BharatKosha
Back to the archive

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय

Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished592 pages
Page 262Permalink

२४८ [ चौथी पञ्चिका जो पहल षडह का ठीक ठीक ज्ञान रखता है वह साल का भली भांति पार पा लेता है । इसी तरह जो दूसरे षडह का, तीसरे षडह का, चौथे षडह का और पांचवें षडह का ( षडह = षट् + अह = छः दिन । महीने के तीस दिन पाँच षडह में बंटे हुये हैं । ) ( १ ) १६—पहले षडह को करते हैं । छः दिन होते हैं और छः ऋतुयें । इस प्रकार ऋतुओं वाले साल को प्राप्त करते हैं और वर्ष की सभी ऋतुओं में प्रतिष्ठा लाभ करते हैं । दूसरे षडह को करते हैं । अब १२ दिन हुये । १२ मास होते हैं । इस प्रकार महीनों वाले साल को प्राप्त करते हैं और साल के सभी महीनों में प्रतिष्ठा लाभ करते हैं । तीसरे षडह को करते हैं । अब अठारह दिन हुये । यह हुये नौ के दूने । ९ प्राण हैं और नौ स्वर्ग लोक । प्राणों और स्वर्ग लोकों का लाभ करते हैं और प्राणों और स्वर्ग लोकों में प्रतिष्ठा लाभ करते हैं । चौथे षडह को करते हैं । अब २४ दिन हुये । २४ पाख हुये । पाख वाले वर्ष को प्राप्त करते हैं और वर्ष के सब पाखों में प्रतिष्ठा लाभ करते हैं । पाँचवें षडह को करते हैं । तीस दिन हो गये । विराट् में तीस अक्षर होते हैं । विराट् अन्न है । इस प्रकार यह हर मास में विराट् (अन्न) का लाभ करते हैं । अन्न की कामना वालों ने सत्र किया । हर महीने विराट् ( तीस की संख्या ) को प्राप्त करके उन्होंने दोनों लोकों में अन्न प्राप्त कर लिया ! इस लोक में भी और उस लोक में भी ।(२) १७—"गवामयन" नामक ( गायों का भ्रमण ) कृत्य करते हैं । गौ आदित्य हैं । 'गवामयन' करने से 'आदित्य-अयन' हो जाता है ।

Page 263Permalink

तीसरा अध्याय ] २४६ गायों ने एक बार खुर और सींगों की अभिलाषा से सत्र किया । दस महीनों में उनके खुर और सींग निकल आये । उन्होंने कहा "जिस अभिलाषा से हम दीक्षित हुये वह पूरी होगी, अब उठें" । जब वे उठे, उस समय उनके सींग थे । लेकिन उन्होंने सोचा कि "वर्ष को समाप्त कर दें"। इसलिये फिर सत्र जारी रक्खा । उनकी अश्रद्धा के कारण उनके सींग जाते रहे और वे तूपर (डुंडे) रह गये । उन्होंने ऊर्ज प्राप्त किया । इसके बाद सब ऋतुओं को समाप्त करके वे उठे । चूँकि उन्होंने ऊर्ज पैदा किया इसलिये गायों को सब प्यार करते हैं और उनको सुन्दर (चारु) बनाते हैं । जो इस रहस्य को समझता है वह सब का प्यारा होता है और सौंदर्य को प्राप्त करता है । आदित्य और अंगिरा लड़ पड़े कि कौन स्वर्ग लोक में पहले पहुँचे । हर एक ने कहा, "हम पहले पहुँचेंगे । हम पहले पहुँचेंगे" । आदित्य पहले स्वर्गलोक में पहुँच गये । फिर साठ वर्ष पीछे अंगिरा । (गंवामयन और आदित्य-अयन में कई बातों में समानता है ) । पहले अतिरात्र होता है । फिर चौबीसवें दिन उक्थ्य । सब अभिप्लव षडह इसमें आ जाते हैं । दिनों का क्रम बदल जाता है । यह आदित्यों का अयन है । अतिरात्र पहले । चौबीसवें दिन उक्थ्य । पृष्ठियों के साथ अभिप्लव षडह । दिनों में कुछ अदल बदल । यह है अंगिरसों का अयन । यह जो अभिप्लव षडह है वह स्वर्ग लोक का सीधा मार्ग है । पृष्ठियों का षडह स्वर्ग लोक का महापथ है । जो अभिप्लव षडह और पृष्टि-षडह दोनों मार्गों का अवलम्बन करते हैं उनकी सभी कामनायें पूरी हो जाती हैं । और इनको कोई हानि नहीं पहुँचती । ( ३ ) १८—इक्कीसवीं करते हैं । इक्कीसवीं संवत्सर के बीच की

