आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४ आल्हखण्ड । कान्ह कुँवरहू अतिकोपित भा यहु रजपूत वीर चौहान ॥ लीन्हे भाला नागदवनि का क्षत्रिनमारिकीन खरिहान १०७ औ ललकारा रतीभान का ठाकुर खबरदार ह्वैजाय ॥ यह कहि मारा तलवारी का सोपै लैगा वार बचाय १०८ आपौ मारा तलवारी को परिगै कान्ह कुँवर शिरजाय ॥ ककरी ऐसी खपरी फाटी पै शिखांधि तहांरहिजाय १०९ खैंचि सिरोही को कम्मर सों मारा रतीभान को धाय ॥ रतीभान फाटक पर गिरिगे गिरिगो कान्हकुँवरभहराय ११० दोऊ जूझे जब फाटक में डोला अटा महल में जाय ॥ उतरिकै डोला सों संयोगिनि बैठी रङ्ग महल में आय १११ चंद कवीश्वर फिरि जल्दी सों पहुँचा जहां चँदेलाराय ॥ औ फिरि बोला हाथ जोरिकै ओ महराज कनौजीराय ११२ लाखन जूझे दिल्ली वाले लाखन कनउज के सरदार ॥ बड़ी लड़ाई दउदल कीन्ह्यो ज्यहिका रहा न वारा पार ११३ बचा पिथौरा अब इकलो है ज्यहिका राखिलीन भगवान ॥ त्यहि नहिं मारो महाराजा तुम मानों सत्य बचन परमान ११४ लौटि कनौजै जो चलि जइहौ कीरति बनी रही संसार ॥ हारि तुम्हारी कोउ गाईना राजा कनउज के सरदार ११५ कनउज तेनी औ दिल्ली लौं कीन्ह्यो घोर शोर घमसान ॥ अस कोउ क्षत्री मैं देखों ना जोफिरिकैरैसमरअभिमान ११६ चंद कवीश्वर की बातें सुनि बोला कनउज का महराज ॥ कहा तुम्हारो हम टारब ना मानोसत्यबचनकबिराज ११७ - बड़ो भरोसो तुम हमरो करि आयो मिलन हमारे पास ॥ कहा तुम्हारो जो मानैंना तौफिरिजावोआपनिराश ११८