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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा

स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)

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अकबरवीरवल विनोद २७२ आखिरकार वादशाह ने उसके ब्राह्मण पति को बुलवा कर बोला-"जैसा की यह चौकीदार बयान करता है उस हिसाब से यह स्त्री भ्रष्टा हो चुकी है। अतएव इसे इस पठान को दे देना चाहिये और पठान को यह सजा दी जाती है कि वह इसके बदले सात सौ रुपये इसके, विवाहिता पति को दंड स्वरूप देवे।" वादशाह के ऐसे न्याव को सुनकर विचारी पतिपरायणा ब्राह्मणी सूखकर काँटा हो गई। फिर अधिक क्या लिखें पाठक एक सती साध्वी का ऐसा अपमान होने पर कैसी दशा होगी, स्वयं अनुमान कर सकते हैं। एकदम न्याय का गला घोंटा जाने लगा। दयालू ईश्वर की सत्ता स्थिर न रह सकी। सुदर्शन चक्रधारी की प्रेरणा से कई ब्राह्मण इस बात की फरियाद लेकर बीरबल के पास गये। बीरबल को अन्याय सहन नहीं होता था, इसी कारण वह अपने पर जोखिम उठाकर भी अन्याय को रोकता था। वह अपना घरेलू काम उसी क्षण बन्दकर दिया और कपड़े पहन उन ब्राह्मणों को साथ लेकर दरबार में हाजिर हुआ। बीरबल ने बारी बारी से पठान, चौकीदार तथा उस ब्राह्मणी का बयान लिया, फिर स्त्री से यों पूछा- "भगने ! घरसें निकलते वक्त कुछ खाया था या योहीं नदी के तटपर कपड़े पछाड़ने के लिये चली आई थी। इसका प्रमाण कोई दे सकती हो तो बतलाओ।" सुशीला ने उत्तर दिया-"मेरी सासने मुझे दूध और रोटी दिया था बस उसीको खाकर घर से निकली थी।" बीरबल ने कहा- "बहुत अच्छा थोड़ी देर एक जगह बैठकर तबतक विश्राम करो मैं इसकी जाँच कराऊँगा।"