भारतकोश
अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा

स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)

DevanagariHindipublished292 पृष्ठ

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अकबर बीरबल विनोद ६० हैं उसके सौवें हिस्सेके बराबर मेरी स्त्री के हाथमें चूड़ियाँ हैं यदि आपको विश्वास न हो तो उन्हें गिनकर अपनी शंका समाधान कर लें।” अधिकतर प्रिय क्या है ? एक दिन बादशाह अपने दरबार में बैठा था और दो वर्षीया शाहजादा सलीम उसकी गोद में सानन्द खेल रहा था। उसकी बाल-चपलता देखकर बादशाह आनन्द-मग्न हो गया और आनन-फानन उसके मनमें यह प्रश्न उपस्थित हुआ— “जीवधारी को अधिकतर प्रिय क्या है ?” बादशाह को चुप देखकर सलीम उसका ध्यान अपनी तरफ आकृष्ट करने के अभिप्राय से तुतला कर कुछ बोला-“उसकी तोतरी बातों ने बादशाह के आनन्द को और भी बढ़ा दिया। आनन्दवश वह अपने मनोगत भावों को दबा न सका और तत्क्षण समस्त दरबारियों की तरफ लक्ष करके पूछा—“इस पृथिवी पर के प्राणियों को अधिकतर प्रिय क्या है ?” दरबारी सोच में पड़ गये ? कोई कुछ कहता तो कोई कुछ। अन्त में आपस में गोष्ठी करने लगे, परन्तु फिर भी किसी सिद्धांत पर अटल नहीं हुए। बीरबल की अनुप- स्थिति में इन बिचारों पर कभी २ ऐसी विपत्ति आ जाया करती थी। यदि बीरबल प्रस्तुत होता तब तो उनका पौ बारह था। बादशाह भी बीरबल के रहते ऐसी २ बातें किसी दूसरे दरबारी से कभी न पूछता था। आज की सभा में बीरबल