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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

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स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)

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अकबर बीरबल विनोद १२८ एक आदमी ने पूछा-"आप कहाँ से आये हैं और आपका यहाँ किससे और क्या प्रयोजन है?" बादशाह बोला-मैं एक मुसाफर हूँ, कल का इसशहर में आया हूँ मैने अपना डेरा सराय में डाला है, आज नगर देखने की इच्छा से निकला तो घूमते फिरते रास्ता भूलकर इधर आ पहुँचा, थकावट के कारण मेरे बदन में पीड़ा हो रही है इसलिये कुछ समय तक विश्राम लेकर अपनी थकावट दूर करना चाहता हूँ। बादशाह के प्रस्ताव को मकान मालिक ने स्वीकार करते हुये उसे भीतर बुला लिया और एक चारपाई दिखला कर विश्राम करने की आज्ञा दी बादशाह चारपाई पर जा पड़ा और मकान मालिक अपना निजी काम करने लगा। जब वह सब कामों से निपट चुका तो मुसाफर के पास आया और उससे कुछ खाने पीने का अनुरोध किया, परन्तु बादशाह ने उसके प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। उससे मकान मालिक से आपस दारी की बातें होने लगीं। मुसाफिर (बादशाह)-"भाई कलह मैं इस नगर में आकर एक ढिंढोरा सुना था क्या यह बराबर प्रति मास पीटा जाता है वा इसी बार पीटा गया था। मैं बड़े आश्चर्य में पड़ गया हूँ कि इस ढिंढोरे से बादशाह का क्या प्रयोजन है।" मकान मालिक ने उत्तर दिया-"नहीं भाई पहले ऐसा कभी नहीं सुनने में आया था, कल्ही अचानक यह नई बात सुनने में आई, मुझे इसका भेद कुछ भी नहीं मालूम है।" उसने फिर पूछा-"तो बादशाह इतने दूध को लेकर

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