अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा
स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)
अकबर बीरबल विनोद २६०
अकबर बीरबल विनोद २६० था। दूसरे वे बीरबल के रहते हिन्दू धर्म के प्रतिकूल कोई काम भी नहीं कर सकते थे जिस कारण वे भीतर भीतर बीर- बल से बहुत द्वेष रखते थे। एक दिन मुसलमानों ने गुट बाँध- कर बादशाह का बीरबल से अविश्वास कराने का प्रण किया। वे झूठा झूठा फरेब रचकर दावा दायर करने लगे, परन्तु बीरबल अपने बुद्धि और विचार के बल से उनकी किल्ली लगने नहीं देता था। ऐसा सोच समझकर न्याय करता कि मुसलमान लोग दाँतों तले अँगुली दाबकर रह जाते। बाद- शाह को मुसलमानों की ऐसी अनीति बहुत खलती थी, परन्तु फिर भी उनको छेड़ता नहीं था। एक दिन उसके मन में यह बात आई कि इन सब फसादों का एकमात्र कारण बीरबल का हिन्दू होना ही है, यदि वह किसी प्रकार समझा बुझाकर मुसलमान बना लिया जावे तो फिर उससे मुसल- मानों की बगावत मिट जावे। ऐसा निश्चय कर बादशाह ने बीरबल को मुसलमान बनाने की एक सरल युक्ति ढूँढ़ निकाली। वह जब महल में भोजन करने जाता तो बीरबल को भी भोजन करने के लिये आग्रह कर्ता, परन्तु बीरबल कोई न कोई युक्ति लड़ाकर उसे टाल देता था। इस प्रकार बादशाह को आग्रह करते और बीरबल को टालते कई महीने व्यतीत हो गये। न बीरबल उनके साथ भोजन करने जाता और न बादशाह की मंशा वर आती। एक दिन बीरबल अपने कामों में दत्तचित्त होकर लगा हुआ था इसी बीच बादशाह ने कहा- "बीरबल कल दोपहर में यहीं भोजन करना।" बीरबल ने सपर बिना विचार किये ही कामों की विशेषता के कारण
२६१ अकबर बीरबल विनोद
२६१ अकबर बीरबल विनोद हामी भर ली। वह उत्तर देने में चूक गया। बीरबल में इस बात की बड़ी विशेषता थी कि वह भरसक अपनी बातों को निभाने की कोशिश करता था। इस बात को बादशाह भी भलीभाँति जानते थे। "बीरबल ने मेरा निमन्त्रण स्वीकार कर लिया।" इस बात को सोचकर बादशाह को बड़ी प्रसन्नता हुई। वे अपने बड़े २ मुसलमान दरबारियों को इसकी बधाई भेज दी। वे मुसलमान दरबारी भी ऐसा कह २ कर फूले नहीं समाते थे कि कल बीरबल मुसलमानी मजहब स्वीकार करेगा। इससे बढ़कर उन मुसलमान दरबारियों को और कौनसी शुभ सूचना हो सकती थी। दो घण्टे की कड़ी परिश्रम के पश्चात् बीरबल अपने कामों से अवकाश पाकर वही लेट गया। उसी समय उसके साथ का एक हिन्दू कर्मचारी बोला-“दीवान जी! आज आपने बिना विचार किये ही बादशाह के सामने ऐसी कठिन प्रतिज्ञा कैसे कर ली।" अब बीरबल का होश ठिकाने आया, उसके आँखों के सामने अन्धेरा छा गया। मन ही मन विचार करने लगा-“तो क्या कल मुझे मुसलमान बनना पड़ेगा? क्या मेरी इतनी दिनोंकी सब कीर्तियोंके विलीन होनेका समय आ गया? मैं अपने जात बिरादरी के लोगों की गालियाँ और तानाजनी को कैसे सहन कर सकूँगा। बादशाह के साथ भोजन कर लेने के पश्चात् हिन्दू जनता को फिर मैं अपना कौनसा मुँह दिखलाऊँगा।" ऐसी ही ऐसी अनेकों कल्पनाएँ एक साथ ही उत्पन्न होकर बीरबल को हतबुद्धि बना दीं और उसका दिमाग ऐसा व्यथित हो गया कि फिर काम
अकबर बीरबल विनोद २६२
