यदि मेरा प्रिय पुत्र भरत राजा हो गया तो मैं तुझे सौ गाँव दूँगी; तू तो मुझे प्राणोंके समान प्यारी है ।” ऐसा कहकर कैकेयीने रोषपूर्वक कोपभवनमें प्रवेश किया ॥ ७७-७८ ॥ और अपने सब वस्त्राभूषण उतारकर इधर-उधर बिखेर दिये तथा मैले-कुचैले वस्त्र पहनकर अति मलिन दशामें पृथिवीमें पड़कर बोली, “अरी कुब्जे ! सुन, जबतक राम वनको न जायेंगे, प्राण भले ही छूट जायें, मैं इसी प्रकार पड़ी रहूँगी ” ॥ ७९-८० ॥
निश्चयं कुरु कल्याणि कल्याणं ते भविष्यति ।<br>इत्युक्त्वा प्रययौ कुब्जा गृहं साऽपि तथाऽकरोत् ॥तब कुब्जा यह समझाकर कि 'हे कल्याणि ! तुम निःसन्देह ऐसा ही करना, इससे अवश्य तुम्हारा कल्याण होगा'—अपने घर चली गयी और कैकेयीने भी वैसा ही किया ॥ ८१ ॥
धीरोऽत्यन्तदयान्वितोऽपि सुगुणा-<br>    चारान्वितो वाऽथवा<br>नीतिज्ञो विधिवाददेशिकपरो<br>    विद्याविवेकोऽथवा ।सच है, कोई पुरुष अत्यन्त धैर्यवान्, दयालु, सद्गुणी, सदाचारी, नीतिज्ञ, कर्त्तव्यनिष्ठ और गुरुका भक्त, अथवा विद्या-विवेक-सम्पन्न भी क्यों न हो यदि निरन्तर अत्यन्त पाप-बुद्धि दुष्ट पुरुषोंका संग करेगा तो अवश्य ही क्रमशः उन्हींकी