अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा
स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअकबरबीरबल विनोद ६२ करके थोड़ी ही देर में सबसे बड़े हौजको खाली कर सूचना दी। बागमें बैठने के लिये बादशाह की तरफसे समुचित प्रबंध किया गया और वे दरबारियोंके सहित बाग में दाखिल हुए। तब- तक बीरबल भी एक बँदरिये को उसके बच्चे सहित लेकर बाग में आया। बीरबल ने बँदरिया को बच्चे सहित हौज के मध्य भाग में बिठला कर ऊपर से पानी भरने की आज्ञादी। हौज में पानी भरा जाने लगा। पानी क्रमशः हौज के ऊपर चढ़ आया। बँदरिया बराबर अपने बच्चे को ऊपर उठाती गई। यहाँ तक कि बच्चा उसकी पीठ पर बैठ गया और पानी का बढ़ना बराबर जारी रहा। जब पानी बढ़कर उसके गले तक पहुँचा तो वह खड़ी हो गई और अपने बच्चेको अपने हाथ पर रखकर ऊपर उठा लिया। सब लोग इस नजारे को बड़ी गौर से देख रहे थे। बादशाह बीरबल को चिताकर बोला-“क्यों बीरबल ! क्या देखते नहीं हो कि किस प्रकार बँदरिया अपने प्राणों पर खेलकर बच्चे की रक्षा कर रही है, क्या अब भी पुत्र को सर्वोपरि प्रिय मानने को तैयार नहीं हो?” बीरबल ने उत्तर दिया-“पृथिवीनाथ! थोड़ा और ठहर जाइये, अभी बँदरिया के प्राण पर नहीं आई है, थोड़ी देर में आपही फैसला हो जाता है।” अभी बीरबल और बादशाह में उपरोक्त बातें हो रही थीं कि बँदरिये के मुख में पानी भरना शुरू हुआ। पानी भरने के कारण उसका दम घुटने की नौबत आ गई, नाक में पानी भरने लगा, वह अधीर होकर बहने लगी। आखिरकार लाचार हो उसने बच्चे की ममता छोड़ दी और अपना