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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा

स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)

DevanagariHindipublished292 पृष्ठ

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२७१ अकबर बीरबल विनोद छोड़ देने का अनुनय विनय करने लगा। वह बोला-"चौकी- दार साहब ! आप इस स्त्री को छोड़ दीजिये, इसने यह मांस मुझसे खरीदा था। यदि वादशाह को यह बात मालूम हो जायगी तो वह इसके बदले मुझे दंड देंगे। आप जानते ही हैं कि मैं एक कुटुम्बी आदमी हूँ। मेरे कैद हो जाने से मेरे बाल बच्चे भूखों मरने लग जायेंगे। इसलिये आप मेरी दीनता की तरफ ध्यान देकर इस मामले को यहीं पर दबा दीजिये। वर्ना बादशाह मुझे इस मामले में अपराधी पाकर मुझे फाँसी दिला देंगे।" चौकीदार उसकी एक बात भी न सुनी, वह तो पहले ही से सिखला पढ़ाकर ठीक किया गया था। दोनों को पकड़ कर बादशाह के पास ले गया और बोला-"पृथिवीनाथ! आज यह स्त्री इस पठान से मांस खरीद कर घरवालों से छिपा नदी के किनारे बैठकर भक्षण कर रही थी। इसका दोनों चरित्र मैंने अपनी आँखों देखा है। इसलिये हुजूर के पास पकड़ लाया हूँ कि इसको उचित दंड दिया जाय।" बादशाह को चौकीदार की बातें सुनकर बड़ा रंज हुआ और उसके नाते गोते के लोगों को बुलवाकर उस स्त्री की चाल चलन के संबन्ध में पूछताछ की। परन्तु उनकी जबानी उस स्त्री का ऐसा दूषित होना सिद्ध न हुआ। दर्बार का समय था। धीरे २ दर्बारी लोग भी आने लगे थे। इस बात को सुनकर सभी लोग चकित होगये। किसी को उस स्त्री का ऐसा दूषित स्वभाव होना संभव नहीं जान पड़ता था। परन्तु कोई उसकी शुद्धता का भी कोई निश्चित प्रमाण देनेको प्रस्तुत न था।