अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा
स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअकबर बीरबल बिनोद २ कहना पड़ता है कि आपको अभी तक मनुष्य की कीमत- लगाना नहीं मालूम है। यदि आप कुछ भी विचार करते तो स्वयं सिद्ध हो जाता कि मैं आपके लिये कितना लाभदायक हूँ।" उसकी ऐसी बातें सुनकर मैं चक्कर में पड़ गया और अपने तईं कुछ भी हल न कर सका कि मनुष्य की क्या कीमत होता है । पृथिवीनाथ ! आपसे निवेदन करता हूँ कि इसका निपटारा कराकर आप मेरे सन्देह को दूर कीजिये । उसके ऐसे प्रश्न को सुनकर बादशाह विचार करने लगा; परन्तु फिर भी कुछ निश्चित न कर सका। उसने सोचा- “आज सेठ का नौकर कहता था कल्ह मेरा कोई दरबारी कह बैठे कि बादशाह क्या चीज है, वह तो हमी लोगों के बैठाने से गद्दी पर बैठा है। तो फिर मैं उसको क्या जवाब दूँगा । अतएव इसी क्षण मुझे भी अपने मूल्य का निपटारा करा लेना चाहिये ।” बादशाह ने उस आदमी के प्रश्न को अपनी सभा में दोहराकर सभासदों से अपना मूल्य पूछा। लोग चकराये कि बादशाह के प्रश्न का क्या उत्तर देना चाहिये ? इसी बीच एक वृद्ध पुरुष जो बीरबल से ईर्षा करता था बोला- “गरीबपरवर ! इस उपस्थित जनता के बीच बीरबल की ही बुद्धि बड़ी है, अतएव इसका निपटारा उसीके द्वारा होना चाहिये ।” वृद्ध की यह युक्ति बादशाह के मनमें बैठ गई और बीरबल से पूछा- "बीरबल ! क्या तुम बतला सकते हो कि मेरा मूल्य और वजन क्या है ?"