Page 264Permalink

२५० [ चौथी पञ्चिका विषुवत् रेखा है। इस इक्कीसवीं को करके देवों ने सूर्य्य को स्वर्ग में पहुँचा दिया। यह इक्कीसवीं जिस दिन दिवाकीर्त्य मंत्र (रचा गया) इसके पहले दस दिन होते हैं और पीछे दस दिन। बीच में यह होती है। इस प्रकार इसके दोनों ओर विराट् (दस संख्या वाले) होते हैं। इस प्रकार दोनों ओर विराट् से युक्त होकर यह (एकविंश अर्थात् सूर्य्य) इन लोकों के बीच में विघ्न को प्राप्त नहीं होता। देवों को डर लगा कि सूर्य कहीं स्वर्गलोक से गिर न जाय। इस लिए उन्होंने तीन लोकों को नीचे (खंभे के रूप में) लगा दिया। तीन स्तोम ही तीन स्वर्ग लोक हैं। उनको डर हुआ कि सूर्य्य ऊपर को न चला जाय। इस लिये उन्होंने उसके ऊपर तीन लोक लगा दिये। तीन स्तोम ही तीन स्वर्गलोक हैं। इस प्रकार (विषुवान् दिन से) पूर्व तीन सत्रह भागों वाले स्तोम होते हैं और पश्चात् तीन सत्रह भागों वाले स्तोम। बीच में इक्कीसवीं होती हैं। इसके इधर उधर "स्वरसाम" होते हैं। दोनों ओर से यह स्वरसामों से घिरा होता है इसलिये यह (सूर्य्य) इन लोकों के भ्रमण में विघ्न नहीं पाता। देव डर गये कि आदित्य स्वर्गलोक से गिर न पड़े। इस लिये उन्होंने तीन "परम स्वर्गलोकों" की टेक लगा दी। स्तोम परम स्वर्गलोक हैं। देव डर गये कि आदित्य कहीं ऊपर से लौट न जावे। इस लिये उन्होंने ऊपर से तीन "परम स्वर्गलोकों" की टेक लगा दी। स्तोम परम स्वर्गलोक हैं।

Page 265Permalink

·तीसरा अध्याय ] २५१ तीन सत्रह भागों वाले स्तोम पहले होते हैं और तीन सत्रह भागों वाले पीछे। अगर दो दो करके लिये जायँ तो चौंतीस हुये। स्तोमों में चौंतीसवां उत्तम या आखिरी है। सूर्य्य इन लोकों के बीच में अधिष्ठाता होकर तपता है। अपने इस पद के कारण वह भूत और भविष्यत् सभी चीजों में अच्छा है और उन सबसे अधिक चमकीला है। इस प्रकार विषुवान् अर्थात् इक्कीसवीं भी सब दिनों में श्रेष्ठ है। जो इस रहस्य को समझता है वह विभूषित होता है और इस लिये सबसे श्रेष्ठ होता है। (४) १९—अब स्वरसामों का कृत्य किया जाता है। यह लोक स्वरसाम हैं। इनको स्वरसाम इसलिए कहते हैं कि यजमानों ने इनके द्वारा इन लोकों को प्रसन्न किया। (स्पृण्वन्) ऻ। स्वरसाम करके वे (सूर्य्य को) इन लोकों में भाग दिलाते हैं। देवों को भय हुआ कि यह स्वरसामों के स्तोम सम होने के कारण और (अन्य स्तोमों द्वारा) सुरक्षित न होने के कारण गिर न पड़ें। उनको फिसलने से बचाने के लिए उन्होंने उनको नीचे से स्तोमों से और ऊपर से पृष्ठों से घेर दिया। इसीलिये (स्वर साम से पहले) "अभिजित्" दिन में सब स्तोम पढ़े जाते हैं और (स्वरसाम से बाद के दिन) "विश्वजित्" दिन में सब पृष्ठ पढ़े जाते हैं। सत्रह स्तोमों को स्तोमों और पृष्ठों से इसलिये घेर देते हैं कि वे ठहरे रहें और गिरने न पावें। देव डर गये कि सूर्य्य स्वर्गलोक से गिर न पड़े। इसलिए उन्होंने उसको पाँच रस्सियों से कस दिया। दिवाकीर्त्य साम ऻ'स्वरसाम' शब्द को "स्पृ" से कैसे बनाया और क्या अर्थ हुआ यह जान नहीं पड़ता।

Page 266Permalink

२५२ [ चौथी पञ्चिका रस्सियां हैं। इन्हीं में महादिवाकीर्त्य पृष्ठ हैं। अन्य साम हैं विकर्ण, ब्रह्म, भास और अग्निष्टोम । दोनों पवमान स्तोत्रों के लिए बृहत् और रथंतर होते हैं । इस प्रकार उन्होंने सूर्य्य को पाँच रस्सियों से तान कर ठहरा दिया और गिरने न दिया । सूर्य्य के उदय होने पर प्रातरनुवाक बोले । इस प्रकार यह सब स्तुतियां दिवाकीर्त्य ( दिन की ) हो जाती हैं। जिस सौर्य्य- पशु का सवन में आलभन किया जाय वह जहाँ तक मिले सफेद होना चाहिये। क्योंकि यह दिन सूर्य्य देवता का है। इक्कीस सामधेनियां बोले क्योंकि यह इक्कीसवीं है। ५१ वें या ५२ वें शस्त्र मंत्र को पढ़ने पर निविद रक्खे (ऋ० १।३२ इन्द्रस्य नु वीर्याणि आदि—पूरा सूक्त), फिर इतने ही मंत्र और पढ़े ( ५१ या ५२ ) इस प्रकार सौ से अधिक हो गये । मनुष्य का पूरा जीवन सौ साल का है। वह शत-वीर्य्य और शत-इन्द्रिय होता है। इस प्रकार होता यजमान को आयुष्मान्, वीर्य्यवान और इन्द्रियवान बना देता है। (५) २०—दूरॊहण का जाप करता है। मानो चढ़ता है। स्वर्ग लोग दूरारोहण है (क्योंकि कठिनता से चढ़ा जाता है)। जो इस रहस्य को समझता है वह स्वर्गलोक को चढ़ जाता है। दूरोहण शब्द का यह अर्थ है कि यह जो तपता है अर्थात् सूर्य्य यह कठिनता से चढ़ पाता है और जो कोई वहाँ जाना चाहे वह भी । दूरोहण का जाप कर के मानो वह सूर्य्य तक चढ़ जाता है। 'हंस' वाले मंत्र को पढ़ कर चढ़ता है :— हंसः शुचिषद वसुरंतरिक्षसद् होता वेदिषदतिथिर्दुरोण सत् । नृषद् वरसद्ऋतसद् व्योमसदब्जा गोजा ऋतजा अद्रिजा ऋतम् ॥ ( ऋ० ४।४०।५ )

