भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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९२ आनन्दरामायणे [ सर्गः ९


तदा विंशद्भुजैः स्वांसमुखोपरि दशाननः। ताडयद्वह्नि शांत्यर्थं जहसू राक्षसास्तदा ॥१९९। हास्यं चकार हनुमान्सदा क्रुद्धः स रावणः। नीयतां मर्कटश्चायमिति दूतान्वचोऽब्रवीत् ॥२००। ततो दूताः कपिं निष्ठुर्लङ्कायां ते समंततः। शृंखलाभिर्दृढं बद्ध्वा भ्रामयामासुगुद्गतान् ॥२०१॥ वाद्यघोषैर्दीर्घशब्दैर्वेष्टितं शस्त्रधारिभिः। एवं दिवा सर्वलङ्कां दृष्ट्वैषां स मारुतिः ॥२०२॥ धृत्वाऽतिसूक्ष्मरूपं तु दृढबंधविनिर्गतः। यथास्थानं ब्रह्मणोऽस्त्रं तद्ययौ पूर्वमेव हि ॥२०३॥ ततः पश्चिमदिक्संस्थं लंकाद्वारं समाययौ। निष्कास्य तोरणं द्वाराज्जघान द्वाररक्षकान् ॥२०४॥ हत्वा स्वरक्षकांश्चापि प्रासादेषु समंततः। ददावग्निं स्वपुच्छेन लङ्कां दग्धां चकार सः। २०५। तदा कोलाहलश्चासीन्लंकायाः प्रतिमन्दिरे। निद्रितानपि बालांश्च त्यक्त्वा नार्यो गृहाद्बहिः। २०६। दुद्रुवुः प्राणरक्षार्थं दग्धवस्त्रकचास्तदा क्रमेण रावणादीनां प्रासादान् ज्वालयन कपिः। २०७॥ तां रावणसभां दग्ध्वा जनान् पुच्छेन ताडयन्। अभवन् राक्षसा दग्धा मुंचन्नादान्ति चक्रिरे ॥२०८॥ तदा स रावणः क्रुद्धो राक्षसैर्दशकोटिभिः। ययौ योद्धुं स मरुतिना तान् सर्वान् कोरणेन सः २०९॥ घातयामास पुच्छेन बद्ध्वा चैकत्र कोटिशः। तथैव लीलया पुच्छं रावणस्य च मस्तके ॥२१०॥ मंत्वाद्य त्वक्त्वचं दग्धामकरोन्मारुतिः क्षणात्। तन्पुच्छवह्निना दग्धो मूर्च्छितोऽभूद्दशाननः ॥२११। कपिः श्रीरामकीर्त्यर्थं रावणं न जघान सः। पतितं पितरं दृष्ट्वा दग्ध्वा रक्षांस्त्वगक्षयान्। २१२॥ आत्मनः प्राणरक्षार्थमिंद्रजिद्विवरं ययौ। कपिलक्ष्मणप्रीत्यर्थं मेघनादं जघान न ॥२१३। एवं सर्वांन्निशिनिर्जित्य गोपुरट्टालमंडिताम्। दग्ध्वा लङ्कां सविस्तारां ययौ भानामृनन्दनम् ॥२१४॥


बीसो हाथोंसे आग बुझानेके लिए अपने मुखोंपर थप्पड़ मारने लगा। तब राक्षस जोरोंसे खिलखिलाकर हँस पड़े॥ १९९॥ हनुमान् भी हँसने लगे। यह देखकर रावण बड़ा क्रुद्ध हुआ और आज्ञा दी कि इस दुष्ट वानरको पकड़ ले आओ॥ २००॥ तब दूत लोग हनुमान्‌को बड़ी मज़बूत सांकलीसे बाँधकर ले गये और नगरमें चारों ओर घुमाया॥ २०१॥ घुमाते समय उनके साथ बड़े बड़े वाजे बज रहे थे। बहुतसे बालक तथा शस्त्रधारी लोग उनको घेरे हुए थे। इस प्रकार दिनमें सारी लंका देखकर सायकालके समय हनुमान् सूक्ष्म रूप धारण करके झटपट बन्धनमेंसे निकल गये और कूदकर दरवाज़ेपर जा बैठे। उसके पूर्व ही ब्रह्मापाश भी अपने स्थानपर लौट गया॥ २०२॥ २०३॥ वहींसे चलकर वे पश्चिमी द्वारपर गये। वहाँ फाटकका खम्भा उखाड़कर उससे समस्त द्वारपालोंको मार डाला॥ २०४॥ अनेक रक्षक राक्षसोंको भी मार गिराया और अपना पूँछकी अग्निसे सब महलोंमें आग लगाकर सारी लंकाको जला दिया॥ २०५॥ उस समय लंकाके प्रत्येक घरमें बड़ा भारी कोलाहल होने लगा। स्त्रियां अपने बालकोंको सोते हुए छोड़कर ही घरोंसे बाहर निकल पड़ीं॥ २०६॥ उनके वस्त्रों तथा बालोंमे आग लगी हुई थी और वे अपने प्राण बचानेके लिए इधर-उधर भागने लगीं। हनुमान्‌ने क्रमशः आगे जाकर रावणके महलोंमें भी आग लगा दी! २०७॥ रावणकी सभाको जलाकर ब्लॉक राक्षसोंको अपनी पूँछसे खूब पीटा और सब राक्षस जलने तथा अनेक प्रकारके शब्द करके चिल्लाने लगे॥ २०८॥ तब रावण क्रुद्ध हो दस करोड़ राक्षसोंको साथ लेकर हनुमान्‌से लड़नेके लिए गया। हनुमान्‌ने उन सबको उसी लहिंके कशेसे मार डाला और करोड़ोंको एक साथ पूँछमे बाँधकर लीलापूर्वक रावणके सिरपर दे मारा॥ २०९॥ २१०॥ इस प्रकार मारनेसे उसकी चमड़ी क्षणभरमें जल उठी। उनकी पूँछकी अग्निमे जलकर दशानन मूर्च्छित हो गया॥ २११॥ परन्तु हनुमान्‌ने यह सोचकर उसको जानसे नहीं मारा कि यदि रामके हाथसे मारा जायगा तो उनका यश बढ़ेगा। पिताको गिरा हुआ तथा अपने राक्षसोंको जलते देख इन्द्रजीत मेघनाद अपने प्राणोंकी रक्षाके लिए एक गुफामें घुस गया। हनुमान्‌ने लक्ष्मणकी प्रसन्नताके लिए उसको भी जीवित छोड़ दिया-मारा नहीं॥ २१२॥ २१३॥ इस तरह सबको जीत तथा पुरद्वार और अटारियोंसे मंडित विशाल लंकाको जलाकर हनुमान् उसम