भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

पृष्ठ 107, कुल 811 में से

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पृष्ठ 107

सर्गः ९ ] सारकाण्डम् ९१


तदाऽपरत्वं स्वं प्राह कपिस्तन्नच मर्षित मः । मन्वा दशास्यस्तं प्राह पुनः सत्यं वदेति च ॥१८१॥
तदा स मारुतिस्तूष्णीं क्षणं चित्ते व्यचिन्तयत् । ममितुश्च सखा वह्निस्तस्मान्नास्ति भयं मम ॥१८२॥
तस्मात्पुच्छं दीपयित्वा लंकां दग्ध्वाऽऽगमेष्यहम्। ततस्तं रावणं प्राह मारुतिः सदसि स्थितः ॥१८३॥
पुच्छं मे वह्निना दाघं भविष्यति न चान्यतः । तत्तस्य वचनं श्रुत्वा रावणो निजकिंकरान् ॥१८४॥
आज्ञापयामास पुच्छं दीपयित्वा प्रयत्नतः। लङ्कायां दर्शनीयोऽयं दुष्टेनं मद्भयं भवेत् ॥१८५॥
सर्वेषां मद्रिपूणां च तथा चक्रुस्त्वराऽन्विताः। तैलाक्तैः क्षणपट्टैश्च राक्षसा वसनैरपि ॥१८६॥
पुच्छं सवेष्टयामासुस्तदा पुच्छं व्यवर्द्धत । ततो वसनहर्तारस्त्वकोशान्विलुलुञ्च्य च ॥१८७॥
तत्पुच्छं देत्यः मानुगृहवस्त्रैरनेकशः । ततः पुरूषनारीणां लंकास्थानां नृपाज्ञया । १८८॥
बलादाच्छिद्य वस्त्राणि चक्रुः सर्वांन्दिगम्बरान् ततः शय्यामडर्याश्च कञ्चुकीः कञ्चुकानपि ॥१८९॥
पौराणां गजगेहानां च ने वस्त्राणि ममंनयन। दृष्ट्वाऽपूनिन्तु पुच्छस्य सभास्थानां नृपस्य च ॥१९०॥
वस्त्रमात्रैः समम्तैश्च लांगूलं वेष्टयस्तदा । ध्वजोल्लासपताकाभिश्चित्रित्राणां वसनैरपि ॥१९१॥
मंदोदर्यादिवर्सैश्च भिक्षूणां वसनादिभिः । वेष्टयन्कविलांगूलं ततः सीतां ययुश्चराः ॥१९२॥
तज्ज्ञात्वा मारुतिश्चापि पुच्छवृद्धिं न्यदर्शयत् । तदा कोलाहलश्चासीद्वस्त्रार्थे प्रतिमन्दिरि ॥१९३॥
तैलार्थं च घृतार्थे च स्नेहपाशं समंनयन् । नश्रीणिग्योर्दी पार्थं किंचूनामपि नो वृतम् ॥१९४॥
आमन्त्रीपुरूषा नया लज्जा नामीत्परस्परम् । ततस्तद्दीपयामासुर्व दना भक्तकपनेः ॥१९५॥
प्रदीपं नाभ्यागच्छत ततो मारुतिरब्रवीद् यदा स्वोन्मुखेनायं लज्जमानोऽद्य रावणः ॥१९६॥
वह्निं प्रज्वालयदत्र तदा ज्वाला भविष्यति । तन्मारुतिवचः श्रुत्वा ययवग्रे दशाननः ॥१९७॥
शाश्रुकम्कायवदनं तत्पुच्छमनलन्मने । तावर्त्ताच्छा जटाः श्मश्रुकूर्चा दस्थानदऽभवन् ॥१९८॥


इसपर जब हनुमान्ने अपना उत्तर बतलाया तब भी बालक मान न मानकर रावणने फिरसे कहा कि सच-सच बतला ॥ १८१ ॥ तब मारुति मनमे विचारने लगे कि अग्नि मेर पिताके मित्र हैं इसलिये मुझे उनका कोई बात नहीं है ॥ १८२ ॥ इसलिये अपनी पूँछ जलवाकर मैं लङ्काको ही जला डालूँगा । यह विचारकर सभामें स्थित रावणसे हनुमान्ने कहा- ॥ १८३ ॥ मेरी पूँछ अग्निसे जल सकती है, यह पक्की बात है यह सुनकर रावणने अपने नौकरोंको बुलाकर आज्ञा दी कि प्रयत्नपूर्वक इसकी पूँछ जलाकर इसे नगरभरम घुमाकर दिखला दो । जिससे कि समस्त शत्रुओंको मेरा डर लगन लगे । नौकरोंने भी वैसा ही किया और शीघ्र ही राक्षसमान सन तथा वस्त्राका तेलमे भिगोकर पूँछपर लपट दिया । वसन जब कुछ कम पड गये, तब बाजारके गोदामोंसे कपडे चुराकर धाक समय लाकर और राजाका आज्ञासे उन्होंने लङ्का- क नर नारियोंके वस्त्र छीनकर हनुमान्की पूँछम लपेटा ऐसा करके उन्होने सारे नगरके लोगोंको नंगा कर दिया । तथापि जब पूँछ नहीं ढंका ता शय्याके मुख्य ( मसहरी ) कंचुकयाक चोगे, पुरवासियो तथा राजाके हाथीक वस्त्र लाकर लपेट दिये । तिसपर भी जब पूरा नहीं पडा ता सभासदों तथा राजाके वस्त्र लाकर लपट दिये गये । ध्वजाएँ तथा पताकाएँ लाकर लपेटी गयीं। रानी मन्दोदरी, स धु-महात्माओ तथा भिक्षुओंके वस्त्र उतार-उतारकर लपट दिये और सीताकी भी साड़ी उतारनेके लिए कुछ दूत दौड़े ॥ १८४-१९२ ॥ यह देखकर हनुमान्ने पूँछ बढ़ाना बन्द कर दिया। तब प्रत्येक घरमे तेल आदिके लिए कोलाहल होने लगा । वे दैत्य सबके यहाँका घी तथ तैल उठा लाये । यहाँ तक कि किसी घरमें दीपकके लिए तेल और बत्तीके लिए भी घी नहीं बच पाया । १६३॥१९४॥ समस्त स्त्री-पुरुषोंको लज्जा छोड़कर नङ्गा होना पड़ा। इसके बाद हनुमान्की पूँछ चौतरफे बाँधकर अग्निके द्वारा जलाने लगे ॥ १९५ ॥ परन्तु अग्नि प्रदीप्त नहीं हुई उस समय हनुमान्ने कहा कि यदि लज्जित रावण स्वयं अपने मुखसे फूंककर जलाये तो अग्नि जल सकती है। हनुमान्की बात सुनकर रावण तुरन्त आगे बढ़ा । १९६ ॥ १९७ ॥ ज्यो ही उसने अपने मुखसे फूँकना प्रारम्भ किया, ज्यों ही उसके सिरोके बाल तथा दाढ़ी मूँछ जल गयी ॥१९८॥ रावण जब अपने

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