Page 267Permalink

तीसरा अध्याय ] २५३ “हंसः शुचिषद्” ( प्रकाश में बैठने वाला हंस ) यह सूर्य्य है जो प्रकाश में बैठा हुआ है। “बसुरन्तरिक्ष सद्” वही अन्त- रिक्ष्न में बैठने वाला वसु है। वही “होता वेदिषद्” अर्थात् वेदी में बैठने वाला होता है। वही “अतिथिर्दुरोणसत्” अर्थात् घर में बैठने वाला अतिथि है। वही ‘नृषद्’ मनुष्यों में बैठने वाला है। “वरसद्” अच्छे स्थान पर बैठने वाला है। अर्थात् जिस स्थान् पर बैठ कर यह तपता है वह बहुत अच्छा स्थान है। “ऋतसद्” वह सचाई में बैठा हुआ है। “व्योमसद्” वह आकाश में बैठा हुआ तपता है। वह ‘अब्जा’ जल से उत्पन्न हुआ है। वह प्रातःकाल जलों में से निकलता है, और शाम को जलों में घुस जाता है। वह ‘गोजा’ गौओं से उत्पन्न हुआ। और ‘ऋतजा’ सत्य से उत्पन्न हुआ। ‘अद्रिजा’ पहाड़ से उत्पन्न हुआ है। ‘ऋत्’ अर्थात् सत्य है। सूर्य्य यह सब कुछ है। और यह मंत्र सूर्य्य का प्रत्यक्षतम रूप बतलाने वाला है। इसलिये जहाँ कहीं दूरोहण पढ़ा जाय ‘हंस’ वाले मंत्र के साथ पढ़ा जाय । ॐ ॐ दूरोहण का यह हंस वाला मंत्र सात बार पढ़ना चाहिये। इस प्रकार :- ( १ ) ‘शोंसावोम्’ कहने के पश्चात् पहले पद पद कर के। ( २ ) फिर आधा आधा मंत्र। ( ३ ) फिर तीन तीन पद मिला कर। ( ४ ) फिर पूरा मंत्र लगातार बिना ठहरे हुये। ( ५ ) फिर तीन तीन पद मिला कर। ( ७ ) फिर आधा आधा मंत्र। ( ७ ) फिर पद पद अलग करके। अन्त में ओम् कह कर समाप्त करे।

Page 268Permalink

१५४ [चौथी पञ्चिका स्वर्ग की इच्छा वाला तार्क्ष्य मंत्र से आरंभ करे :— त्यमूषु वाजिनं देवजूतं सहावानं तरुतारं रथानां । अरिष्टनेमि पृत- नाजमाशुं स्वस्तये तार्क्ष्यमिहा हुवेम ॥ (ऋ० १०।१७८।१) क्योंकि तार्क्ष्य ने मार्ग दिखाया था जब गायत्री सुपर्ण होकर सोम को लाई थी। जैसे कोई खेत जानने वाले को अपना अगुवा बनाले इसी प्रकार तार्क्ष्य मंत्र से ('दूरोहण' को) आरंभ करना है। तार्क्ष्य वह है जो बहता है ( पवन ) और स्वर्ग लोक को ले जाता है। ऊपर के मंत्र का अर्थ :— हम यहां स्वस्ति के लिये बुलावें ("देवजूतं वाजिनं") देव- ताओं से प्रेरित हुये घोड़े को जो ( सहावान ) मजबूत है। ( रथानां तरुतारं ) रथों में शीघ्र चलने वाला । ( अरिष्ट नेमि ) जिसकी नेमि अच्छी है, ( पृतनाजं ) जो लड़ाई में तीव्र है, ( तार्क्ष्य ) जो तेज है।" यह ( पवन ) देवजूत वाजी है। यह सहावान है। वह 'रथानां तरुतारं' है क्योंकि इन लोकों को शीघ्र ही पार कर जाता है, 'स्वस्तये' से होता अपना कल्याण चाहता है, 'इहा हुवेम' से होता उसका आह्वान करता है। इन्द्रस्येव रतिमाजोहुवानाः स्वस्तये नावमिवा रुहेम । उर्वी न पृथ्वी बहुले गभीरे मा वामेतौ मा परेतौ रिषाम ॥ (ऋ० १०।१७८।२) “इन्द्र के लिये जैसे उसी प्रकार 'तार्क्ष्य' के लिये बार-बार आहुति देते हुये हम नाव के समान चीजों में चढ़ें। पृथ्वी हमारे लिये विस्तृत हो, बहुत बड़े और गहरे तुम दोनों ( आकाश और पृथिवी ) में चलते हुये हम दुःख न उठावें।” 'स्वस्तये' शब्द से कल्याण चाहता है। 'नावमिवारुहेम' से वह तार्क्ष्य में चढ़ता है, स्वर्गलोक को प्राप्ति उसके भोग और वहां की संपत्ति के लिये। मंत्र के अन्तिम पद से तात्पर्य यह

