भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

पृष्ठ 44, कुल 618 में से

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महोबेकाप्रथमयुद्ध । ३६ ३ त्यहिते तुम का समुझावत हौं बचुवा मानो कहा हमार ॥ राह कनौजी कै तहँते है ठाकुर समरधनी तलवार ६ हाथ जोरिकै करिया बोल्यो दोऊ चरणन शीश नवाय ॥ मने न करिये म्वहिं गंगा को दहुवा बार बार बलिजायँ १० पार लगे हैं श्री गंगाजी मेरो बार न बांको जाय ॥ पकरो जइहौं जो मेला में पैसा माफ लेउँ करवाय ११ हुकुम जो पावौं मैं दहुवा को तौ फिरि गंगाअवौं अन्ह्याय ॥ बिनती सुनिकै बहु करिया की जम्बै हुकुम दीन फरमाय १२ हुकुम पायकै सो जम्बै को अपने कह्यो सिपाहिन बात ॥ करो तयारी जाजमऊ की गंगा न्हान हेतु हम जात १३ हुकुम पायकै सो करिया का तुरतै होन लागि तय्यार ॥ झीलम बख्तर पहिरिसिपाहिन हाथ म लीन ढाल तलवार १४ यक यक भाला दुइ दुइ बरछी लीन्हेनि कड़ाबीन सबज्वान ॥ बजे नगारा त्यहि सम या माँ भारी होन लाग घमसान १५ करिया चलिभा त्यहि समया माँ माता भवन पहूँचा जाय ॥ हाथ जोरिकै करिया बोल्यो माता चरणन शीशनवाय १६ मोहिं आज्ञा है दंदुवा की गंगा न्हान हेतु हम जायँ ॥ आज्ञा पाऊँ जो माता की तौसब काज सिद्धह्वैजायँ १७ बातैं सुनिकै ये करिया की मातैं हुकुम दीन फरमाय ॥ चूम्यो चाट्यो हृदय लगायो आशिर्वाद दीन हर्षाय १८ बहिनि बिजैंसिनि तब बोलत भै भैया बार बार बलिजाउँ ॥ मोहिं निशानी कछु लैआयो जासों यादिकरुं तव नाउँ १६ इतनी सुनिकै करिया बोला बहिनी मानो कहा हमार ॥ लवों निशानी मैं मेलाते बहिनी कहा न टारौं त्वार २०

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