श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
सर्गः ९ ] सारकाण्डम् ९३
तटे पुच्छं स्थापयित्वा जलजन्तूरहंश्च कपिः। तत्तन्वैः शीतलं स्वं कृत्वा लाङ्गूलमुत्तमम् ॥२१५॥ निजकण्ठाच्च धृत्येण श्लैष्मणं साम्प्रडेऽक्षिपत्। ततः कपिः क्षणं तूष्णीं स्थित्वा सतीं विचिन्त्य च२१६ पाहयत्त्वाममं हृदये मत्वा दग्धां विदेहजाम् । आत्मानं गर्हयामास स्थित्वा सागररोधसि ॥२१७॥ धिग्विधुग्मां वानरं मूढं स्वामिपन्त्याश्च दाहकम्। निश्चयेन मया दग्धा जानकी रामतोषदा ॥२१८॥ न विचारः कृतः पूर्वं लङ्कादाहेऽविवेकितः। आत्मघातं करिष्याद्य पुच्छबन्धेन चात्र वै ॥२१९॥ किं रामयोरजं स्वास्यं दर्शयेऽद्य विगर्हितम्। रामस्तु श्रुत्वा सीताया वृत्तं शीघ्रं मरिष्यति ॥२२०॥ तद्दुःखेन स सौमित्रिर्मरिष्यति न संशयः। तयोर्दुःखेन सुग्रीवश्चदग्ने हा च वै रुषा ॥२२१॥ तं श्रुत्वा सोऽङ्गदश्चापि मरिष्यत्यभिलालितः। ताराऽपि पुत्रशोकेन नूरो नष्टेऽथ वानराः ॥२२२॥ प्राप्ते पंचदशे वर्षे मग्नोऽपि मरिष्यति। रामदुःखेन कौसल्या सुमित्रा पुत्रदुःखतः ॥२२३॥ सथा मा कैकेयी दुष्टा सबानर्थकरी तु या। शत्रुघ्नो बधूदुःखेन रामार्थे मुनयश्च ते ॥२२४॥ राघवा रामभक्ताश्च मत्रिणः सुहृदस्तथा। सीतापितुः कुल सर्वं कौसल्याः पितुः कुलम् । २२५॥ सुमित्रायाश्च कैकेय्यास्तेषां सबन्धनस्तथा। नष्टे राजकुले जाते प्रजा स्वच्छन्दानुवर्तिना ॥२२६। मरिष्यति न सन्देहस्ततः स्थावरजङ्गमम्। भूमिस्थाः प्राणिनः सर्वे यदा नष्टास्तदा दिवि॥२२७॥ हव्यकव्यविहीनास्त देवा नाशं गता इव। अकाले प्रलयं दृष्ट्वा नष्टां सृष्टिं स्वनिर्मिताम् ॥२२८॥ पश्चात्तापेन धाताऽपि मरिष्यति न संशयः। एवं क्रमेण ब्रह्माण्डं नक्ष्यत्येव न संशयः ॥२२९॥ एतदानिमित्तोऽहं विधिना निर्मितः पुरा। इत्युक्तवान खेदेन देहत्यागार्थमुद्यतम् ॥२३०॥ दृष्ट्वा माऽऽकाशलक्ष्मी वाणी बभूव बहुहर्षदा। मा कुरुष्व कपे खेदं न दग्धा जानकी शुभा ॥२३१॥
सागरके किनार गये ॥२१४॥ वही बैठकर पुच्छके बडे भागको किनारेपर रखकर जलजन्तुओके बचाते हुए हनुमान् समुद्रकी तरङ्गोमे अपनेको दर्द तथा उत्तम पुच्छको शीतल किया ॥२१५॥ वहीं उन्होंने धूऐंसे उत्पन्न श्रम कफका भी त्याग किया। तदनन्तर वे क्षणभर शान्त रहे। बादमे वे सीताका सोच तथा उनको जल गयी समझकर जोर-जोरसे छाती पीटने लगे। समुद्रतटपर खडे होकर उन्होने अपनी निन्दा की ॥२१६॥ २१७॥ स्वामीकी स्त्री सीताका जलानेवाला मुझ सरीखा मूख वानरको बारम्बार धिक्कार है। रामको संतोष देनेवाली जानकीको मैने आगमे जला दिया ॥२१८॥ अविवेकी मैने लङ्का जलानेसे पहिले यह विचार नहीं किया । अब मै अलग पूंछ बाँधकर आत्महत्या कर लूँगा ॥२१९॥ मैं अब अपने इस निन्दित मुखको कैसे दिखाऊँगा। राम सीताका यह हाल सुनते ही प्राण त्याग देंगे। २२०॥ उनके दुःखसे दुःखित सुमित्रापुत्र लक्ष्मण भी अवश्य मर जावेंगे। उन दोनोके दुःखसे सुग्रीव और सुग्रीवके दुःखसे उनका स्त्री रूमा भी प्राण त्याग देगी ॥२२१॥ यह समाचार सुननेके साथ ही अत्यन्त प्यारसे पला हुआ अङ्गद भी प्राण छोड़ देगा। तब पुत्रशोकसे तारा और राजाके वियोगसे सब वानर भी प्राण दे देंगे ॥२२२॥ १५पन्द्रह वर्ष बीत जानेपर भरत भी मर जावेंगे। रामके वियोगसे कौसल्या पुत्रवियोगसे सुमित्रा तथा भरतके वियोगसे वह अनर्थकारिणी तथा दुष्टा कैकेयी भी मर जायगी। भाईके दुःखस शत्रुघ्न, रामके दुःखसे मुनिलोग एवं रघुकुलणी रामके भक्त मन्त्रिजम तथा मित्रवर्ग भी प्राण दे देंगे। सीताके पिता जनकका कुल, कौसल्याके पिताका कुल, सुमित्राके पिताका कुल कैकेयीके पिताका कुल तथा उनके भी सारे सम्बन्धी लोग प्राण त्याग देंगे। राजकुल नष्ट हो जानेपर प्रजा स्वेच्छाचारिणी हो जायगी ॥२२३-२२६॥ तब वह निःसन्देह स्थावर जङ्गम सभी प्राणियोंका नाश करने लगेगा। जब पृथ्वोपर सब प्राणी मार डाले जायेंगे। तब स्वर्गलोकवासी देवता और पितर भी हव्यकव्यस रहित होकर मृतक सरीखे हो जायेंगे। असमयका प्रलय तथा अपनी रची सृष्टिका विनाश देखकर पश्चात्तापसे निःसन्देह विधाता भी मर जायगा। इस प्रकार क्रमशः समस्त ब्रह्माण्ड ही नष्ट हो जायगा। इसमें सन्देह नहीं है। २२७-२२६॥ ब्रह्माजीने इसके विनाशका कारण मुझे ही बनाया। हनुमान् ऐसा खेदपूर्वक कहने लगे और मरनेके लिए उद्यत हो गये । २३०॥ उसी समय यह आनन्ददायिनी आकाशवाणी हुई कि हे
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आत्मानं दर्शयित्वा तां शीघ्रं गच्छ गृहं प्रति । तां वाणीं हनुमाञ्छ्रुत्वा बभूव हर्षपूरितः ॥२३२॥ द्रुतं तां जानकीं दृष्टुमशोकवनिकां ययौ । तावद्ददर्श लङ्कायां सुवर्णवेष्टितां भुवम् ॥२३३॥ तत्कारणं वदाम्यद्य तच्छृणुष्व शिरोध्वजे । अस्तीद्रिशिखरे देवि त्रिकूट इति विश्रुतः ॥२३४॥ क्षीरोदेनावृतः श्रीमान्योजनायुतमुच्छ्रितः। तावन्न विस्तीर्णः पर्यंक त्रिभिः शृङ्गैः पयोनिधिम् २३५ दिशः खं रोधयन्नास्ते रौप्यायसहिरण्मयैः । तस्य द्रोण्यां भगवतो वरुणस्य महात्मनः ॥२३६॥ उद्यानमृतुमन्नाम आक्रोडं सुरयोषिताम् । तस्मिन्सरः सुविपुलं लसत्कांचनपंकजम् ॥२३७॥ कुमुदोत्पलगह्वारशतपत्रशियोर्जितम् । नैतत्कथंञ्चा पश्यन्ति न नृशंसा न नास्तिकाः ॥२३८॥ तस्मिन्सरसि दुष्टात्मा विरूपोऽभूज्जलाशयः । सामोऽभूद्ग्राहो गजेन्द्राणां दुराधर्षो महाबलः ॥२३९॥ अथ दंतोज्ज्वलमुखः कदाचिद्गजयूथपः । आजगाम तृषाक्रान्तः करेणुपरिवारितः ॥२४०॥ तृषितः पानकामोऽभूदवतीर्णश्च तत्र सरः । पिवतस्तस्य ततोयं ग्राहस्तमुपपद्यत ॥२४१॥ सुलीनः पंकजवृते यूथमुख्यतरः करी। गृहीतस्तेन नेत्रैव ग्राहणातिकलीयसा ।। गजो चाकर्षते तीरं ग्राह माकर्षते जलम् ॥२४२॥ पश्यन्तीनां करेणूनां क्रोशन्तीनां सुदारुणम् । नीयते पंकजवने ग्राहेणान्वक्तमूर्तिना ॥२४३॥ तथाऽऽतुरं यूथपतिं करेणवो विकृष्यमाणं सरसा बलीयसा। विचुक्रुशुर्दीनाभयोऽपरे गजाः पार्थिग्रहास्तारयितुं न चाशकन् ॥२४४॥ तयोर्युद्धमभूद्घोरं दिव्यवर्षसहस्रकम् । दारुणैः सवतः पार्थिनिष्प्रयत्नगतिः कृतः ॥२४५॥ वेप्यमानः सुपीरंस्तु पार्थनामैर्दढैस्तथा । विस्फूर्जितमहाशक्तिर्भक्तश्च महाबवान् ॥२४६॥
कपिश्रेष्ठ ! खेद न करो । कल्याणकारिणी जानक.जी यहाँ नहीं हैं ॥ २३१ ॥ उनसे मिलकर तुम शीघ्र रघुवृद्ध रामके पास जाओ। उस गगनवाणीको सुनकर हनुमान् बहुत प्रसन्न हुए ॥ २३२ ॥ वे जानकीको देखनेके लिए शीघ्र अशोकवनमें गये। वहाँ जाकर हनुमान्ने कुछ सुवर्णवेष्टित धरती देखी ॥ २३३ ॥ हे गिरीन्द्रजे ! उसका कारण मैं बताता हूँ, सुनो-हे देवि ! त्रिकूट नामसे प्रसिद्ध एक श्रेष्ठ पर्वत था ॥ २३४ ॥ वह चारों ओर क्षीरसागरसे घिरा हुआ सुन्दर आभूषण तथा दस हजार योजन ऊँचा था। वह उतना ही गहराई में भी था। वह चाँदी, लोह और मानिक तीन शिखरोंसे दसों दिशाओं तथा आकाशका व्याप्त किए हुए था। उसके एक भागमें महात्मा भगवान् वरुणका ऋतुमान् नामक दवस्त्रियोंका क्रीड़ास्थान एवं उद्यान था। उसमें विशाल सुवर्णकमलोंसे सुशोभित एक तालाब था ॥ २३५-२३७ ॥ जो कि कुईयां, लाल कमल श्वेत कमल तथा काष्ठपद्म जैसे कमलोंसे अतीव सुन्दर प्रतीत होता था। उसको कुत्सित, क्रूर और नास्तिक लोग नहीं देख सकते थे ॥ २३८ ॥ उसी जलाशयमें छिपा हुआ महाबलवान्, बड़ा कठिनाईसे पकड़ा जानेवाला तथा गजेन्द्रोंको भी त्रास देनेवाला एक दुष्ट मगरमच्छ रहता था ॥ २३९ ॥ किसी समय श्वेत दांत तथा श्वेत मुखवाला गजोंमे मुख्य एक गजराज प्याससे व्याकुल होकर हथिनियांस घिरा हुआ वहाँ आया ॥ २४० । वह पानी पीनेकी इच्छासे ज्यों ही पानीमं उतरा और पानी पीने लगा त्यो ही ग्राह उसके पास आ पहुँचा ॥ २४१॥ कमलवनसे ढके हुए हाथियोंके मुख्यके चरण स्थित उस हथियोको उस भयानक तथा अति बलवान् ग्राहने पकड़ लिया ॥ २४२॥ अब वह हाथी ग्राहको तीरकी ओर खींचत रहा। उसके माथकी हथिनियाँ देखती और दुखसे चिल्लाती ही रह गई और जलमें छिपा हुआ ग्राह हाथीको कमलके बनमें दूर खींच ले गया ॥२४३॥ जब घबराये हुए उस यूथपति गजको ग्राह अनूकूल बेगसे जलमें खींच रहा था, तब हथिनियों बलीन मुखसे क्रन्दन करने लगीं और दूसरे तथा पीछे रहनेवाले हाथी दीन होकर चिल्लाने लगे, पर कोई उसे बचा नहीं सका ॥ २४४ ॥ उस गज तथा ग्राह दोनोंमें देवताओंके हजार वर्ष तक घोर युद्ध होता रहा। अन्तमें गजराज जैसे दन्तपाश तथा अति भयानक एवं दृढ़ नागपाशमें बँधकर सर्वथा असमर्थ हो गया। तब उस्कण्ठ वर्ष तथा महाशक्तिसम्पन्न होता हुआ भी वह गजराज चिल्लाने लगा महाम् चीत्कार
सर्गः ९] सारकाण्डम् ९५
व्यथितः स निरुत्साहो गृहीतो घोरकर्मणा । परामापदमापन्नो मनसाऽचिन्तयद्धरिम् ॥ २४७ ॥
एकाग्रो निगृहीतात्मा विशुद्धेनान्तरात्मना । प्रगृह्य पुष्कराग्रेण कांचनं कमलोत्तमम् ॥ २४८ ॥
नैवेद्यं मनसा ध्यात्वा पूजयित्वा जनार्दनम् । आपद्मोक्षमभिप्रेप्सुन्प्रास्तौषीत् स्तोत्रमुदारधीः ॥ २४९ ॥
तत्कृतेन स्तवेनैव सुप्रीतः परमेश्वरः । आरुह्य गरुडं विष्णुर्गतवान् सुरोत्तमः ॥ २५० ॥
ग्राहग्रस्तं गजेन्द्रं च तं ग्राहं च जलाशयात् । उद्धहत्प्रमेयात्मा तरसा मधुसूदनः ॥ २५१ ॥
जलस्थं दारयामास नक्रं चक्रेण माधवः । मोचयन्मत्तमातङ्गं पाशेभ्यः शरणागतम् ॥ २५२ ॥
आसीद्गजः पुरा पाण्ड्य इन्द्रद्युम्न इति श्रुतः । एकदा मनसोन्योन्यो बभूव ध्यानतत्परः ॥ २५३ ॥
यदृच्छया ययौ तत्र कुम्भजन्मा नृपांतिकम् । ध्यानास्थं स नृपो नैव मुनिं वेद समागतम् ॥ २५४ ॥
ददौ शापं मुनिर्नृपं दृष्ट्वाऽऽसनं तु नोत्थितम् । तपोमदेनमत्प्राप्तौ स्तम्भान्नोत्थितोऽसि माम् २५५ ॥
अतो भव गजो भ्रांतो मदेन विपिनेऽचिरात् । सं श्रुत्वा नृपतिः शापं च प्रणम्य पुनः पुनः ॥ २५६ ॥
विशापं प्रार्थयामास मुनिः प्राह हरेः करात् । भविष्यति विमुक्तिस्ते यदा ग्राहो धरिष्यति ॥ २५७ ॥
पुरा तत्रैव गंधर्वस्त्वप्सरोगणसंयुतः । सम्प्राप्तो जलक्रीडां कर्तुं हूहूः समागतः ॥ २५८ ॥
मघस्यघमर्पणार्थं तं दृष्ट्वा स देवलं द्विजम् । मन्वित्तं च बहिश्चेत्कर्तुंगन्धर्वः सम्यचिन्तयत् ॥ २५९ ॥
स्वयं भूत्वा जले लीनस्सम्पाद्यो स्वकरेण हि । पदं धृत्वा कर्षयनं ज्ञात्वा तमशपन्मुनिः ॥ २६० ॥