अकबर बीरबल विनोद २६२ करने का उसे साहस न हुआ । घर पहुँच कर भी उसका मन 'चल ही रहा । इस चिन्ता के गहरे आघात से उसे शामको क्षुधा भी न लगी और न रात्रि में खूँखार निद्रा ही आई । एकदम अचेतन अवस्था में ही तमाम रात व्यतीत हो गई। मारे लज्जा के अपने घर वालों से भी कुछ कहते नहीं बना । दूसरे दिन सबेरा होते ही बादशाह बीरबल के जेवनार की तय्यारी कराने लगे । भिन्न २ प्रकार के जेवनार तय्यार कराये गये । इस खुशहाली में नगर के बहुतेरे अमीर उमराव मुसलमान आमंत्रित किये गये । जब जेवनार का समय हो गया और अन्य मेजमान लोग एकत्रित हुए तो बादशाह ने अपने एक कर्मचारी द्वारा बीरबल को बुलवा भेजा । खाद्य पदार्थ भलीभाँति सजाकर सोने और चाँदी के बासनों में परसे गये और सब अमीर उमराव यथास्थान बैठ गये । उधर जब बादशाह का दूत बीरबल के पास पहुँचा तो उसका मुख मलीन हो गया। वह अपने दरबारी कपड़े पहन कर उस दूतके साथ हो लिया। रास्ते में वह बराबर अगल बगल के मार्ग की भूमि का संशोधन करता हुआ चलता था। दैवात् उसके मन में एक युक्ति अचानक समा गई। वह एक सुनार को सूअर की कूँची से आभूषणों को साफ करते हुए देखा। वह तुरत सुनार के पास जा पहुँचा और आग्रह करके उससे सूअर के बाल की कूँची मँगनी माँग ली । महल में पहुँच कर बीरबल ने देखा कि सब लोग यथास्थान बैठकर केवल उसकी ही प्रतीक्षा कर रहे हैं। बादशाह बड़े प्रसन्न दिखलाई पड़ते थे । आज उन्होंने
२६३ \hfill अकबर बीरबल विनोद
२६३ \hfill अकबर बीरबल विनोद \rule{\textwidth}{0.4pt}
बीरबल का और दिनों से अधिक सत्कार किया। बड़े २ अमीर मुसलमानों ने भी उठ २ कर बीरबल का स्वागत किया। मारे खुशी के बादशाह ने बीरबल को अपनी बगल में बैठने का प्रबंध किया। जब यह सब हो चुका तो बीरबल विनम्रता पूर्वक बोला-“पृथिवीनाथ ! मैं तो भोजन करने आया ही हूँ; परन्तु आपसे थोड़ी आग्रह है। यदि मुझे अपने साम्प्रदायिक नियम के अनुसार भोजन करने को अनुमति दी जावे तो अति उत्तम हो।” बादशाह ने कहा-“अच्छी बात है, तुम अपने सम्प्रदाय के नियमानुसार ही भोजन करो।” बीरबल बोला-“तो इन सब थालियों पर थोड़ा २ पानी छिड़कना पड़ेगा। यदि मैं ऐसा करूँ और कोई नाराज हो तब क्या करना होगा। आप पहले ही से इसपर विचार कर लीजिये। बादशाह बोले-“तुम अपने सम्प्रदाय की रस्म पूरी करके भोजन करो। इसमें हम सबों को कोई आपत्ति न होगी।” फिर बादशाह ने अपने अन्य मुसलमान मेजमानों की तरफ दृष्टि फेर कर देखा, सबों ने अपनी गर्दन हिलाकर बादशाह का फर्मान स्वीकार किया। तब बीरबल सबको वाक्यबद्ध करके मस्त हो गया और उसकी साम्प्रदायिक प्रथा शुरू हुई। एक कटोरोमें पानी भरकर उसी सूअर के बाल की कूँची को उसमें डुबा २ कर खाद्य पदार्थ से सुसज्जित थालियों पर छिड़कने लगा। सब थालियों पर छींटे डाल चुकने के पश्चात् बीरबल ने बादशाह की थालीपर भी थोड़ा सा पानी छिड़क दिया। एक अमीर जो बाद- शाहके पास बैठा हुआ बीरबलका सारा चरित्र देख रहा था बोला “ओफ ! यह, तो बड़ा कठिन हुआ, यह कूची तो बाल की है।”
अकबर बीरबल विनोद २६४
अकबर बीरबल विनोद २६४ सब मेजमान भड़क गये और वे अपने आगे की थाली जस की तस यथास्थान छोड़ कर आप अलग जा खड़े हुए। सब लोग बीरबल को झिड़कियाँ देने लगे। यहाँ तक कि क्रोध के अधिक भड़कने पर बीरबल को धक्के दिलवाकर वहाँ से बाहर निकलवा दिये। पर इससे अधिक करने की किसी में ताब नहीं थी। बादशाह तो पहले ही से बचन हार चुके थे इसलिये वह भी कुछ न बोले बल्कि अपने मन को भीतर ही भीतर मसोस कर रह गये। बीरबल के आनन्द की सीमा न रही, उसने शास्त्रों में पढ़ा था कि मनुष्य अपना प्राण देकर भी धर्म बचावे। बाहर बैठे हुए हिन्दू दरबारी देवता पित्तर मना रहे थे। बीरबल को इतना शीघ्र लौटकर बाहर आते हुए देखकर उनको कुछ धैर्य हुआ। बीरबल गुप्तरूप से महल की सारी व्यवस्था सुनाकर अपने घर चला गया और स्नान ध्यानसे निश्चिन्त हो भोजन किया। बादशाह भड़के हुए मुसलमानों को समझा बुझा कर शान्त किये और परसे पकवानों को तुरत फेंकवा दिया। जब फिर दूसरा बनकर तय्यार हुआ तो अपने मेजमानों को खिला- कर आप भी खाना खाये। बस उसी दिन से बादशाह को शिक्षा मिल गई और फिर बीरबल को कभी भोजन का निमंत्रण नहीं दिये। एक कृपिण पुरुष दिल्ली नगर में एक महा कंजूस धनवान रहता था।
