भारतकोश
अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा

स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)

DevanagariHindipublished292 पृष्ठ

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पृष्ठ 163

१४६ अकबर बीरबल विनोद बीरबल ने तुरत एक सिपाही के द्वारा थोड़ी सी मूँग की फुरमाइश कर बाजार से चार बनियों को बुलवाया। दीवान का संदेशा मिलते ही बनिये मूँग के नमूने सहित तुरत हाजिर हुए। बीरबल ने पूछा-"साहजी इस अन्न का क्या नाम है?" बनिये विचार में पड़ गये और मन में सोचा कि यह अन्न एक प्रसिद्ध खाद्य है और इसका नाम भी किसी से छिपा नहीं है, कारण की परमातमा ने इसकी उपज भी अच्छी दी है। इसके अन्दर कोई भेद की बात जरूर है, नहीं तो बादशाह इसका नाम मुझसे क्यों पूछता ? उत्तर भी सोच समझ कर देना चाहिये।" चारो बनियों ने मिलकर एक मत किया। उन्होंने सोचा कि यदि मूँग को मूँग ही बतलाया जाय तो बादशाह इससे प्रसन्न नहीं होने का तब आखिर ऐसा कौन सा नाम बतलावें की बादशाह की प्रसन्नता हो। अभी इनका मिसकाउट चल ही रहा था कि इसी बीच बादशाह ने फिर पूछा-"क्यों साहजी ! आप लोग अभी तक क्या सोच रहे हैं, इसका नाम क्यों नहीं बतलाते ?" थोड़ी सी मूँग हाथ में उठाकर एक बनिये ने उत्तर दिया-"पृथिवीनाथ ! यह तो मुझे उरद जान पड़ती है। दूसरे ने कहा-"यह मटर जान पड़ती है। परन्तु मटर मे छोटी है, इसका ठीक-ठीक नाम स्मरण में नहीं आता।" तीसरे ने कहा-"यह मिरच जान पड़ती है।" उनकी ऐसी चौरंगी बातें सुनकर बादशाह ने कहा-"तुम लोग मुझे खपतुलहवास जान पड़ते हो। यह मूँग है मूँग।" बनियों ने कहा-"हाँ गरीबपरवर ! वही वही, जो आप कह रहे हैं।" बादशाह ने