अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा
स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४७ अकबर बीरबल बिनोद तमाशा के दिखलाने में मुझसे की गई गुस्ताखियाँ भी माफ कर दी जायँगी । उसी के मुवाफिक हुजूर को यह नया तमा- शा दिखलाया गया है, कभी आपको इस प्रकार की नग्न सभा देखने में न आई होगी और न फिर भविष्य में देखने ही सकेंगे यही इसका अन्त है । पृथ्वीनाथ ! कहीं मरा हुआ आदमी भी लौट कर आ सकता है ? भला स्वर्ग की परी यहाँ क्योंकर आवेगी ?” बादशाह लाचार था वह बीरबल के कथनानुसार उसको पहले से माफी दे रक्खी थी, अतएव सभासदों से बोला— “दीवानजी ! आजसे लगभग एक वर्ष पहले मैंने अपने दीवान बीरबल को एक अजीब तमाशा दिखलाने की आज्ञा दी थी और उसमें होने वाले सभी अपराधों के लिये उसको माफी भी दी गई थी । सो आज बीरबल ने वही अजीब तमाशा हमको दिखलाया है। आशा करता हूँ आप लोग उसपर रुष्ट न होंगे। यह जो कुछ भी हुआ सब मेरी आज्ञा के कारण हुआ है। इस बात का मुझे भी दुःख है कि उसने आपलोगों की बड़ी हँसी कराई है। मैं ऐसा नहीं चाहता था। मैं तो केवल अजीब तमाशा ही देखने की लालसा रखता था। आपलोग इस बात को एकदम भूल जायें और बीरबल से पहले सा ही प्रेम रक्खें।” बादशाह की आज्ञा सुनकर समस्त हिन्दू दरबारी धन्य धन्य कहने लगे, परन्तु मुसलमान दरबारियों का मुँह लटक गया और मनही मन बीरबल की धृष्टता पर गालियों का बौछार उड़ाने लगे। बीरबल उनके वस्त्रों का गट्ठर पहले