२६५ | अकबर बीरबल विनोद
२६५ | अकबर बीरबल विनोद एक दिन एक कवि अपनी कविता बनाकर उसके पास ले गया। कवि का अभिप्राय था-"उस धनाढ्य को प्रसन्न करा उससे कुछ धन उपार्जन करना।" परन्तु उसकी सूरत देखते ही सूमड़े का मन पल्टा खा गया। उसने अपने मन में कहा-"यह कवि मुझे अपनी कविता सुनाकर मुझसे धन ठगने आया है, परन्तु इसने मुझे पहचानने में बड़ी भूल की है। अच्छी बात है जिस तरह यह कविता से मुझे प्रसन्न करना चाहता है उसी भाँति मैं भी अपनी मीठी २ बातों से इसे प्रसन्न कर कोरा लौटाऊँगा।" ऐसी युक्ति सोचकर वह धनाढ्य बोला-"कविवर! आपकी कविता तो बड़ी ही उत्कृष्ट है। इसका शब्दालंकार और अनुप्रास का जमक बड़ा ही उत्तम है। मैं अपनी जबान से अधिक क्या कहूँ इसकी जहाँतक विशेषता दिखलाई जाय सब थोड़ी है। कृपाकर आप दूसरे दिन फिर मुझसे मिलियेगा, मैं आपको प्रसन्न कर दूँगा।" उसके ऐसे प्रशंसनीय वाक्यों को सुनकर कवि फूला न समाया और तत्क्षण वहाँ से बिदा हुआ। दूसरे दिन ठीक उसी समय कवि धनाढ्य के पास गया। बात छिपाने के लिये धनाढ्य उसे देखकर अपनी गरदन टेढ़ी कर ली, वह घंटों उससे पुरस्कार पाने की प्रतीक्षा में बैठा रहा अन्त में कोई अर्थ न निकलते देख सेठ के आगे जा खड़ा हुआ। सेठ ने पूछा-"तुम कहाँ के रहने वाले हो और मेरे यहाँ क्यों आये हो?" सेठने इस रुखाई से बात किया मानों उसकी उस कवि से कभी का परिचय ही नहीं था। विचारा कवि बहुत चकराया और मन ही मन देवता पित्तर मनाकर
अकबर बीरबल विनोद २६८
अकबर बीरबल विनोद २६८ आयोजन नहीं किया गया था। और लोग तो अपने घरसे भोजन करके आये ही थे, विचारा कंजूस ही भूखा तड़प रहा था। बहुत देरतक इस आसा में था कि अब भोजनकी बारी आती है। शायद भोजन की तय्यारी में कुछ कमी पड़ गई हो, जिससे इतना विलम्ब हो रहा है। जो कुछ था सो थाही। धीरे २ दिन ढलने लगा, फिर भी किसी ने कंजूसकी सुधि न ली। तब वह बोला- "क्यों भाई, अब भोजन में कितनी देर है, शीघ्रता करो।" कविका मित्र बोला-"कैसी शीघ्रता श्रीमानजी?" सूमड़े ने कहा- "क्या आपने मुझे आज के लिये निमंत्रण नहीं दिया था क्या?" तबतक बीरबल बोल उठा- "सो तो आपने ठीक कहा है, परन्तु यह बात केवल आपको प्रसन्न करने के लिये कही गई थी नहीं तो भला इतनी देर क्योंकर होती। हम लोग तो कभी के भोजन कर चुके हैं।" ऐसी कोरी चापलूसी से सूमड़े का मुख लाल हो गया और वह अपनी बड़ी बड़ी आँखें चढ़ाकर बोला- "तुम लोग बड़े उच्छृङ्खल जान पड़ते हो जो किसी को निमंत्रण देकर बुलाना और फिर उसकी हँसी करना?" इसी प्रकार की अनेक बातें कह कहकर वह कंजूस कमर कसकर लड़ने पर आमादा हो गया।" बीरबल ने देखा कि अब बात बहुत आगे बढ़ जायगी इस लिये बीच बिचाव के अभिप्राय से बोला- "आप तो एक उच्च कोटि के रईस हैं, फिर आपको यह विचार पहले ही आना चाहिये था। क्या आपने इस कवि को ठट्टे बाजी में नहीं टाला था, क्या आपके उस मनोरंजन से इसको कष्ट नहीं हुआ था?"