Page 269Permalink

तीसरा अध्याय ] २६५ है कि हम आराम से यहाँ से जावें और आराम से लौट आवें । सद्यश्चिद्यः शवसा पंच कृष्टीः सूर्य इव ज्योतिषापस्ततान । सहस्रसाः शतसा अस्य रंहिर्न स्मा वरन्ते युवतिं न शर्याम् ॥ (ऋ० १०।१७८।३) जैसे सूर्य ज्योति से जलों को फैलाता है उसी प्रकार से ( तार्थ्य ) अपने बल से पांच लोकों को फौरन पार कर सकता है । इस हज़ारों और सैकड़ों शक्ति वाले ( तार्थ्य ) की चाल तेज बाण की चाल के समान है । (६) 'सूर्य इव' से प्रत्यक्ष रूप से सूर्य्य का अभिवादन करता हैं और मन्त्र के पिछले भाग से वह यजमान के लिये और अपने लिये कल्याण की प्रार्थना करता है । २१-आह्वाव के पश्चात् दूरोहण पढ़ता है । स्वर्गलोक दूरो- हण है । वाणी आह्वाव है । ब्रह्म वाणी है । इस प्रकार ब्रह्मरूपी आह्वाव के सहारे स्वर्गलोक का प्राप्त करता है। पहले पद पद करके पढ़ता है । ( दूरोहण का पढ़ना चढ़ने का प्रतिनिधि रूप है ) इस प्रकार इस लोक की प्राप्ति करता है। आधे-आधे मंत्र से अन्तरिक्ष को प्राप्त करता है । फिर तीन-तीन पदों को मिला कर पढ़ता है । इससे उस लोक को प्राप्त करता है, फिर कुल मन्त्र बिना ठहरे पढ़ता है । इस से वह सूर्य्यलोक में जगह पा लेता है । अब तीन-तीन पद मिला कर उतरता है जैसे वृक्षों की डाली पकड़ कर उतरते हैं । इससे वह उस लोक में प्रतिष्ठा पा लेता है । आधे-आधे मंत्र पर ठहर कर वह अन्तरिक्ष में स्थान पा लेता है । और पद-पद पर ठहर कर इस लोक में । इस प्रकार स्वर्गलोक में प्रतिष्ठा पाकर इस लोक में प्रतिष्ठा पाता हैं । जो केवल एक यानी स्वर्ग की ही कामना चाहें उनके लिये दूरोहण का पिछला भाग ( उतरने का भाग ) न पढ़ा जाय । इससे वे

Page 270Permalink

२५६ [ चौथी पञ्चिका स्वर्ग लोक को जीत लेंगे परन्तु इस लोक में देर तक न ठहर सकेंगे । त्रिष्टुभ् और जगती मिथुन के लिये मिला दिये जाते हैं, पशु मिथुन हैं, छन्द पशु हैं । पशुओं की प्राप्ति के लिये ऐसा किया जाता है । (७) २१—जैसे पुरुष होता है वैसे ही विषुवान् सत्र है । इसका पहला आधा दाहिने बाजू के समान है और पिछला आधा बायें बाजू के समान । इसीलिये ( विषुवान् के बाद के छः मास के कृत्य को ) उत्तर अर्थात् पिछला भाग कहते हैं । विषुवान् उस सिर के समान है जिसके दोनों बाजू बराबर हों । पुरुष टुकड़ों-टुकड़ों से बना है । इसलिये ही सिर के मध्य में एक जोड़ होता है । इस पर कहते हैं कि इस दिन विषुवत् का पाठ होना चाहिये । यह विषुवान् उक्थ्यों का उक्थ है । विषुवान् विषवान् ( भूमध्य रेखा ) के समान है । ऐसा करने से विषुवान् के समान हो जाता है और श्रेष्ठता को प्राप्त होता है । परन्तु इसको मानना नहीं चाहिये । साल भर तक इसका पाठ होना चाहिये । यह शस्त्र वीर्य है । ऐसा करने से यजमान साल भर तक वीर्यवान रहते हैं । जो बीज पाँच या छः मास में उग आवें वे यदि समय के पहले ही उग आवें तो उनको कोई भोग नहीं सकता । इसी तरह जो बीज दस मास में या एक साल में उत्पन्न होते हैं उनको भोगते हैं । इसलिये विषुवान् शस्त्र को साल भर पढ़ना चाहिये । यह संवत्सर ही है । जो इसको पाते हैं वह संवत्सर को प्राप्त करते हैं । इसके द्वारा साल भर के पाप नष्ट हो जाते हैं ।

