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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा

स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)

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अकबर बीरबल विनोद २६४ सब मेजमान भड़क गये और वे अपने आगे की थाली जस की तस यथास्थान छोड़ कर आप अलग जा खड़े हुए। सब लोग बीरबल को झिड़कियाँ देने लगे। यहाँ तक कि क्रोध के अधिक भड़कने पर बीरबल को धक्के दिलवाकर वहाँ से बाहर निकलवा दिये। पर इससे अधिक करने की किसी में ताब नहीं थी। बादशाह तो पहले ही से बचन हार चुके थे इसलिये वह भी कुछ न बोले बल्कि अपने मन को भीतर ही भीतर मसोस कर रह गये। बीरबल के आनन्द की सीमा न रही, उसने शास्त्रों में पढ़ा था कि मनुष्य अपना प्राण देकर भी धर्म बचावे। बाहर बैठे हुए हिन्दू दरबारी देवता पित्तर मना रहे थे। बीरबल को इतना शीघ्र लौटकर बाहर आते हुए देखकर उनको कुछ धैर्य हुआ। बीरबल गुप्तरूप से महल की सारी व्यवस्था सुनाकर अपने घर चला गया और स्नान ध्यानसे निश्चिन्त हो भोजन किया। बादशाह भड़के हुए मुसलमानों को समझा बुझा कर शान्त किये और परसे पकवानों को तुरत फेंकवा दिया। जब फिर दूसरा बनकर तय्यार हुआ तो अपने मेजमानों को खिला- कर आप भी खाना खाये। बस उसी दिन से बादशाह को शिक्षा मिल गई और फिर बीरबल को कभी भोजन का निमंत्रण नहीं दिये। एक कृपिण पुरुष दिल्ली नगर में एक महा कंजूस धनवान रहता था।