२६६ अकबर बीरबल विनोद
२६६ अकबर बीरबल विनोद सूमड़े ने कहा-“ठीक ठीक बतलावो वह कौन सा कवि है और आप कौन हैं?” बीरबल बोला-“मैं बीरबल हूँ, अब भलाई की बात यह है कि इसी समय इस कवि को राजी करो; नहीं तो कानूनन तुम्हें दण्ड दिया जायगा।” बिचारा सूमड़ा बीरबल के नाम से डर गया और तुरत अपने कहे के अनुसार रुपये देकर कवि को प्रसन्न कर दिया।” किसी ने ठीक कहा है। “सीधे अँगुली घी नहीं निकलता।” लकीर छोटी होगई एक दिन बादशाह ने बीरबल को झुकाने के विचार से एक भूल भुलैया की चाल निकाली। वह एक लकीर जमीन पर खींचकर बीरबल से बोले-“बीरबल ! इस लकीर को बिना काटे छाँटे छोटी कर दो। बीरबल तो पूरा गुरु घण्टाल था ही, उस लकीर को न घटाया और न बढ़ाया, बल्कि उसके पास ही अपनी उँगली से एक दूसरी लकीर उससे भी बड़ी खींचकर बोला-“लीजिये पृथिवीनाथ ! अब आपकी लकीर इससे भी छोटी हो गई।” बादशाह बीरबल की बुद्धि से हार मान गया। ब्राह्मणी पर मांसखोरी का अभियोग । दिल्ली नगर में एक नौयोबना और स्वरूपवती ब्राह्मणी रहती थी। यह अपने पति परायणता के कारण सारे नगर में विख्यात हो रही थी। एक पठान नीचता वश गुप्तरूप से
अकबर वीरबल विनोद २७०
अकबर वीरबल विनोद २७० इसके पीछे पड़ा हुआ था। इसको अपने वश में लाने के लिये उस नीचने बहुतेरा प्रयास किया, परन्तु फिर भी उसे सफ- लता न मिली। ब्राह्मणी के तेज के आगे उसका उद्योग गिरता ही गया। तब उसने दण्ड देकर उसको काबू में लाने की युक्ति निकाली। एक दिन जब कि वह सुन्दरी अपने वस्त्रों को पछारने के लिये नदी तट पर गई थी। यह भी मौका देखकर वहाँ जा पहुँचा। वहाँ और किसी को न देखकर गुप्तरूप से उसके तटपर पड़े वस्त्रों में थोड़ा सा मांस बाँध एक चौकीदार को घूस देकर झूठा मामला खड़ा किया। और वह चौकीदार को सिखला पढ़ाकर भेजा कि वह उस सुशीला पर एक पठान के यहाँ से मांस खरीदने का अभियोग लगाकर उसे गिरफ्तार करलें। जब वह स्त्री अपने कपड़े पछाड़कर बाकी सूखे कपड़ों को उठाया तो उसमें मांस के टुकड़े बँधे हुए देखकर आश्चर्यचकित हो गई। तत्क्षण उस चौकीदार ने उसे जाकर गिरफ्ता कर लिया और बोला- "तू मांस भक्षण करती है इसकारण तुझे बादशाह के पास चलना पड़ेगा।" वह एक तरफ तो तुम्हारी धर्मरक्षा का इतना प्रबन्ध करते हैं दूसरी तरफ तूँ गुप्तरिति से मांस भक्षण करती है और फिर धोखा देकर अपने जात बिरादरी के लोगों को ठगती फिरती है। सिपाही को ऐसा अपवाद लगाते देखकर विचारी अबला किंकर्तव्य विमूढ़सी होकर चुप रह गई। इसी बीच वह दुष्ट पठान जो छिपकर सब देख रहा था चौकीदार के पास उस स्त्रीका पक्षपाती बनकर आया और उस से उसको
२७१ अकबर बीरबल विनोद
२७१ अकबर बीरबल विनोद छोड़ देने का अनुनय विनय करने लगा। वह बोला-"चौकी- दार साहब ! आप इस स्त्री को छोड़ दीजिये, इसने यह मांस मुझसे खरीदा था। यदि वादशाह को यह बात मालूम हो जायगी तो वह इसके बदले मुझे दंड देंगे। आप जानते ही हैं कि मैं एक कुटुम्बी आदमी हूँ। मेरे कैद हो जाने से मेरे बाल बच्चे भूखों मरने लग जायेंगे। इसलिये आप मेरी दीनता की तरफ ध्यान देकर इस मामले को यहीं पर दबा दीजिये। वर्ना बादशाह मुझे इस मामले में अपराधी पाकर मुझे फाँसी दिला देंगे।" चौकीदार उसकी एक बात भी न सुनी, वह तो पहले ही से सिखला पढ़ाकर ठीक किया गया था। दोनों को पकड़ कर बादशाह के पास ले गया और बोला-"पृथिवीनाथ! आज यह स्त्री इस पठान से मांस खरीद कर घरवालों से छिपा नदी के किनारे बैठकर भक्षण कर रही थी। इसका दोनों चरित्र मैंने अपनी आँखों देखा है। इसलिये हुजूर के पास पकड़ लाया हूँ कि इसको उचित दंड दिया जाय।" बादशाह को चौकीदार की बातें सुनकर बड़ा रंज हुआ और उसके नाते गोते के लोगों को बुलवाकर उस स्त्री की चाल चलन के संबन्ध में पूछताछ की। परन्तु उनकी जबानी उस स्त्री का ऐसा दूषित होना सिद्ध न हुआ। दर्बार का समय था। धीरे २ दर्बारी लोग भी आने लगे थे। इस बात को सुनकर सभी लोग चकित होगये। किसी को उस स्त्री का ऐसा दूषित स्वभाव होना संभव नहीं जान पड़ता था। परन्तु कोई उसकी शुद्धता का भी कोई निश्चित प्रमाण देनेको प्रस्तुत न था।