ग्राहवन्मे गृही पादौ तस्माद्ग्राहो भवान् भुवि । तेन संप्रार्थितः प्राह हरिस्यामुद्धरिष्यति ॥ २६१ ॥
एवं तौ पूर्वशापेन पतितावतिसङ्कटे । हरिमुद्धृत्य तौ ताभ्यां ययौ स्वीयस्थलं पुनः ॥ २६२ ॥
करन लगा ॥ २४६ ॥ २४६ । उस आप परार्म ग्राहसेन न होकर गजराज दुःखी और निरुत्साह हो गया ।
उस समय इस प्रकारकी परम विपत्तिको प्राप्त होकर वह श्रीहरिका चिन्तन करने लगा ॥ २४७ ॥ तदनन्तर
इन्द्रियोंका निग्रह करके उसने एकाग्र मन तथा शुद्ध अन्तःकरणसे सुवर्णके समान उत्तम एक कमलपुष्प
शूंडके अग्रभागसे पकड़कर शान्त भावसे मन ही मन जनार्दन भगवान्का आवाहन, पूजन, ध्यान तथा नैवेद्य
अर्पण करके विपत्तिसे छुटकारा पानेके हेतु स्तुतिप्रारम्भ किया ॥ २४८ ॥ २४९ ॥ उसकी स्तुतिसे प्रसन्न परमे-
श्वर सुरोत्तम भगवान् विष्णु स्वयं गरुडपर सवार होकर वहाँ आये ॥ २५० ॥ उन अप्रमेय आत्मा मधुसूदन
भगवान्ने उस ग्राह हुए गजेन्द्रको जलसे शीघ्र ही बाहर निकाला ॥ २५१ ॥ उन्होंने जलमें रहनेवाले
ग्राहका अपने चक्रसे मार डाला और शरणागत गजराजको पाशोंसे छुड़ा दिया ॥ २५२ ॥ यह हाथी पूर्व
जन्ममें पाण्ड्यवंशी इन्द्रद्युम्न नामका राजा था । एक बार उसने ध्यान करके तप करना आरम्भ किया
॥ २५३ ॥ जब वह तप कर रहा था, तभी उसके पास अगस्त्य मुनि एकाएक जा पहुंचे । ध्यानमें स्थित
राजाको मुनिके आनेका कुछ पता न था ॥ २५४ ॥ मुनिने अपने आनेपर राजाको खड़े होते न देखकर
शाप दे दिया कि तपके घमण्डसे मेरे आनेपर भी तुम खड़े नहीं हुए ॥ २५५ ॥ इसलिए शीघ्र ही तुम वनमें
मदान्मत हाथी हो जाओ । यह सुनकर राजा इन्द्रद्युम्न बारम्बार मुनिको प्रणाम करके शापसे मुक्त
होनेकी प्रार्थना करने लगा । तब मुनिने कहा कि तुमको ग्राह (मगरमच्छ) पकड़ेगा, तब प्रभुके हाथसे
तुम्हारी मुक्ति होगी ॥ २५६ ॥ २५७ ॥ उन्हीं दिनों हूहू नामक गन्धर्व विशिष्ट अप्सराओंके साथ लेकर उस
सरोवरमें जलक्रीड़ा करनेके लिए आया ॥ २५८ । उसने देखा कि उस सरोवरके जलमें खड़े होकर देवल
मुनि बहुत देरसे अघमर्षण अर्थात् सम्पूर्ण पापोंको नष्ट करनेवाले मन्त्रका जप कर रहे हैं और अभी बाहर
निकलना नहीं चाहते । तब वह उनका बाहर निकालनेका उपाय सोचने लगा ॥ २५९ ॥ तदनन्तर स्वयं
जलमें डुबकी मारकर वह अपने हाथसे उनके पाँवोंको पकड़कर खींचने लगा । यह देखकर मुनि उसको
पहिचान गये और शाप दिया- ॥ २६० ॥ तूने ग्रहकी तरह मेरे पाँव पकड़े हैं, इसलिए तू यहाँपर मगर-
मच्छ बनेगा । पुनः गन्धर्वके प्रार्थना करनपर मुनिने कहा कि श्रीहरि तेरा इस शापसे उद्धार करेंगे ॥ २६१ ॥
इस प्रकार पूर्व जन्ममें प्राप्त शापके कारण अतिशय भीषण सङ्कटमें पड़े हुए उन गन्धर्वका भगवान्ने उद्धार
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क्षुधितेनाथ तार्थ्योऽथ प्रार्थितः प्राह तं हरिः। गच्छ भक्षय पत्तिने गजग्राहकलेवरे ॥ २६३ । ययौ तार्थ्यः सरः पुण्यं तत्रभूद्भृगुशृङ्गराट् । कलेवरंतिकं प्राप्तस्त निहत्य खगेश्वरः ॥ २६४ । पदेनैकेन भृङ्गमपरेण कलेवरं । धृत्वा तार्थ्यः शुद्धदेशं भक्षणार्थमपश्यत् ॥ २६५ । तावत्क्षीरार्णवे जांबूनदवृक्षं समैक्षय सः आयासविस्तृतोच्चैस्तु सहस्रयोजनं शुभम् ॥ २६६ । तच्छाखायां विशालायां यावत्तस्थौ न पक्षिराट् । तावद्भग्नं तच्छाखा बालखिल्यास्तपोयुताः ॥ २६७ ॥ षष्टिश्च पक्षिमाहर्ष्याश्चिकालं समश्रिताः । तांस्तान्दृष्ट्वाऽन्तरिक्षे वशाय तच्छाखामथशक्तिनः ॥ २६८ । धृत्वा स्वचञ्चुना शाखां वभ्राम गगने पुनः । ततो दृष्ट्वा कश्यपं स्वतातं नत्वा व्यजिज्ञपत् ॥ २६९ ॥ वद शुद्धां मुवं मंड्य कुर्याहं यत्र भोजनम् । तदा तं कश्यपः प्राह शतयोजनसागरे ॥ २७० । लंकानाम्नी शुद्धभूमिस्तत्र त्वं कुरु भोजनम् । तत्पितुर्वचनात्तूर्णं ययौ तार्थ्यः क्षणेन सः ॥ २७१ ॥ प्रोथयोः पक्षयोः शाखां स्थाप्य तानभक्षयन्मुदा । तस्य केऽस्थिसम्भूताश्शृङ्गाणि त्रीणि चाभवन् ॥ २७२ ॥ त्रिकूट इति नाम्ना स लङ्कायां गिरिराडभूत् । तेषु शृङ्गेषु तां शाखां तार्क्ष्यः संस्थाप्य संपयौ । २७३ । बालखिल्यास्तपोऽन्ते ते ययुर्विष्णोः परं पदम् । भावात्तच्छाखाऽन्तर्गते मा लङ्कायां शृङ्गमूत्रेपु ॥ २७४ ॥ प्राप्तभूतां क्षैत्रेणेन न विदुस्तां तु राक्षसाः । लङ्काऽग्निना द्रवीभूता मर्दयन्ती शवावगान् ॥ ७५ ॥ एषात्र तद्रसेनामील्लङ्काभूर्माद्दामयी । तां दृष्ट्वा चक्रितो वेगादग्रे सीतां ययौ कपिः ॥ २७६ ॥ दृष्ट्वाऽशोके पुनः सीतां तामाह कपिकुञ्जरः । मस्कन्धमंस्थिता गममय पश्यसि जानकि ॥ २७७ । सा प्राह मोषितामन्तर्मा रामो न सहिष्यति । नीत्वा पुनर्मुद्रिकां त्वं राघवाय समर्पय ॥ २७८ ॥
किया और दोनोंको साथ लेकर अपने धाम पधारे । २६२ तदनन्तर भूख सहन्त श्रीहरिसे आहारकी प्रार्थना की । श्रीहरिने कहा कि जाओ, सरोवर के तटपर पड़े हुए गज ग्राहके शरीरको खाओ । २६३ ॥ गरुड वहां गये तो उन कलेवरोंके पास भृगु नामक एक गृध्रराजको देखा । दशन दो पक्षिराज हंस गरुड़ने उसे मार डाला । २६४ । तत्पश्चात् एक टांगमे शृङ्गको तथा दूसरी टांगस गज ग्राहक शरीरोको पकड़कर उन्हें खानेके लिए कोई शुद्ध स्थान खोजने लगे । २६५ । इतनेमे गरुडको क्षीरसागरमे एक जाम्बूनद ( सुवर्ण ) का वृक्ष दिखाया दिया । वह लम्बाई चौड़ाई तथा ऊंचाईमे हजार योजन परिमाणवाला था और देखनेमे बड़ा ही सुन्दर लगता था ॥ २६६॥ पक्षिराज गरुड जाकर ज्यों ही उसकी एक शाखापर बैठे, वैसे ही उसकी वह शाखा टूट पड़ी । उसके टूटनस उसपर बहुत कालमे रहनवाले साठ हजार बालखिल्य ऋषि अधोमुख होकर गिरने लगे उनकी यह दशा देखकर पक्षिराज गरुडके मनमे ऋषियोंके शापकी शंका समा गया ॥ २६७ ॥ २६८ ॥ अतएव उस शाखाको चोंचमे पकड़कर वे आकाशमे फिर भ्रमण करने लगे । तभी उन्हें अपने पिता कश्यप दिखायी पड़े। तब नमस्कार करके उनसे निवेदन किया -॥ २६९ ॥ आप कई ऐसी पवित्र जगह बतलाइये, जहाँ मैं भोजन कर सकूँ । तब कश्यपने कहा कि सौ योजन विस्तृत लंका नामकी विशुद्ध भूमि है, वहाँ जाकर तुम भोजन कर सकते हो । अपने पिताका बात अनुमार करके गरुड क्षणभरमे लङ्का जा पहुंचे ॥ २७० । ॥ २७१ ॥ बालखिल्य ऋषियों सहित शाखाको अपनी ऊँची पाँखॉपर धरे हुए वे आनन्दसे उन मृत शरीरों- को खाने लगे, जिन्हें पंजोंमे पकड़ लाये थे । उन गज ग्राह तथा गीधके शरीरसे निकली हुई हड्डियोंसे वहाँ तीन बड़े भारी शिखर खड़े हो गये ॥ २७२ ॥ उन तीनोका लङ्कामे पवनराज त्रिकूट नाम पड़ गया । गरुड़ने उन्हीं शिखरोपर उस शाखाको रख दिया और चले गये ॥ २७३ ॥ वहीपर तपस्या पूरी करके वे बालखिल्य ऋषि विष्णूके परम पदको प्राप्त हो गये । लंकाम उन शिखरोक मध्यमे स्थित शाखा पाषाणके समान हो गया था । इसी कारण राक्षस लोग उसे नहीं पहचान पाये थे । जब हनुमानने लङ्काको अग्निसे जलाया, तब वह द्रवित होकर राक्षसोंका मर्दन करती हुई गिर पड़ी । उसके रससे लंकाकी भूमि सुवर्णमयी हो गयी । यह लीला देखकर हनुमान् चकित हो गये और शीघ्र ही सीताके समीप आये ॥ २७४-२७६ ॥ अशोकवनमे सीताको पूर्ववत् स्थित देखकर कपिकुञ्जर हनुमान् सीतासे बोले हे जानकी ! आप मेरे कन्धे-
