भारतकोश
संग्रह पर लौटें

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा

स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)

DevanagariHindipublished292 पृष्ठ

अकबर बीरबल विनोद २७८

अकबर बीरबल विनोद २७८ कई गण्यमान्य सरदार आपसमें मिलकर बादशाह के पास गये और आग्रह कर उन्हें अपने सरदार की बैठक में ले आये। उधर सरदार के कर्मचारियों ने बादशाह के आनेके पहले ही कमरे में दीपकों को सजाकर रख छोड़े थे। दीपकेँ तेल बत्ती से लैसकर बिना जलाये ही रखी गई थीं। बादशाह के आने पर तान- ने दीपक राग गाने के आज्ञा दी गई। तानसेन के दीपक राग छेड़ते ही सारे दीपक आपसे आप जल गये और सर- दार की बैठक एकाएक प्रकाशित हो गई। गरमी का मौसम था उस दिन बड़ी गरमी बढ़ रही थी। तानसेन ने देखा कि गरमी की अधिकता से बादशाह बेचैन हो रहे हैं अतएव तुरत मलार गाने लगा, मलार गाते ही वृष्टि होने लगी और थोड़ी ही देर में सब गरमी शान्त हुई। ऐसी उपयुक्त वृष्टि से सब लोग बड़े हर्षित हुए। इन घटित घटनाओं को देखकर बादशाह को बड़ा हर्ष हुआ। मुसलमान सरदार तो अपना मतलब गाँठने के लिये ही यह समाज एकत्रित किये हुए थे। बादशाह को हर्षित देखकर मुमताज उद्दीन नामी सर्वश्रेष्ठ उमराव हाथ जोड़कर बोला-“पृथिवीनाथ! अब आपको तानसेन की बुद्धि विशेषता पर सन्देह करने का कोई कारण शेष नहीं रह गया होगा। आशा है कि आप आजसे तानसेन की बुद्धि को बीरबल की बुद्धि से श्रेष्ठ मान लेंगे और न्याय की मर्यादा कायम रखने के लिये तानसेन को बीरबल का पद प्रदान करेंगे।” कई दूसरे सरदारों ने भी पहले सरदार की प्रार्थना का अनु- मोदन किया। सब सरदारों की सम्मति समझ चुकने के

२७६ अकबर बीरबल विनोद

२७६ अकबर बीरबल विनोद पश्चात् बादशाह बोले-“हाँ यह आप लोगों का कहना सत्य है कि तानसेन बहुत बड़ा विद्वान् है, परन्तु फिर भी वह बीरबल की समता नहीं कर सकता, यदि तुम लोगों को विश्वास नहीं है तो वह दिन नजदीक है जब कि मैं सारी बातें प्रत्यक्ष, करके तुम्हें दिखला दूँगा। कुछ दिनों तक बादशाह ने इस बात की चर्चा नहीं की जब उन्हें भलीभाँति विदित हो गया कि अब सरदारों को बात भूल गई तो एक दिन ब्रह्मदेश के बादशाह के नाम एक पत्र लिखकर तानसेन और बीरबल को एक साथ भेजने का निश्चय किया। पत्रके भीतर लिखा हुआ था कि इस पत्र को ले जाने वाले इन दोनों आदमियों को तुरत शूली दिला देना। पश्चात् बादशाह ने बीरबल और तानसेन को बुलाया और कुछ आवश्यक कार्य्यका बहाना कर दोनों को पत्र देकर ब्रह्मदेश के राजा के पास भेज दिया। इनको भेजते समय बादशाह बोले- “देखो तानसेन, यह बड़ा गूढ़ काम है, यदि दूसरे को भेजूं तो यह हल नहीं हो सकता। इसलिये बहुत समझ बूझकर तुमदोनों को भेज रहा हूँ अविलम्ब ब्रह्मदेश के महाराज के पास जाओ और जैसे हो सके इसको निपटा कर शीघ्र वापस लौट आओ।” उन्होंने “बहुत अच्छा” कहकर पत्र को ले लिया और घरपर पहुँच रास्ते के लिये खाने पीने का प्रबन्ध कर ब्रह्मदेश के लिये प्रस्थान किया। बीरबल रास्ते में मनो मन अनुमान करता जा रहा था-“हो न हो इस काम के अन्दर कोई गूढ़ भेद छिपा हो, खैर देखा जायगा, अब तो थोड़े दिन पश्चात् वह सामने ही

अकबर बीरबल विनोद २८०

अकबर बीरबल विनोद २८० आनेवाला है, नाहक मूड़ मारने से क्या लाभ । समय आने परविवेक से काम लेना होगा।" इधर तानसेन ने अपने मनमें अनुमान किया-"यह कोई बहुत कठिन काम होगा जो केवल बीरबल के किये नहीं हो सकता था इसलिये बादशाहने मुझको भी उसके साथ भेजा है। लो अच्छा ही हुआ भ्रमण का भ्रमण होगा और गायन सुनाकर राजा को प्रसन्न कर पारितोषिक अलगसे लूँगा।" ऐसा अनु- मान कर वह मनमें फूला नहीं समाता था। बादशाह ने इनको सवारी के लिये तेज घोड़े दिये थे इसलिये थोड़े ही दिनों की यात्रा के पश्चात् ये ब्रह्मदेश की राजधानी में जा पहुँचे । जिस समय ये ब्रह्मदेश के सरहद् पर पहुँचे सूर्यास्त हो रहा था। कोई परिचय का भी नहीं था, लाचार होकर वह रात्रि नगर के बाहर ही टिककर बितानी पड़ी। ब्रह्म- देश जंगल और पहाड़ों से भरा पड़ा है। इनको वहाँ की आव हवा का कुछ भी ज्ञान न था अतएव बीरबल की अनुमति से उन दोनों ने बारी बारी दो दो घन्टे की सोने और जागने की ओसरी बनाया। जब बीरबल सोता तो तानसेन पहरे पर रहता और जब तानसेन सोता तो बीरबल पहरे का काम करता। बीरबल अभी प्रथम पहर के पहरे पर था कि इसी बीच वहाँ पर एक वृद्ध पुरुष आया और इनका ढंग देखते हुए इन्हें परदेशी समझ कर बोला-“ आप लोग मुझे परदेशी से जान पड़ते हैं और यह स्थान जंगली है; यहाँ पर सिंह का आक्रमण हुआ करता है। अतएव रात्रि में तुम्हारा यहाँ निवास करना अच्छा न होगा। तुम

