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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

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स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)

DevanagariHindipublished292 पृष्ठ

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अकबर बीरबल विनोद २६८ आयोजन नहीं किया गया था। और लोग तो अपने घरसे भोजन करके आये ही थे, विचारा कंजूस ही भूखा तड़प रहा था। बहुत देरतक इस आसा में था कि अब भोजनकी बारी आती है। शायद भोजन की तय्यारी में कुछ कमी पड़ गई हो, जिससे इतना विलम्ब हो रहा है। जो कुछ था सो थाही। धीरे २ दिन ढलने लगा, फिर भी किसी ने कंजूसकी सुधि न ली। तब वह बोला- "क्यों भाई, अब भोजन में कितनी देर है, शीघ्रता करो।" कविका मित्र बोला-"कैसी शीघ्रता श्रीमानजी?" सूमड़े ने कहा- "क्या आपने मुझे आज के लिये निमंत्रण नहीं दिया था क्या?" तबतक बीरबल बोल उठा- "सो तो आपने ठीक कहा है, परन्तु यह बात केवल आपको प्रसन्न करने के लिये कही गई थी नहीं तो भला इतनी देर क्योंकर होती। हम लोग तो कभी के भोजन कर चुके हैं।" ऐसी कोरी चापलूसी से सूमड़े का मुख लाल हो गया और वह अपनी बड़ी बड़ी आँखें चढ़ाकर बोला- "तुम लोग बड़े उच्छृङ्खल जान पड़ते हो जो किसी को निमंत्रण देकर बुलाना और फिर उसकी हँसी करना?" इसी प्रकार की अनेक बातें कह कहकर वह कंजूस कमर कसकर लड़ने पर आमादा हो गया।" बीरबल ने देखा कि अब बात बहुत आगे बढ़ जायगी इस लिये बीच बिचाव के अभिप्राय से बोला- "आप तो एक उच्च कोटि के रईस हैं, फिर आपको यह विचार पहले ही आना चाहिये था। क्या आपने इस कवि को ठट्टे बाजी में नहीं टाला था, क्या आपके उस मनोरंजन से इसको कष्ट नहीं हुआ था?"

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