अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा
स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३ अकवर बीरबल विनोद -------------------
बादशाह का प्रश्न सुनकर बीरबल विचारपूर्वक बोला— “पृथिवीनाथ ! यह जौहरियों का काम है; क्योंकि मूल्य लगाना वे ही जानते हैं। यदि हुक्म हो तो एक आन में शहर के तमाम जौहरी, शराफ और साहूकारों को बुलवा लूँ। वृद्ध की मंशा बीरबल को फाँसने की थी, परन्तु बीरबल ने अपनी बुद्धिबल से उसी को फँसा दिया क्योंकि वह भी जौहरी ही था। बादशाह के हुक्म से नगर के सब जौहरी सर्राफ और साहूकार बुलवाये गये, वे सब इस आकस्मिक बुलावे से बहुत घबड़ाये हुए थे। बीरबल बोला–नगर जौहरियो, सर्राफ तथा साहूकारो ! आप लोगों को इस लिये बुलाया गया है कि आप लोग मिलकर बाद- शाह का वजन और मूल्य निश्चित करें। यह सुनकर वे जौहरी अवाक हो गये, किसी की समझ में न आया कि बादशाह का मूल्य और वजन कैसे निश्चित किया जावे। अन्तमें उनका सरदार गिड़गिड़ाता हुआ बोला— “गरीब परवर ! इस समय हम लोग सरकारी सूचना पाकर तुरन्त भागे चले आरहे हैं जिस कारण हमारा हृदय भय- विह्वल हो रहा है। हमको कुछ देर की मुहलत मिले तो एक जगह अलग बैठकर आपस में विचार कर उत्तर दें। बादशाह ने उस सरदार की बात स्वीकार करली और उनकी मदद के लिये बीरबल को भी उनके साथ कर दिया। बीरबल उनको लेकर एक अलग कमरे में चला गया। सबों ने मिलकर कोशिश की परन्तु किसो सिद्धान्त पर अटल न हुए। बीरबल बोला—“यह बात इतनी आसान नहीं है जो