Page 271Permalink

तीसरा अध्याय ] २५७ महीनों के सत्रों द्वारा यह अपने अंगों से पापों को दूर करता है। साल भर में विषुवान् शस्त्र के द्वारा वह अपने सिर से पाप दूर कर देता है। जो इस रहस्य को समझता है वह विष- वान् शस्त्र के द्वारा पापों से छूट ही जाता है। महाव्रत दिन को विश्वकर्मा के लिये एक बैल (वृषभ) का आलंभन करे। यह दोनों ओर दो रंगों का होना चाहिये। इन्द्र वृत्र को मार कर विश्वकर्मा हो गया। प्रजापति प्रजाओं को रच कर विश्वकर्मा हो गया। संवत्सर विश्वकर्मा है। इस प्रकार वे इन्द्र, अपने आत्मा, प्रजापति, संवत्सर और विश्वकर्मा को प्राप्त होते हैं। और इन्द्र में, अपने आत्मा में, प्रजापति में, संवत्सर में और विश्वकर्मा में प्रतिष्ठा प्राप्त करते हैं। जो इस रहस्य को समझता है उसकी प्रतिष्ठा होती है। (२२) ऐतरेय ब्राह्मण की चौथी पञ्चिका का तीसरा अध्याय समाप्त हुआ। १७

Page 272Permalink

चौथा अध्याय २३—प्रजापति ने चाहा कि मैं संतान उत्पन्न करके बहुत हो जाऊँ। उसने तप तपा। उसने तपों को तप कर उसने अपने अंगों और प्राणों में द्वादशाह को देखा। उसने अपने अंगों और प्राणों में से द्वादशाह को निकाला। और उसको बारह गुना कर दिया। उसको उसने ले लिया और उससे यज्ञ किया। तब वह प्रजापति हुआ। प्रजाओं और पशुओं द्वारा उत्पन्न हुआ। जो इस रहस्य को समझता है वह प्रजाओं और पशुओं द्वारा अपने आपको उत्पन्न करता है। उसने चाहा कि कैसे गायत्री द्वारा सब जगहों में द्वादशाह में समृद्धि को प्राप्त होऊँ। द्वादशाह के पूर्व में गायत्री तेज रूप में थी, मध्य में छन्दरूप में और अन्त में अक्षर रूप में। इस प्रकार द्वादशाह को गायत्री से व्यापक करके उसने समृद्धि प्राप्त की। जो इस रहस्य को समझता है वह सब समृद्धि को प्राप्त होता है। जो गायत्री को पंखों वाली, आँखों वाली, ज्योति वाली, प्रकाशवाली जानता है, वह पंखों वाली, आँखों वाली, ज्योति ( २५८ )

Page 273Permalink

चौथा अध्याय ] २५९ वाली और प्रकाश वाली गायत्री के द्वारा स्वर्ग को प्राप्त हो जाता है । यह जो द्वादशाह है वह पक्षिणी, चक्षुष्मती, ज्योतिष्मती और भास्वती गायत्री ही है। इसके दो जो अतिरात्र हैं वे दो पंख हैं । जो दो अग्निष्टोम हैं वे दो आँखें हैं । जो मध्य के आठ उक्थ्य हैं वे आत्मा हैं । जो इस रहस्य को समझता है वह पक्षवाली, चक्षुवाली, ज्योतिवाली और भास्वती गायत्री द्वारा स्वर्गलोक को जाता है । (१) २४—द्वादशाह में तीन त्र्यह ( त्रि = तीन, अह = दिन ) होते हैं ( इस प्रकार ९ हुये ) और एक दशवीं और दो अतिरात्र ( कुल १२ दिन हो गये ) । द्वादशाह ( बारह दिनों ) में दीक्षित होकर यज्ञिय ( यज्ञ करने योग्य ) बनता है । बारह रातों में उपसद् करता है । और इससे वह अपने शरीर को शुद्ध कर लेता है । जो इस रहस्य को समझ लेता है वह द्वादशाह में फिर उत्पन्न होकर और शरीर को शुद्ध करके शुद्ध और पवित्र होकर देवता में मिल जाता है । द्वादशाह ३६ दिन का होता है । बृहती में ३६ अक्षर होते हैं । द्वादशाह बृहती का अयन ( स्थान ) है । बृहती से दोनों ने इन (सब) लोकों को पाया । इससे यह लोक जीता, इससे अन्तरिक्ष, इससे द्यौलोक । चार से चार दिशा और दो से इस संसार में प्रतिष्ठा । जो यह रहस्य समझता है उसे प्रतिष्ठा प्राप्त होती है । इस प्रकार आक्षेप होता है कि इसको बृहतीं क्यों कहते हैं जब अन्य छन्द इससे बड़े हैं और प्रबल भी हैं । इसका उत्तर यह है कि इससे देवों ने सब लोकों को जीता था । दस अक्षर से यह लोक, दस से अन्तरिक्ष, दस से द्यौलोक, चार से चार