२८१ \qquad अकबर बीरबल विनोद

२८१ \qquad अकबर बीरबल विनोद लोग चलकर मेरी झोपड़ी में विश्राम करो, सुबह होते ही अपने रास्ते चले जाना।” बीरबल ने पहले तो बूढ़े के प्रस्ताव को अनमनस्क होकर टाल दिया, परन्तु उसके बारंबार आग्रह करते रहने पर दोनों अपने २ घोड़ों पर सवार होकर उसके साथ हो लिये। कुछ दूर चलकर बूढ़े का झोपड़ा मिला। वह घोड़ों को अपने बाड़े में बँधवा कर उन्हें झोपड़े में लिवा ले गया और उनके विश्राम के लिये दो पृथक् पृथक् स्थान दिखला कर आप भी अपनी चारपाई पर जा लेटा। सबेरा होते ही बीरबल वहाँसे प्रस्थान करने की तय्यारी करने लगा। इतने में वह बुड्ढा ठेंगता २ आ पहुँचा और बीरबल से आग्रह पूर्वक बोला-“आप लोग न जाने मेरे किस पूर्व पुण्य से इस झोंपड़ी में आ गये हैं। रात्रि में आपके भोजनादि का कुछ प्रबन्ध नहीं हो सका जिस कारण मैं बड़ा शरमिन्दा हूँ, परन्तु अब आपको यहाँ से बिना भोजन किये जाना मुनासिब नहीं है, मुझ दीन की यह क्षुद्र सेवकाई आपको स्वीकार करना उचित और धर्मसंगत है।” बीरबल ने देखा कि एक तो हम लोग एक दिन के भूखे हैं दूसरे परदेश का मामला है। कब भोजन की व्यवस्था होगी और कब नहीं, इससे बेहतर है कि इस बुड्ढे वाली करके चलें। बुड्ढा बीरबल की स्वीकृति प्राप्त कर प्रसन्न हो गया और तुरत जंगली खाद्य सामग्रियों को लाकर उनको भोजन कराया। तब दोनों प्रसन्न प्रसन्न बुड्ढे से अनुमति लेकर नगर की तरफ अग्रसर हुए। ब्रह्मदेश की राजधानी आवा नगरी बड़ी मनोरम थी। वहाँ

अकबर बीरबल विनोद २६२

अकबर बीरबल विनोद २६२ की सड़कें और उच्च अट्टालिकाओं की उपमा दिल्ली नगर से कहीं बढ़ चढ़ कर थी। राजा बड़ा दयालु साहसी और प्रजावत्सल था, ऐसे राजा के सुशासन में प्रजा बड़ी खुश- हाल थी। क्या मजाल कि कोई सबल किसी निर्बल पर प्रहार करे, शेर बकरी एक घाट पानी पीते थे। विशेष कहना बाक्य चातुरी दिखलाना होगा। वहाँ हर तरह से राम राज्य था। राज्य वर्ग के कर्मचारी बड़े धर्मपरायण और ईमानदार थे। घूस खोरी कत्तई बन्द थी, सिफारिश करने वाला स्वयं दंडिए किया जाता था। ऐसी सुन्दर नगरी की सुन्दर व्य- वस्था को देखते सुनते तानसेन और बीरबल चले जारहे थे। इनकी उत्तम २ पोशाकों को देखकर वहाँ के निवासी उन्हें उच्च बंशीय समझ कर उनका सब जगह स्वागत करते थे। वे राज सभा को पूछते हुए नगर में चले जा रहे थे कि इसी बीच चोबदार ने पूछा-"आप लोंगों का यहाँ आना किस निमित्त हुआ है और आपका कहाँ से शुभ आगमन हुआ है।" बीरबल बोला-"हम दिल्ली के निवासी हैं। बादशाह का पत्र लेकर यहाँ के राजा से मिलने आये हैं।" इनका आशय समझ- कर चोबदार इन्हें राजा सभा में ले गया। और ड्योढ़ी पर ठहरा कर आप राजा के पास जाकर इनके आने की सूचना दी। राजाज्ञा प्राप्तकर वह इन दोनों को महाराज के सन्निकट पहुँचा दिया। ये बड़े अदबसे सलाम कर महाराज की आज्ञा से वहींएक स्थान पर बैठ गये। जब महाराज राजकीय कामों को खतम करके निश्चित हुए तो इनके आनेका कारण पूछा। बीर- बल कुछ उत्तर न देकर बादशाह का दिया हुआ पत्र महराज