अकबरवीरवल विनोद २७२
अकबरवीरवल विनोद २७२ आखिरकार वादशाह ने उसके ब्राह्मण पति को बुलवा कर बोला-"जैसा की यह चौकीदार बयान करता है उस हिसाब से यह स्त्री भ्रष्टा हो चुकी है। अतएव इसे इस पठान को दे देना चाहिये और पठान को यह सजा दी जाती है कि वह इसके बदले सात सौ रुपये इसके, विवाहिता पति को दंड स्वरूप देवे।" वादशाह के ऐसे न्याव को सुनकर विचारी पतिपरायणा ब्राह्मणी सूखकर काँटा हो गई। फिर अधिक क्या लिखें पाठक एक सती साध्वी का ऐसा अपमान होने पर कैसी दशा होगी, स्वयं अनुमान कर सकते हैं। एकदम न्याय का गला घोंटा जाने लगा। दयालू ईश्वर की सत्ता स्थिर न रह सकी। सुदर्शन चक्रधारी की प्रेरणा से कई ब्राह्मण इस बात की फरियाद लेकर बीरबल के पास गये। बीरबल को अन्याय सहन नहीं होता था, इसी कारण वह अपने पर जोखिम उठाकर भी अन्याय को रोकता था। वह अपना घरेलू काम उसी क्षण बन्दकर दिया और कपड़े पहन उन ब्राह्मणों को साथ लेकर दरबार में हाजिर हुआ। बीरबल ने बारी बारी से पठान, चौकीदार तथा उस ब्राह्मणी का बयान लिया, फिर स्त्री से यों पूछा- "भगने ! घरसें निकलते वक्त कुछ खाया था या योहीं नदी के तटपर कपड़े पछाड़ने के लिये चली आई थी। इसका प्रमाण कोई दे सकती हो तो बतलाओ।" सुशीला ने उत्तर दिया-"मेरी सासने मुझे दूध और रोटी दिया था बस उसीको खाकर घर से निकली थी।" बीरबल ने कहा- "बहुत अच्छा थोड़ी देर एक जगह बैठकर तबतक विश्राम करो मैं इसकी जाँच कराऊँगा।"
२७३ अकबल बीरबल विनोद
२७३ अकबल बीरबल विनोद
बीरबल ने एक चपरासी को भेजकर एक विख्यात वैद्य को बुलवाया, जब वह हाजिर हुआ तो बोला-"वैद्यजी ! इस स्त्री को ऐसी दवा खिलावो जिससे इसे वमन हो जावे । वैद्य ने वमन होनेकी एक गोली खिलाई, जिसके खानेके थोड़ी देर बाद ही उस स्त्री का खूब वमन हुआ । वमन का भली- भाँति निरीक्षण करने पर उसमें दूध रोटी के अतिरिक्त मांस का एक टुकड़ा भी नहीं निकला । इस दृश्य को देखने के साथ ही सबको उस स्त्री की पवित्रता पर विश्वास होगया । झूठा दोषारोपण के अपराध में पठान और सिपाही दोनों ही दण्डित किये गये । स्त्री को उसके पति के हवाले किया गया । बीरबल की इस अनुपम चातुर्य्यता का लोगोंपर गहरा प्रभाव पड़ा और वे एक स्वर से बीरबल की प्रशंसा करने लगे ।
खटिक और तेली एक दिन दिल्ली नगर के एक खटिक और तेली के अन्तर- गत कुछ विवाद खड़ा हो गया और वे आपस की लड़ाई को लेकर न्याय कराने के अभिप्राय से बीरबल के पास पहुँचे । तब बीरबल बोला- "आप लोगों में कौन वादी है और कौन प्रतिवादी । तेली अपने को वादी बतलाता और खटिक अपने को प्रतिवादी । बीरबल ने कहा-"अच्छी बात है । तुम लोग अपना ठीक ठीक हाल बयान करो ।" तेली ने कहा-"दीवान जी ! मैं अपनी एक छोटी सी दूकान अमुक महल्ले में रखता हूँ, एक दिन जब कि मैं अपनी दूकान पर बैठा माल खरीद
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अकबर बीरबल विनोद