Page 274Permalink

२६० [चौथी पञ्चिका दिशा और दो से इस लोक में प्रतिष्ठा । जो इस रहस्य को समझता है वह इस बृहती के द्वारा अपनी सब कामनायें पूरी कर लेता है । (२) २५—यह जो द्वादशाह है वह प्रजापति यज्ञ है। प्रजापति ने पहले यही द्वादशाह यज्ञ किया था। उसने ऋतुओं और महीनों से कहा, "तुम मुझसे द्वादशाह कराओ।" उन्होंने उसे दीक्षा दी और परिक्रमा कराते हुये ऐसा कर दिया कि वहाँ से जाने न पावे । तब उससे कहा, "पहले हमको दिलवाओ । तब यज्ञ करायेंगे"। उसने उनको अन्न (इषं) और रस (ऊज) दिया । वही रस ऋतुओं और महीनों में निर्धारित है। उसने दिया तब उन्होंने यज्ञ कराया । इसलिए जो आदमी कुछ दे सकता है वही यज्ञ भी कर सकता है । उससे लेकर उन्होंने यज्ञ कराया । इसलिये लेकर ही यज्ञ कराना चाहिये । इस प्रकार दोनों समृद्धि को प्राप्त होते हैं, वह भी जो इस रहस्य को समझ कर दूसरों को यज्ञ कराते हैं और वह भी जो अपने लिये यज्ञ कराते हैं । ऋतुओं और महीनों ने द्वादशाह में दक्षिणा पाकर अपने को आभारी अनुभव किया (अर्थात् हमारे ऊपर बोझ चढ़ गया ) उन्होंने प्रजापति से कहा, "द्वादशाह यज्ञ हमको भी कराओ" । वह मान गया । उसने कहा, "दीक्षित हो" । पूर्वपक्षों (शुक्ल पक्ष) ने पहले दीक्षा ली और उनका पाप छूट गया । इस लिए वे दिन के समान रोशनी में रहते हैं। जिनका पाप छूट जाता है वह मानो रोशनी में ही रहते हैं । दूसरे पक्षों ने फिर दीक्षा ली । परन्तु वे सब पापों को न छोड़ सके । जिनके पाप नहीं छूटते वे अंधकार में रहते हैं । इस लिए जो इस रहस्य को समझता है उसे पहले दीक्षा

Page 275Permalink

चौथा अध्याय ] २६१ लेनी चाहिये और पहले पक्ष ( शुक्ल पक्ष ) में । जो इस रहस्य को समझता है वह पापों से छूट जाता है । यह प्रजापति ही था जो संवत्सर के रूप में, ऋतुओं और महीनों में व्यापक था । यह ऋतुयें और महीने प्रजापति संवत्सर में ही प्रतिष्ठित हैं। इस प्रकार यह एक दूसरे में प्रतिष्ठित हैं । जो द्वादशाह कराता है वह ऋत्विज् में प्रतिष्ठित होता है । इसीलिये ऋत्विज् लोग कहा करते हैं कि कोई पापी द्वादशाह कराने के योग्य नहीं है और न वह मुझमें प्रतिष्ठित हो सकता है । द्वादशाह ज्येष्ठ ( बड़े ) के लिये हैं । जिसने द्वादशाह किया वह देवों में ज्येष्ठ हो गया । यह द्वादशाह श्रेष्ठ ( अगुआ ) के लिए हैं । जिसने द्वाद- शाह किया वह देवों में श्रेष्ठ हो गया । ज्येष्ठ और श्रेष्ठ को ही यह यज्ञ करना चाहिये । इससे कल्याण होता है । कहते हैं कि किसी पापी को द्वादशाह यज्ञ नहीं करना चाहिये क्योंकि ऐसा (पापी) मुझमें प्रतिष्ठित नहीं हो सकता । इन्द्र को देवों ने ज्येष्ठ और श्रेष्ठ नहीं माना । उसने बृहस्पति से कहा, "मुझे द्वादशाह यज्ञ करा दो"। उसने यज्ञ करा दिया तब से देवों ने इन्द्र को ज्येष्ठ और श्रेष्ठ मान लिया । जो इस रहस्य को समझता है उसको ज्येष्ठ और श्रेष्ठ माना जाता है और उसके सम्बन्धी उसको श्रेष्ठ मान लेते हैं । पहला त्र्यह ( तीन दिन ) ऊर्ध्व है ( अर्थात् प्रातः सवन से साय सवन तक छन्दों के अक्षर बढ़ते जाते हैं ) । बीच का अर्थात् दूसरा त्र्यह ( बीच के तीन दिन ) तिर्यक् हैं ( अर्थात् इनमें छन्दों के घटने बढ़ने का नियम नहीं है ), पिछला त्र्यह