सर्गः ९ ] सारकाण्डम् ९७
सर्गः ९ ] सारकाण्डम् ९७
इत्युक्त्वा तत्करे सीता ददौ श्रीराममुद्रिकाम् । ततस्तां मारुतिः पृष्ट्वा नत्वा शीघ्रं ययौ पुनः ॥२७९॥
आरुरोह सुवेलाद्रिं चूर्णं तमकरोद्द्रुतम् एतस्मिन्नन्तरे ब्रह्मा ददौ पत्रं सविस्तरम् ॥२८०॥
यद्यत्कृतं मारुतिना रक्षार्थं तस्य सूचकम् । तद्गृह्य मारुतिर्गन्त्वा पृष्ट्वा विधिं पुनः ॥२८१॥
तत उड्डीय वेगेन ययावाकाशवर्त्मना । कुर्वन् शब्दं महाघोरं कपीनामूर्ध्वतस्तदा ॥२८२॥
उदग्दिश्यतग किंचिन्पपात भुवि मारुतिः । ततो दृष्ट्वा कपीन्द्रस्तं ददृशे मुनिसत्तमम् ॥२८३॥
किंचिद्भ्रममाविष्टस्तं मुनिं प्राह मारुतिः । मया श्रीरामकार्यं तु कृतमस्ति मुनीश्वर ॥२८४॥
पानीयं पातुमिच्छामि दर्शयस्व जलाशयम् । तर्जन्या दर्शयामास मुनिस्तस्मै जलाशयम् ॥२८५॥
ततः स मारुतिर्मुद्रां मणिं पत्रं मुनेः पुरः । संस्थाप्य नीरं पातुं वै ययो कासारमुत्तमम् । २८६॥
ततस्तत्र कपिः कश्चिन्मुद्रिकां मुनिसंनिधौ । कमण्डलौ प्रक्षिपन्म पयो तारञ्च मारुतिः ॥२८७॥
गृहीत्वा तं मणिं पत्रं मुनिं पप्रच्छ मुद्रिकाम् । मुनिर्नूनेत्रसंज्ञया तस्मै कमण्डलुमदर्शयत् ॥२८८॥
दत्तः कमण्डलीं तूर्णं मुद्रिकामवलोकयन् । तावद्ददर्शान्वनेयस्तस्मिन् भोगममुद्रिकाः ॥२८९॥
दृष्ट्वा सहस्रशस्तत्र चकितः प्राह तं मुनिम् । कुतस्त्विमा मुद्रिकाश्चवद का मम मुद्रिका ॥२९०॥
एतासु त्वं मुनिश्रेष्ठ तदा तं मुनिरब्रवीत् । यदा यदा वायुपुत्रः सीतां तां राघवाज्ञया । २९१॥
लङ्कां गन्त्वा समानीता शुद्दिमुद्राम्तदा तदा । मदग्रे स्थापितास्ताश्च कपिभिश्च कमंडलौ ॥२९२॥
निक्षिप्तास्तास्त्विमाः सर्वा पश्यताम् स्वमुद्रिकाम् । तन्मुनेर्वचनं श्रुत्वा गतगर्वस्तमब्रवीत् ॥२९३॥
कियंतो राघवाश्चात्र ममापाता मुनीश्वर । मुनिस्तं प्राह निष्कास्य गणयस्वाद्य मुद्रिकाम् । २९४॥
पर सवार हो जायें, तो मैं आपको ले चलकर आज ही रामका दर्शन करा दूँ ॥ २७७ ॥ जानकीने कहा—मुझे दूसरा कोई छुड़ाकर ले जाय, इस बातको भगवान राम सहन नहीं कर सकेंगे। इसलिए तुम इस अंगूठीको ले जाकर रामको दे दो । २७८ । इतना कहकर साताजीने हनुमानके हाथमें वह मुद्रिका दे दी । तब हनुमानजी सीताकी आज्ञा ले तथा नमस्कार करके शीघ्र ही लौट पड़े ॥ २७९ ॥ उन्होंने समुद्रके किनारे-वाले पर्वतपर चढ़कर उसे चूर्ण कर डाला । उस समय ब्रह्माने विस्तारपूर्वक एक पत्र लिखकर उन्हें दिया । २८० । जिसमें यह लिखा था कि लंकाम जाकर मारुतिने क्या-क्या काम किया है। उसको लेकर ब्रह्माकी आज्ञा ले तथा उन्हें नमस्कार करके हनुमान् पुन वहाँ से उड़कर आकाशमार्गसे घोर तथा महान् वानरोकी तरह शब्द करते हुए जोरसे चल पड़े ॥ २८१ ॥ २८२ ॥ उत्तर दिशाकी ओर कुछ दूर आगे जाकर नीचे उतरे या वहाँ उन्होंने एक मुनिको विराजमान देखा ॥ २८३ ॥ तब कुछ श्रमसे मारुतिने कहा हे मुनीश्वर ! मैं श्रीरामका काम करके आ रहा हूँ । २८४ । यहाँ मैं पानी पीनेकी इच्छासे आया हूँ मुझे कोई जलाशय बतलाइये । तब मुनिने उन्हें तर्जनी अंगुल से जलाशय बतला दिया । २८५ तदन्तर हनुमान् अंगूठी, चूडामणि तथा पत्र मुनिके पास रखकर उस उत्तम तालाबकी ओर जल पीने गये ॥ २८६ । इतनेमें किसी बन्दरने आकर रामकी मुद्रिकाको मुनिके पास रक्खे कमण्डलुमें डाल दिया । उधरस हनुमान्जी आ आ पहुंचे । २८७ ॥ चूडामणि तथा पत्रके विषयमें उन्होने मुनिसे पूछा कि मुद्रिका कहां गयी ? मुनिने भौंहोके संकेतसे कमण्डलु दिखाया ॥ २८८ ॥ जब हनुमान्ने कमण्डलुमें देखा तो उसमे श्रीरामकी हजारों मुद्रिकाएं दिखायी दीं । तब हनुमान्ने आश्चर्यचकित होकर मुनिसे पूछा कि इतनी अंगूठियें कहाँसे आयीं, सो बताइए ॥ २८९ ॥ २९० ॥ हे मुनिश्रेष्ठ ! आप यह भी कहिये कि इनमेंसे मेरी मुद्रिका कौन-सी है ? मुनिने उत्तर दिया कि जब-जब श्रीरामकी आज्ञासे हनुमान् लंकामें जाकर सीताका पता लगाया है और अंगुलियें मेरे सामने रक्खी हैं तब-तब बन्दरोंने उन्हें इस कमण्डलुमें डाल दी हैं। वे ही ये सब हैं। इनमेंसे तुम अपनी अंगूठी खोज लो । मुनिके इस वाक्यको सुनकर हनुमान्का गर्व खर्च हो गया । तब उन्होंने मुनिसे कहा— ॥ २९१ ॥ २९२ । हे मुनीश्वर ! यहाँ कियन राम आये हैं ? मुनिने कहा—कमण्डलुमेंसे अंगूठियें निकालकर
९८ आनन्दरामायणे [ सर्गः ९
कमण्डलौर्जलिभिश्चाऽथ मुद्रिका मुहुः। बहिः क्षिपन्मारुतिर्न नांतं तासां ददर्श सः ॥२९५॥
पुनः कमण्डलीं कृत्वा मुनिं नत्वा कपिः क्षणम् । चिंतयामास मनसि मादृशैः शतशः पुरा ॥२९६॥
समानीतास्ति सीतायाः शुद्धिः का गणनाऽद्य मे। इति निश्चित्य मनसि गतगर्वस्तदा कपिः ॥२९७॥
पुनर्दक्षिणमार्गेण ययौ यत्रांगदादयः । प्रायोपवेशनस्थास्ते तं दृष्ट्वा तुष्टमानसाः ॥२९८॥
बभूवुर्वानराः सर्वे समालिंग्याथ तं मुहुः । ज्ञात्वा तन्मुखतः सीता दृष्टाऽशोकवने त्विति ॥२९९॥
ययुस्ते राघव भ्रातृ मार्गे सुग्रीवपालितम् । दृष्ट्वा मधुवनं सर्वे दृष्ट्वा तं वालिनंदनम् ॥३००।
फलानि भक्षयामासुर्दधिषक्त्रो न्यषेधयत् । तनस्ते ताडयामासुर्दधिषक्त्र कपीश्वरम् ॥३०१।
ज्ञात्वा तं मातुलंमपि सुग्रीवस्यांगदादयः । स गत्वा सकलं वृत्त सुग्रीवाय न्यवेदयत् ॥३०२।
सोऽपि श्रुत्वा जनकजा दृष्टा तैरित्यमन्यत । नोचेन्मधुवनं रम्य कथमश्नन्ति वानराः ॥३०३।
ततो विसर्जयामास दधिषक्त्रं कपीश्वरः मानिषेधस्त्वया कार्यश्चं द्राद्य प्रेषयस्व तान् ॥३०४॥
ममांतकं ततो गत्वा दधिषक्त्रस्तथाऽकरोत् । ततः सुग्रीववचनं श्रुत्वा तेन समीरितम् । ३०५।
युयुस्ते वानराः सर्वे गम वन्ता पुरःस्थिताः । ततो हर्षान्मार्ह्रुतः म ब्रह्मपत्र न्यवेदयत् ।३०६॥
दत्त्वा चूडामणिं राम काकवृत्तं न्यवेदयत् , सन्छ्रुत्वा सकल वृत्त ज्ञात्वा मारुतिना कृतम् ॥३०७॥
लङ्कायां वायुपुत्रेण रामस्तुष्टो बभूव सः समालिंग्य हनूमंतं राघवो वाक्यमब्रवीत् ॥३०८॥
त्ववोपकारिणश्चाऽहं न पश्याम्यद्य मारुते । कर्तुं प्रत्युपकारं ते धन्योऽसि जगतीतले ॥३०९॥
परिरंभो हि मे लोके दुर्लभः परमात्मनः । अतस्त्वं मम भक्तोऽसि प्रियोऽसि हरिपुत्रक ॥३१०॥
यत्पादपद्मयुगलं तुलसीदलाद्यैः संपूज्य विष्णो पदवीमतुलां प्रयांति ।
