अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा
स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)
पृष्ठ 42, कुल 292 में से
संदर्भ में पढ़ेंअकबर बीरबल बिनोद २८ सरकारी काम से बाहर गया था। इसलिये जब कई दिन पश्चात वह लौटा तो बादशाह ने वही प्रश्न बीरबल से भी किया। भला बीरबल कब चूकने वाला था, वह झट बोला-"पृथ्वीनाथ ! जिस तरह से अन्य लोगों को अधोवायु होती है उसी तरह मुझे भी होती है।" बीरबल के इस उत्तर से बादशाह बहुत नाराज हुआ और उससे बोला-"वाह खूब अच्छे रहे ! इस सभा में ऐसा एक भी आदमी नहीं है जिसे अधोवायु सरती हो, फिर तुम्हें कैसे सरने लगी ? जब यही बात है तो तुम दरबार से बाहर चले जावो और जब तक मैं तुम्हें आने की आज्ञा न दूँ कदापि न आना। बीरबल हाजिर जवाब था उसे उत्तर प्रत्युत्तर करने में हिचकिचाहट नहीं होती थी। परन्तु मौका देखकर काम करना बुद्धिमानो का काम है। बादशाह को अपने ऊपर बहुत नाराज देख वहाँ से वह तत्काल बाहर चला गया। बेगम को नजरबन्द हुए जब बहुत दिन हो गए तो एक दिन वह अपने नजरबन्दी के कष्टों से ऊब कर बीरबल को बुलवाया और उससे आजिजी कर बोली-"बीरबल ! आपकी मदद के बिना मेरा उद्धार नहीं हो सकता कोई तरकीब निकाल कर मुझे इस निविड़ कैद से मुक्त करो। मेरा जीवन असंभव हो रहा है। बीरबल ने कहा-"दूसरे की वकालत वही कर सकता है जो निर्दोष हो मैं तो खुद ही तुम्हारे दोष में शामिल हूँ तुम्हारी मदद कैसे कर सकता हूँ ? बेगम बीरबल को भलीभाँति जानतीथी अतएव उसकी बात