Page 276Permalink

२६२ [ चौथी पञ्चिका (तीन दिन) निचला है (अर्थात् प्रातः से सायं तक छन्दों के अक्षर घटते रहते हैं)। पहला त्र्यह ऊर्ध्व है। इस लिये अग्नि ऊपर को जाती है। ऊपर की दिशा अग्नि की है। दूसरा त्र्यह तिर्यक् है इसलिये वायु तिर्यक् चलता है और पानी तिर्यक् बहता है। यह उसकी दिशा है। पिछला त्र्यह निचला है। इसलिए सूर्य नीचे को तपता है। मेंह नीचे को बरसता है और नक्षत्र रोशनी नीचे को फेंकते हैं, यह उसकी दिशा है। यह तीनों लोक मिले जुले हैं। यह तीन त्र्यह भी मिले जुले हैं। जो इस रहस्य को समझता है उसके लिये यह तीनों लोक समृद्धि प्रदान करते हैं। (३) २६—दीक्षा देवों से चली गई। उन्होंने इसे वसन्त के दो महीनों में घेर दिया। वे उसे इन दो वसन्त के महीनों से निकाल न सके। तब उन्होंने उसे ग्रीष्म, बरसात, शरद्, हेमन्त के दो दो महीनों में घेरा। वे उसको हेमन्त के दो महीनों में से न निकाल सके। तब उन्होंने उसे दो शिशिर के महीनों में घेर लिया। उन्होंने उसको इन महीनों से निकाल लिया। जो इस रहस्य को समझता है वह सब इच्छाओं की पूर्ति कर लेता है और उसका शत्रु उसको पा नहीं सकता। इसलिए जो क्षत्रिय दीक्षा ले, वह इन दो शिशिर के महीनों में ले। इस प्रकार उसे उस समय दीक्षा मिलती है जब दीक्षा साक्षात् होती है। और वह दीक्षा को प्रत्यक्ष रूप से ग्रहण कर लेता है। इन शिशिर के महीनों में दीक्षा क्यों ले? इसका कारण यह कि इन दो महीनों में गाँव के और जंगल के सभी पशु बहुत दुबले हो जाते हैं और उनकी हड्डियां निकल आती हैं

Page 277Permalink

चौथा अध्याय ] २६३ और उनका दीक्षा का सा रूप हो जाता है । ( अर्थात् यजमान को दीक्षा में उपवास करके दुबला हो जाना चाहिये ) । दीक्षा से पहले वह प्रजापति के लिये पशु का आलभन करता है, इसके लिए १७ सामधेनियों का पाठ करना चाहिये । क्योंकि प्रजापति १७ भागों वाला है। यह प्रजापति तक पहुँचने के लिए है। इसके आप्रि मन्त्र जामदग्नि के मंत्र हैं। इस पर प्रश्न उठता है कि अन्य पशुयागों में तो वही आप्रिमंत्र पढ़े जाते हैं जो उन उन यजमानों के गोत्र वाले ऋषियों के हों। फिर इस प्रजापति यज्ञ में सब लोग जमदग्नि के ही मंत्र क्यों पढ़ते हैं। इसका उत्तर यह है कि जमदग्नि के मंत्र सर्वरूप और सर्वसमृद्ध हैं। और यह पशु भी सर्वरूप और सर्व समृद्ध है। जमदग्नि के मन्त्र इस लिए पढ़े जाते हैं कि सर्वरूपता और सर्व-समृद्धता प्राप्त हो जाय । इस पशु का पुरोडाश वायु का है। इस पर प्रश्न उठाते हैं कि जब पशु दूसरे देवता (अर्थात् प्रजापति) का है तो पुरोडाश वायु का क्यों देते हैं ? इसका उत्तर यह है कि यज्ञ प्रजापति है। यज्ञ को विना भूल के समाप्त करने के लिए ( वायु का पुरोडाश होता है ) । यद्यपि वायु का पुरोडाश है तथापि इसका यह अर्थ नहीं कि यह प्रजापति का नहीं है। क्योंकि वायु ही प्रजापति है। मंत्र में ऋषि ने कहा है— पवमानः प्रजापतिः । ( ऋ० ६।५।६ ) अर्थात् प्रजापति वह है जो बहता है अर्थात् वायु । यदि ( द्वादशाह ) सत्र के रूप में किया जाय तो यजमानों को अपनी सब अग्नियां इकट्ठी कर लेनी चाहियें और उनमें यज्ञ करना चाहिये। सबको दीक्षा लेनी चाहिये और सब को

Page 278Permalink

२६४ [चौथी पञ्चिका सोम बनाना चाहिये । ( सूत्र में सब १६ ऋत्विज् यजमान बन कर एक दूसरे के लिए यज्ञ करते हैं ) । वसन्त में समाप्त करता है । वसन्त रस है । ऐसा करने से वह यज्ञ की समाप्ति रस से करता है । (४) २७—छन्दों ने एक दूसरे का स्थान लेना चाहा । गायत्री ने त्रिष्टुभ् और जगती का स्थान लेना चाहा । त्रिष्टुभ् ने गायत्री और जगती का । और जगती ने गायत्री और त्रिष्टुभ् का । प्रजापति ने देखा कि यह द्वादशाह व्यूळ्हच्छंदस ( तितर बितर ) हो गया । उसने इसे लिया और इससे यज्ञ किया । इस प्रकार छन्दों की कामनायें पूरी हुई । जो इस रहस्य को समझता है उसकी कामनायें पूरी हो जाती हैं । छन्दों को उनकी जगह से हटाता है जिससे यज्ञ में कोई त्रुटि न हो । जैसे कोई दूर की यात्रा करने में मंजिल मंजिल पर नये घोड़ों या बैलों को जोतता है जो थके न हों, उसी प्रकार स्वर्ग की यात्रा करने के लिये यह ताज़ा ताज़ा छन्दों का प्रयोग करता है जो थक न गये हों । छन्दों की जगह बदलने का यही प्रयोजन है । यह दोनों लोक पहले मिले थे । फिर अलग हो गये । इससे न वर्षा हुई, न सूरज तपा । पंचजन मेल से न रहे । देवों ने इन लोकों को मिला दिया, इन दोनों ने देवरीति से एक दूसरे के साथ विवाह कर लिया । रथंतर से पृथ्वी स्वर्ग से जुड़ी है और बृहत्-साम से स्वर्ग पृथ्वी से । नौधस साम के द्वारा पृथ्वी स्वर्ग से जुड़ी है । और श्यैत साम द्वारा स्वर्ग पृथ्वी से । धुयें के द्वारा पृथ्वी स्वर्ग से जुड़ी है और वर्षा के द्वारा स्वर्ग पृथ्वी से जुड़ा है । पृथ्वी ने स्वर्ग में देवयजन अर्थात् देवों के यज्ञ के लिये स्थान बनाया और स्वर्ग ने पृथ्वी में पशु बनाये ।

