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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा

स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)

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अकबर बीरबल बिनोद ६


पन्द्रहवें दिन प्रातःकाल सब जौहरी बीरबल के मकान पर उपस्थित हुए और अशर्फी का तोड़ा लिए हुये बीरबल भी उनके साथ हो लिया। उधर बादशाह भी पन्द्रहवें दिन की प्रतीक्षा कर रहा था। वह शहर के बाहर बाग में एक बड़ा तंबू खड़ा करवाया। उसमें इतनी कुशादह जमीन रक्खी गयी थी कि जिसमें सर्वसाधारण से लेकर बड़े-बड़े सेठ साहूकार तक के बैठने के लिये अलग-अलग स्थान मिले। पन्द्रहवें दिन उसी बाग में ठीक समय पर दरबार लगा और तमाम लोग जमा होकर किते से बैठ गये। तंबू के मध्य में बादशाह का सिंहासन था। उसके ठीक सामने जौहरियों को बैठनेके लिये जमीन छोड़ी गई थी। बीरबल जौहरियों के दल से पहिले पहुँचा। थोड़ी देर बाद जौहरियों का दल भी जा पहुँचा। सब लोग किते से खाली स्थान पर बैठाये गये और उनके मध्य अशर्फियों का तोड़ा रख दिया गया, फिर क्या पूछना था; उनमें से प्रत्येक जौहरी एक २ अशर्फी को तराजू पर रखकर बटखरेसे तौलना शुरू किये। कुछ कालोपरान्त एक जौहरी बोला—"मिल गयी ! मिल गयी !! मिल गयी !!! जिस बात की तलाश थी वह मिल गयी।" इतने में उनका मुखिया उठा और उस अशर्फी को लेकर बादशाह के क़दमोंपर जा रखा। लोगोंको बड़ी प्रसन्नता हुई। बादशाह को एक तरफ विस्मय और दूसरी तरफ हर्ष हुआ वह उस अशर्फी को अपने हाथ में लेकर बोला-"क्या मेरी कीमत यही एक अशर्फी है?" बूढ़े जौहरी ने गम्भीरता पूर्वक उत्तर दिया- "जी हाँ, यही