२७४ अकबर बीरबल विनोद फरोख्त कर रहा था, यह खटिक मेरी दूकान पर आकर मुझसे तेल माँगने लगा, मैंने इसके बार २ माँगने पर और कामों का हर्ज करके इसको तत्काल तेल दे दिया, दूसरे-दूसरे कामों का बहुत भंझट था, फिर मैं उन कामों में लिपट गया। जब कुछ देर बाद उन भंझटों से खाली हुआ तो क्या देखता हूँ कि पैसे की थैली गायब है। उतने समय के बीच इसके अतिरिक्त कोई दूसरा व्यक्ति मेरी दूकान पर नहीं आया था, जिस कारण मुझे इस खटिक पर सन्देह हुआ और तुरत इसके पास दौड़ा हुआ गया, थैली खटिक के हाथ में ही थी, जब मैंने उससे अपनी थैली माँगी तो बोला- "क्या तेरा दिमाग खराब हो गया है, जो इस प्रकार दूसरे का धन देखकर उसपर लोभ करता है। यह थैली मेरी है।" यही मेरा मामला है जो आपके सामने सच्चा सच्चा बयान किया है। ईश्वर मेरा साक्षी है जो मैं एक बात भी झूठी कहे हूँ।" आपसे अनुरोध करता हूँ कि इसका न्याय कर आप मेरी थैली मुझे दिलवा दें।" तब खटिक के बयान की बारी आई। वह बीरबल से बोला- "गरीबपरवर! आज मैं अपने बिक्री के पैसेका मिजान लगा रहा था; जब कि यह तेली मेरी दूकान पर तेल लेकर आया। यह मेरा निकट पड़ोसी है, मैं बराबर इससे तेल खरीद करता हूँ। यह तेल देकर तुरत चला गया। जब कुछ देर बाद मैं पैसों का मीजान लगा चुका तो उन्हें गिनकर रखने के लिये थैली की तरफ देखा। थैली गायब हो गई थी। इसके अन्तर्गत यही तेली मेरी दूकान पर आया था। मुझे शक हो गया और दौड़कर इसे रास्तेही में पकड़
२७५ अकबर बीरबल विनोद
२७५ अकबर बीरबल विनोद लिया। यह मुझे देखकर सिटपिटाने लगा और चाहता था कि चकमा देकर मुझे कोरा लौटा देवे। मैंने झपटकर इसके हाथ से पैसों की थैली छीन ली।” यही मामला है, मैंने अपना सारा वयान सही सही दिया है। अगर एक शब्द भी झूठा हो तो ईश्वर मुझे दंड दे। हजूर समर्थ हैं मेरा न्याय कर देवें ।” उन दोनोंका बयान सुनकर उस समय वीरबल उन्हें घर जाने की आज्ञा दी और बोला-“कल्ह फिर तुम लोग इसी समय हाजिर होना। न्याय हो जाने तक इस पैसे की थैली को मेरे पास छोड़ जावो। थैली वहीं छोड़कर वे दोनों अपने अपने घर गये। इधर बीरबल ने एक नई युक्ति सोचकर पैसों को गरम पानी में धुलवाया; उसको धुलवाने से यह अभिप्राय था कि यदि तेली के पैसे होंगे तो उसमें तेल लगा होगां और तेल गरम पानी पर उतरा जायगा; परन्तु ऐसा न हुआ बल्कि पैसों से और प्रकार की महक आने लगी। बीरबल को अब निश्चित हो गया कि वे पैसे तेली के नहीं हैं। वह प्रलोभन में आकर झूठा फरेब रचता है। इसका असली मालिक खटिक ही है। दूसरे दिन जब वे उपस्थित हुए तो बीरबल ने उनके हाथ पर गीता की पुस्तक और गंगाजल रखकर कसम खिलवाया। परन्तु उसमें भी कोई न हटा तात्पर्य कि उन दोनों ने ही कसम खाली। तब बीरबल ने उस थैली को खटिक के हाथ में सपुर्द कर दी और तेली को धोखेबाजी के अपराध में उचित दंड दिया। तेली की खूब कोड़ों से मरम्मत होने के पश्चात् विदाई की आज्ञा मिली।
अकबर बीरबल विनोद
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अकबर बीरबल विनोद
दौलत ड्योढ़ी पर हाजिर है
एक दिन बादशाह किसी कार्य में त्रुटि पड़ने के कारण अपने दौलत नामी पुराने सेवक पर नाराज होकर उसे नौकरी से पृथक कर दिये। बिचारा सेवक अपनी बचत का कोई दूसरा उपाय न देखकर बीरबल के पास अपने छुटकारे के लिये गया। बीरबल उसका सारा समाचार सुनकर बोला— "तुम एक बार फिर महल में जाकर कहो कि दौलत ड्योढ़ी पर हाजिर है, हुक्म हो तो रहे वा जाय।"
सेवकने वैसा ही किया। बादशाह ने उसे बुलवाकर धीरे से समझाया—"दौलत मेरे यहाँ हमेशा कायम रहे।" बादशाह की और उस पुराने नौकर की अर्थभरी बातों को समझ कर सब दरबारी हँसने लगे। बीरबल की युक्ति से विचारे वृद्ध सेवक की जीविका बनी रह गई।
तानसेन और बीरबल की बुद्धि-परीक्षा
अकबर बादशाह का दरबार नौरत्नों से विभूषित था। उनमें एक रत्न का नाम तानसेन भी था। ये जाति का मुसलमान और गान और वाद्यविद्या में बड़े पंडित थे। इनकी गानेकी विशेष कला देश देशान्तर में फैली हुई थी, दूर देश के राजे अक्सर तानसेन के गाने को सुनने के लिये दिल्ली आते थे और उसका गान सुनकर लौट जाते थे। अपने राज्य में जाकर वे तानसेन की बड़ी प्रशंसा करते इसलिये तानसेन