Page 279Permalink

चौथा अध्याय ] २६५ यह जो पृथिवी ने स्वर्ग में देवयजन बनाया यह चन्द्रमा का काला दाग है। इसलिये शुक्ल पक्षों में यज्ञ करते हैं जिससे चन्द्रमा का काला दाग प्राप्त हो जाय । स्वर्ग ने पृथिवी में चरने के लिये ऊपा (चरागाह) बनाई। तुरः काविषेय ने कहा “हे जनमेजय, पोष क्या और ऊपा क्या ?” इसीलिए गव्य अर्थात् गाय के दूध आदि की चिन्ता करने वाले पूछा करते हैं “क्या वहां ऊपा अर्थात् चरने के लिये स्थान है ?” क्योंकि ऊपा ही चारा है। वह लोक इस लोक की ओर झुक गया। इससे द्यौ और पृथिवी हो गये। न अन्तरिक्ष से द्यौ हुआ, न अन्तरिक्ष से पृथिवी । (५) २८—पहले बृहत् और रथंतर थे। उनसे वाणी और मन हुये। रथंतर वाणी है और बृहत् मन । बृहत् पहले हुआ इस लिये उसने रथंतर को कम समझा। रथंतर ने अपने में गर्भ धारण किया और वैरूप उत्पन्न किया। रथंतर और वैरूप मिल गये और बृहत् को कम समझने लगे। बृहत् ने अपने में गर्भ धारण किया और उससे वैराज पैदा हुआ। यह दोनों बृहत् और वैराज मिल गये और रथंतर और वैरूप को कम समझने लगे । रथन्तर ने तब अपने में गर्भ स्थापित किया और शक्कर का जन्म हुआ। इन तीनों अर्थात् रथंतर, वैरूप और शक्कर ने बृहत् और वैराज को कम समझा। बृहत् ने तब अपने में गर्भ स्थापित किया और रैवत का जन्म हुआ। हर पक्ष के तीन तीन साम छः पृष्ठ हो गये (अर्थात् रथंतर, वैरूप, शक्कर एक ओर और बृहत्, वैराज और रैवत दूसरी ओर)। इस पर तीनों छन्द (गायत्री, त्रिष्टुभ् और जगती) इन छः पृष्ठों को न पा सके। गायत्री ने गर्भ धारण किया और

Page 280Permalink

२६६ [ चौथी पञ्चिका अनुष्टुभ् उत्पन्न हुआ। त्रिष्टुभ् ने गर्भ धारण किया और पंक्ति हुई। जगती ने गर्भ धारण किया और अतिच्छन्दस् हुआ। यह तीन छन्द जब छः हो गये तो वे ६ पृष्ठों को पा सके। जो इन छन्दों और पृष्ठों की उत्पत्ति के रहस्य को समझ कर इस अवसर पर दीक्षा लेता है उसके लिये और उसके प्रिय जनों के ( जनता के ) लिये यज्ञ कल्याणकारी होता है। (६) ऐतरेय ब्राह्मण की चौथी पञ्चिका का चौथा अध्याय समाप्त हुआ।

Page 281Permalink

पाँचवाँ अध्याय २९—पहले दिन का देवता अग्नि है। स्तोम त्रिवृत् है, साम रथंतर है और छन्द गायत्री है। जो समझता है कि देवता कौन है वह सफल हो जाता है । ‘आ’ और ‘प्र’ पहले दिन के रूप (विशेषतायें) हैं। प्रथम दिन की विशेषतायें यह भी हैं :— ‘युक्त’, ‘रथ’, ‘आशु’, ‘पिव’ यह शब्द अवश्य आयेंगे । मन्त्रों के पहले पाद में देवताओं का स्पष्ट नाम होगा । इस लोक अर्थात् पृथ्वी के विषय में कुछ होगा । रथंतर के समान साम होंगे । गायत्री के लगभग छन्द होगा । और ‘कृ’ धातु का भविष्यकाल का कोई रूप होगा । पहले दिन का आज्य सूक्त यह है :— उपप्रयन्तो अध्वरं ( ऋ० १।७४।१ ) क्योंकि इस में ‘प्र’ आया है । ‘प्र’ पहले दिन का रूप (विशेषता) है । प्रउग शस्त्र है “वायवायाहि दर्शत” ( ऋ० १।२।१-३ ) क्योंकि इसमें ‘आ’ आया है । ‘आ’ पहले दिन का रूप है । ( २६७ )