अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा
स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२७४ अकबर बीरबल विनोद फरोख्त कर रहा था, यह खटिक मेरी दूकान पर आकर मुझसे तेल माँगने लगा, मैंने इसके बार २ माँगने पर और कामों का हर्ज करके इसको तत्काल तेल दे दिया, दूसरे-दूसरे कामों का बहुत भंझट था, फिर मैं उन कामों में लिपट गया। जब कुछ देर बाद उन भंझटों से खाली हुआ तो क्या देखता हूँ कि पैसे की थैली गायब है। उतने समय के बीच इसके अतिरिक्त कोई दूसरा व्यक्ति मेरी दूकान पर नहीं आया था, जिस कारण मुझे इस खटिक पर सन्देह हुआ और तुरत इसके पास दौड़ा हुआ गया, थैली खटिक के हाथ में ही थी, जब मैंने उससे अपनी थैली माँगी तो बोला- "क्या तेरा दिमाग खराब हो गया है, जो इस प्रकार दूसरे का धन देखकर उसपर लोभ करता है। यह थैली मेरी है।" यही मेरा मामला है जो आपके सामने सच्चा सच्चा बयान किया है। ईश्वर मेरा साक्षी है जो मैं एक बात भी झूठी कहे हूँ।" आपसे अनुरोध करता हूँ कि इसका न्याय कर आप मेरी थैली मुझे दिलवा दें।" तब खटिक के बयान की बारी आई। वह बीरबल से बोला- "गरीबपरवर! आज मैं अपने बिक्री के पैसेका मिजान लगा रहा था; जब कि यह तेली मेरी दूकान पर तेल लेकर आया। यह मेरा निकट पड़ोसी है, मैं बराबर इससे तेल खरीद करता हूँ। यह तेल देकर तुरत चला गया। जब कुछ देर बाद मैं पैसों का मीजान लगा चुका तो उन्हें गिनकर रखने के लिये थैली की तरफ देखा। थैली गायब हो गई थी। इसके अन्तर्गत यही तेली मेरी दूकान पर आया था। मुझे शक हो गया और दौड़कर इसे रास्तेही में पकड़