२७७ अकबर वीरबल विनोद
२७७ अकबर वीरबल विनोद पर दिल्ली के मुसलमानों का बड़ा अभिमान था। वे समझते थे कि तानसेन दिल्ली दरबार में सर्वश्रेष्ठ पुरुष है। परन्तु वीरबलको इससे भी बड़े पद पर देखकर उनको बड़ा क्षोभ उत्पन्न होता था। वे हमेशा बीरबल को गिराने की ताक में लगे रहते थे। यहाँ तक कि छिपे तौर से समय समय पर बादशाहके सामने तानसेन की प्रशंशा किया करते थे। एक दिन दरबार के समय बादशाह बैठे हुये थे और बहुत से मुसलमान दरबारी उनसे बातें कर रहे थे। एक मुस- लमान ने मौका देखकर तानसेन की बुद्धि विशेषता पर वार्ता छेड़ी। वह जब कभी तानसेन की बड़ाई करता तो वहाँ बीरबल का नाम अपनी जबान पर नहीं लाता था। उसकी बराबर की प्रशंसा सुनते सुनते बादशाह ऊब गये और मुसलमान दरबारियों का भीतरी भाव समझकर बोले- "मैं तुम लोगों के मुख से तानसेन की बारम्बार प्रशंसा सुना करता हूँ और मुमकिन है कि तुम्हारा कहना सत्य भी हो, परन्तु फिर भी वह बीरबल को बराबरी करने योग्य नहीं है।" बादशाह के इस मार्मिक फटकार से मुसलमान दरबारियों को बड़ा कष्ट हुआ परन्तु वे दरबार के समय और कुछ न कहकर चुप रह गये। जब दरबार समाप्त हो गया तो वे संध्या समय एक सरदार के यहाँ एकत्रित हुए और आपस में अन्तरंग मीटिंग कर उस सरदारकी बैठक को तत्कालीन सामग्रियों से खूब विभूषित किया। बैठक के मध्य में बादशाह को बैठने के लिये एक सुवर्ण निर्मित सोनेका सिंहासन सजाकर रक्खा गया। तानसेन भी अपने वाद्य सामग्रियों के सहित पधारे तब
अकबर बीरबल विनोद २७८
अकबर बीरबल विनोद २७८ कई गण्यमान्य सरदार आपसमें मिलकर बादशाह के पास गये और आग्रह कर उन्हें अपने सरदार की बैठक में ले आये। उधर सरदार के कर्मचारियों ने बादशाह के आनेके पहले ही कमरे में दीपकों को सजाकर रख छोड़े थे। दीपकेँ तेल बत्ती से लैसकर बिना जलाये ही रखी गई थीं। बादशाह के आने पर तान- ने दीपक राग गाने के आज्ञा दी गई। तानसेन के दीपक राग छेड़ते ही सारे दीपक आपसे आप जल गये और सर- दार की बैठक एकाएक प्रकाशित हो गई। गरमी का मौसम था उस दिन बड़ी गरमी बढ़ रही थी। तानसेन ने देखा कि गरमी की अधिकता से बादशाह बेचैन हो रहे हैं अतएव तुरत मलार गाने लगा, मलार गाते ही वृष्टि होने लगी और थोड़ी ही देर में सब गरमी शान्त हुई। ऐसी उपयुक्त वृष्टि से सब लोग बड़े हर्षित हुए। इन घटित घटनाओं को देखकर बादशाह को बड़ा हर्ष हुआ। मुसलमान सरदार तो अपना मतलब गाँठने के लिये ही यह समाज एकत्रित किये हुए थे। बादशाह को हर्षित देखकर मुमताज उद्दीन नामी सर्वश्रेष्ठ उमराव हाथ जोड़कर बोला-“पृथिवीनाथ! अब आपको तानसेन की बुद्धि विशेषता पर सन्देह करने का कोई कारण शेष नहीं रह गया होगा। आशा है कि आप आजसे तानसेन की बुद्धि को बीरबल की बुद्धि से श्रेष्ठ मान लेंगे और न्याय की मर्यादा कायम रखने के लिये तानसेन को बीरबल का पद प्रदान करेंगे।” कई दूसरे सरदारों ने भी पहले सरदार की प्रार्थना का अनु- मोदन किया। सब सरदारों की सम्मति समझ चुकने के
२७६ अकबर बीरबल विनोद
२७६ अकबर बीरबल विनोद पश्चात् बादशाह बोले-“हाँ यह आप लोगों का कहना सत्य है कि तानसेन बहुत बड़ा विद्वान् है, परन्तु फिर भी वह बीरबल की समता नहीं कर सकता, यदि तुम लोगों को विश्वास नहीं है तो वह दिन नजदीक है जब कि मैं सारी बातें प्रत्यक्ष, करके तुम्हें दिखला दूँगा। कुछ दिनों तक बादशाह ने इस बात की चर्चा नहीं की जब उन्हें भलीभाँति विदित हो गया कि अब सरदारों को बात भूल गई तो एक दिन ब्रह्मदेश के बादशाह के नाम एक पत्र लिखकर तानसेन और बीरबल को एक साथ भेजने का निश्चय किया। पत्रके भीतर लिखा हुआ था कि इस पत्र को ले जाने वाले इन दोनों आदमियों को तुरत शूली दिला देना। पश्चात् बादशाह ने