अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा
स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२७५ अकबर बीरबल विनोद लिया। यह मुझे देखकर सिटपिटाने लगा और चाहता था कि चकमा देकर मुझे कोरा लौटा देवे। मैंने झपटकर इसके हाथ से पैसों की थैली छीन ली।” यही मामला है, मैंने अपना सारा वयान सही सही दिया है। अगर एक शब्द भी झूठा हो तो ईश्वर मुझे दंड दे। हजूर समर्थ हैं मेरा न्याय कर देवें ।” उन दोनोंका बयान सुनकर उस समय वीरबल उन्हें घर जाने की आज्ञा दी और बोला-“कल्ह फिर तुम लोग इसी समय हाजिर होना। न्याय हो जाने तक इस पैसे की थैली को मेरे पास छोड़ जावो। थैली वहीं छोड़कर वे दोनों अपने अपने घर गये। इधर बीरबल ने एक नई युक्ति सोचकर पैसों को गरम पानी में धुलवाया; उसको धुलवाने से यह अभिप्राय था कि यदि तेली के पैसे होंगे तो उसमें तेल लगा होगां और तेल गरम पानी पर उतरा जायगा; परन्तु ऐसा न हुआ बल्कि पैसों से और प्रकार की महक आने लगी। बीरबल को अब निश्चित हो गया कि वे पैसे तेली के नहीं हैं। वह प्रलोभन में आकर झूठा फरेब रचता है। इसका असली मालिक खटिक ही है। दूसरे दिन जब वे उपस्थित हुए तो बीरबल ने उनके हाथ पर गीता की पुस्तक और गंगाजल रखकर कसम खिलवाया। परन्तु उसमें भी कोई न हटा तात्पर्य कि उन दोनों ने ही कसम खाली। तब बीरबल ने उस थैली को खटिक के हाथ में सपुर्द कर दी और तेली को धोखेबाजी के अपराध में उचित दंड दिया। तेली की खूब कोड़ों से मरम्मत होने के पश्चात् विदाई की आज्ञा मिली।