भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

पृष्ठ 109, कुल 811 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 109

सर्गः ९ ] सारकाण्डम् ९३

तटे पुच्छं स्थापयित्वा जलजन्तूरहंश्च कपिः। तत्तन्वैः शीतलं स्वं कृत्वा लाङ्गूलमुत्तमम् ॥२१५॥ निजकण्ठाच्च धृत्येण श्लैष्मणं साम्प्रडेऽक्षिपत्। ततः कपिः क्षणं तूष्णीं स्थित्वा सतीं विचिन्त्य च२१६ पाहयत्त्वाममं हृदये मत्वा दग्धां विदेहजाम् । आत्मानं गर्हयामास स्थित्वा सागररोधसि ॥२१७॥ धिग्विधुग्मां वानरं मूढं स्वामिपन्त्याश्च दाहकम्। निश्चयेन मया दग्धा जानकी रामतोषदा ॥२१८॥ न विचारः कृतः पूर्वं लङ्कादाहेऽविवेकितः। आत्मघातं करिष्याद्य पुच्छबन्धेन चात्र वै ॥२१९॥ किं रामयोरजं स्वास्यं दर्शयेऽद्य विगर्हितम्। रामस्तु श्रुत्वा सीताया वृत्तं शीघ्रं मरिष्यति ॥२२०॥ तद्दुःखेन स सौमित्रिर्मरिष्यति न संशयः। तयोर्दुःखेन सुग्रीवश्चदग्ने हा च वै रुषा ॥२२१॥ तं श्रुत्वा सोऽङ्गदश्चापि मरिष्यत्यभिलालितः। ताराऽपि पुत्रशोकेन नूरो नष्टेऽथ वानराः ॥२२२॥ प्राप्ते पंचदशे वर्षे मग्नोऽपि मरिष्यति। रामदुःखेन कौसल्या सुमित्रा पुत्रदुःखतः ॥२२३॥ सथा मा कैकेयी दुष्टा सबानर्थकरी तु या। शत्रुघ्नो बधूदुःखेन रामार्थे मुनयश्च ते ॥२२४॥ राघवा रामभक्ताश्च मत्रिणः सुहृदस्तथा। सीतापितुः कुल सर्वं कौसल्याः पितुः कुलम् । २२५॥ सुमित्रायाश्च कैकेय्यास्तेषां सबन्धनस्तथा। नष्टे राजकुले जाते प्रजा स्वच्छन्दानुवर्तिना ॥२२६। मरिष्यति न सन्देहस्ततः स्थावरजङ्गमम्। भूमिस्थाः प्राणिनः सर्वे यदा नष्टास्तदा दिवि॥२२७॥ हव्यकव्यविहीनास्त देवा नाशं गता इव। अकाले प्रलयं दृष्ट्वा नष्टां सृष्टिं स्वनिर्मिताम् ॥२२८॥ पश्चात्तापेन धाताऽपि मरिष्यति न संशयः। एवं क्रमेण ब्रह्माण्डं नक्ष्यत्येव न संशयः ॥२२९॥ एतदानिमित्तोऽहं विधिना निर्मितः पुरा। इत्युक्तवान खेदेन देहत्यागार्थमुद्यतम् ॥२३०॥ दृष्ट्वा माऽऽकाशलक्ष्मी वाणी बभूव बहुहर्षदा। मा कुरुष्व कपे खेदं न दग्धा जानकी शुभा ॥२३१॥


सागरके किनार गये ॥२१४॥ वही बैठकर पुच्छके बडे भागको किनारेपर रखकर जलजन्तुओके बचाते हुए हनुमान् समुद्रकी तरङ्गोमे अपनेको दर्द तथा उत्तम पुच्छको शीतल किया ॥२१५॥ वहीं उन्होंने धूऐंसे उत्पन्न श्रम कफका भी त्याग किया। तदनन्तर वे क्षणभर शान्त रहे। बादमे वे सीताका सोच तथा उनको जल गयी समझकर जोर-जोरसे छाती पीटने लगे। समुद्रतटपर खडे होकर उन्होने अपनी निन्दा की ॥२१६॥ २१७॥ स्वामीकी स्त्री सीताका जलानेवाला मुझ सरीखा मूख वानरको बारम्बार धिक्कार है। रामको संतोष देनेवाली जानकीको मैने आगमे जला दिया ॥२१८॥ अविवेकी मैने लङ्का जलानेसे पहिले यह विचार नहीं किया । अब मै अलग पूंछ बाँधकर आत्महत्या कर लूँगा ॥२१९॥ मैं अब अपने इस निन्दित मुखको कैसे दिखाऊँगा। राम सीताका यह हाल सुनते ही प्राण त्याग देंगे। २२०॥ उनके दुःखसे दुःखित सुमित्रापुत्र लक्ष्मण भी अवश्य मर जावेंगे। उन दोनोके दुःखसे सुग्रीव और सुग्रीवके दुःखसे उनका स्त्री रूमा भी प्राण त्याग देगी ॥२२१॥ यह समाचार सुननेके साथ ही अत्यन्त प्यारसे पला हुआ अङ्गद भी प्राण छोड़ देगा। तब पुत्रशोकसे तारा और राजाके वियोगसे सब वानर भी प्राण दे देंगे ॥२२२॥ १५पन्द्रह वर्ष बीत जानेपर भरत भी मर जावेंगे। रामके वियोगसे कौसल्या पुत्रवियोगसे सुमित्रा तथा भरतके वियोगसे वह अनर्थकारिणी तथा दुष्टा कैकेयी भी मर जायगी। भाईके दुःखस शत्रुघ्न, रामके दुःखसे मुनिलोग एवं रघुकुलणी रामके भक्त मन्त्रिजम तथा मित्रवर्ग भी प्राण दे देंगे। सीताके पिता जनकका कुल, कौसल्याके पिताका कुल, सुमित्राके पिताका कुल कैकेयीके पिताका कुल तथा उनके भी सारे सम्बन्धी लोग प्राण त्याग देंगे। राजकुल नष्ट हो जानेपर प्रजा स्वेच्छाचारिणी हो जायगी ॥२२३-२२६॥ तब वह निःसन्देह स्थावर जङ्गम सभी प्राणियोंका नाश करने लगेगा। जब पृथ्वोपर सब प्राणी मार डाले जायेंगे। तब स्वर्गलोकवासी देवता और पितर भी हव्यकव्यस रहित होकर मृतक सरीखे हो जायेंगे। असमयका प्रलय तथा अपनी रची सृष्टिका विनाश देखकर पश्चात्तापसे निःसन्देह विधाता भी मर जायगा। इस प्रकार क्रमशः समस्त ब्रह्माण्ड ही नष्ट हो जायगा। इसमें सन्देह नहीं है। २२७-२२६॥ ब्रह्माजीने इसके विनाशका कारण मुझे ही बनाया। हनुमान् ऐसा खेदपूर्वक कहने लगे और मरनेके लिए उद्यत हो गये । २३०॥ उसी समय यह आनन्ददायिनी आकाशवाणी हुई कि हे