बीरबल और तानसेन को बुलाया और कुछ आवश्यक कार्य्यका बहाना कर दोनों को पत्र देकर ब्रह्मदेश के राजा के पास भेज दिया। इनको भेजते समय बादशाह बोले- “देखो तानसेन, यह बड़ा गूढ़ काम है, यदि दूसरे को भेजूं तो यह हल नहीं हो सकता। इसलिये बहुत समझ बूझकर तुमदोनों को भेज रहा हूँ अविलम्ब ब्रह्मदेश के महाराज के पास जाओ और जैसे हो सके इसको निपटा कर शीघ्र वापस लौट आओ।” उन्होंने “बहुत अच्छा” कहकर पत्र को ले लिया और घरपर पहुँच रास्ते के लिये खाने पीने का प्रबन्ध कर ब्रह्मदेश के लिये प्रस्थान किया। बीरबल रास्ते में मनो मन अनुमान करता जा रहा था-“हो न हो इस काम के अन्दर कोई गूढ़ भेद छिपा हो, खैर देखा जायगा, अब तो थोड़े दिन पश्चात् वह सामने ही
अकबर बीरबल विनोद २८०
अकबर बीरबल विनोद २८० आनेवाला है, नाहक मूड़ मारने से क्या लाभ । समय आने परविवेक से काम लेना होगा।" इधर तानसेन ने अपने मनमें अनुमान किया-"यह कोई बहुत कठिन काम होगा जो केवल बीरबल के किये नहीं हो सकता था इसलिये बादशाहने मुझको भी उसके साथ भेजा है। लो अच्छा ही हुआ भ्रमण का भ्रमण होगा और गायन सुनाकर राजा को प्रसन्न कर पारितोषिक अलगसे लूँगा।" ऐसा अनु- मान कर वह मनमें फूला नहीं समाता था। बादशाह ने इनको सवारी के लिये तेज घोड़े दिये थे इसलिये थोड़े ही दिनों की यात्रा के पश्चात् ये ब्रह्मदेश की राजधानी में जा पहुँचे । जिस समय ये ब्रह्मदेश के सरहद् पर पहुँचे सूर्यास्त हो रहा था। कोई परिचय का भी नहीं था, लाचार होकर वह रात्रि नगर के बाहर ही टिककर बितानी पड़ी। ब्रह्म- देश जंगल और पहाड़ों से भरा पड़ा है। इनको वहाँ की आव हवा का कुछ भी ज्ञान न था अतएव बीरबल की अनुमति से उन दोनों ने बारी बारी दो दो घन्टे की सोने और जागने की ओसरी बनाया। जब बीरबल सोता तो तानसेन पहरे पर रहता और जब तानसेन सोता तो बीरबल पहरे का काम करता। बीरबल अभी प्रथम पहर के पहरे पर था कि इसी बीच वहाँ पर एक वृद्ध पुरुष आया और इनका ढंग देखते हुए इन्हें परदेशी समझ कर बोला-“ आप लोग मुझे परदेशी से जान पड़ते हैं और यह स्थान जंगली है; यहाँ पर सिंह का आक्रमण हुआ करता है। अतएव रात्रि में तुम्हारा यहाँ निवास करना अच्छा न होगा। तुम
२८१ \qquad अकबर बीरबल विनोद
२८१ \qquad अकबर बीरबल विनोद लोग चलकर मेरी झोपड़ी में विश्राम करो, सुबह होते ही अपने रास्ते चले जाना।” बीरबल ने पहले तो बूढ़े के प्रस्ताव को अनमनस्क होकर टाल दिया, परन्तु उसके बारंबार आग्रह करते रहने पर दोनों अपने २ घोड़ों पर सवार होकर उसके साथ हो लिये। कुछ दूर चलकर बूढ़े का झोपड़ा मिला। वह घोड़ों को अपने बाड़े में बँधवा कर उन्हें झोपड़े में लिवा ले गया और उनके विश्राम के लिये दो पृथक् पृथक् स्थान दिखला कर आप भी अपनी चारपाई पर जा लेटा। सबेरा होते ही बीरबल वहाँसे प्रस्थान करने की तय्यारी करने लगा। इतने में वह बुड्ढा ठेंगता २ आ पहुँचा और बीरबल से आग्रह पूर्वक बोला-“आप लोग न जाने मेरे किस पूर्व पुण्य से इस झोंपड़ी में आ गये हैं। रात्रि में आपके भोजनादि का कुछ प्रबन्ध नहीं हो सका जिस कारण मैं बड़ा शरमिन्दा हूँ, परन्तु अब आपको यहाँ से बिना भोजन किये जाना मुनासिब नहीं है, मुझ दीन की यह क्षुद्र सेवकाई आपको स्वीकार करना उचित और धर्मसंगत है।” बीरबल ने देखा कि एक तो हम लोग एक दिन के भूखे हैं दूसरे परदेश का मामला है। कब भोजन की व्यवस्था होगी और कब नहीं, इससे बेहतर है कि इस बुड्ढे वाली करके चलें। बुड्ढा बीरबल की स्वीकृति प्राप्त कर प्रसन्न हो गया और तुरत जंगली खाद्य सामग्रियों को लाकर उनको भोजन कराया। तब दोनों प्रसन्न प्रसन्न बुड्ढे से अनुमति लेकर नगर की तरफ अग्रसर हुए। ब्रह्मदेश की राजधानी आवा नगरी बड़ी मनोरम थी। वहाँ