गिन लो ॥ २९३ ॥ २९४ ॥ अब हनुमान् कमण्डलुमे अञ्जली भर-भरकर बारम्बार अँगूठियें बाहर निकालने लगे । पर कहीं उनको अन्त नहीं हुआ ॥ २९५ ॥ तब फिरसे उन्हें कमण्डलमें भर दिया और मुनिको नमस्कार करके क्षणभरके लिए वे मनमें विचार करने लगे कि आह ! पहिले मेरे जैसे सैकड़ों हनुमान् जाकर सीताकी खबर ले आये हैं तो मेरी कौन-सा गिनती है यह निश्चय करके वीर मारुति घमण्डको त्याग-कर दक्षिणमार्गमें जहाँ अङ्गदादि वानर बैठे थे, वहाँ गये। उपवासावस्थामें बैठे हुए वे सब वानर हनुमान्को देखकर बहुत प्रसन्न हुए ॥ २९६-२९८ ॥ वे सब उभय बारम्बार हृदयसे लगाने लगे और उनके मुखसे यह सुनकर कि मैं सीताको अशोकवाटिका में देख आया हूँ ॥ २९९ । तब सबक सब तुरन्त रामका ओर चल पड़े, रास्ते में उन्हें सुग्रीवका सुरक्षित मधुवन दिखाई दिया। तब सब वानर बालिक पुत्र अङ्गदसे पूछकर । ३०१ ॥ उस वनके फल खाने लगे। जब उसके रक्षक दधिमुखने रोका तो वे उसको मारने लगे। ३०० ॥ यह जानकर भी कि यह सुग्रीवका मामा है तथापि उसे पीटकर ही छोड़ा तदनन्तर दधिमुखने जाकर सब हाल सुग्रीवको कह सुनाया। यह सुनकर सुग्रीवने समझ लिया कि उन्होंने जनकतनयाका पता पा लिया है नहीं तो वे लोग मधुवनके फल तोड़कर खाते ॥ ३०२ ॥ ३०३ ॥ पश्चात् कपीश्वर सुग्रीवने दधिमुखको समझाकर भेजा और कहा कि उन्हें रोका मत, यहाँ भेज दो ॥ ३०४ ॥ सुग्रीवकी बात मानकर उसने वैसा ही किया। पश्चात् वे सब वानर दधिमुखसे सुग्रीवका आदेश सुनकर ॥ ३०५ ॥ रामके पास गये तथा हर्षित होकर उनके सम्मुख खड़े हो गये, तब हनुमान्ने सहर्ष ब्रह्माका दिया हुआ पत्र रामको अर्पण किया और चूडामणि देकर काकका वृत्तान्त कह सुनाया। सो सुनकर राम श्रीराम हनुमान्का किया हुआ सब कार्य जानकर ॥ ३०६ । ३०७ । ब्रह्माके पत्रसे राम अतिशय सन्तुष्ट हुए तदनन्तर राम हनुमान् को हृदयसे लगाके बोले- ॥ ३०८ ॥ हे मारुते तुमने मेरा बड़ा उपकार किया है इस उपकारका प्रत्युपकार करनेके लिये मुझे कुछ नहीं सूझता । सचमुच तुम संसारमें धन्य हो ॥ ३०९ ॥ इस संसारमें साक्षात् परमात्माका मेरा परिरम्भ ( आलिङ्गन ) दुर्लभ है, वह तुमको प्राप्त हो गया। इस कारण हे हरि-पुत्रक ! तुम प्रिय भक्त हो । ३१० ॥ जिन विष्णुके दोनों चरणकमलोंका तुलसीपत्र तथा जल आदिसे पूजन
सर्गः १० ] | सारकाण्डम् | ९९
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तेनैव किं पुनरसौ परिष्वङ्गतो रामेण वायुतनयः कृतपुण्यपुञ्जः ।३११॥
रामे स मारुतिः प्राह भीतभीतोऽतिकम्पितः मयाऽपराधितमिति मुद्रावृत्तं मुनेर्वचः ॥३१२॥
तच्छ्रुत्वा रामचन्द्रोऽपि विहस्योवाच मारुतिम् । मयैव दर्शितं मार्गे कौतुकं मुनिरूपिणा ॥३१३॥
त्वद्गर्वपरिहारार्थं मुद्रिकां मन्करे स्थिताम् । कनिष्ठिकायां त्वं पश्य समानीतां त्वयाद्य वै ॥३१४॥
तां राममुद्रिकां दृष्ट्वा श्रीरामस्य करांगुलौ । ननाम गतवर्गः स रामं विष्णुममन्यत ॥३१५॥
मय्यप्यस्यैव कृपया पौरुषं चेत्यमन्यत । एवं गिरीन्द्रजे प्रोक्तं चरित्रं सुंदरमभिधम् ॥३१६॥
रामार्थं वायुपुत्रेण कृतं सर्वार्थदायकम् ॥३१७॥
इति श्रीमच्छतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये सारकाण्डे
सुन्दरचरित्रे सीताशुद्धिर्नाम नवमः सर्गः ॥ ९ ॥
दशमः सर्गः
( राम-रावणसेनाका संघर्ष )
श्रीशिव उवाच
अथाह मारुतिं रामो मां वदस्व सविस्तरम् । लंकास्वरूपं ज्ञात्वा च प्रतीकारं करोम्यहम् ॥ १ ॥
तद्रामवचनं श्रुत्वा कथयामास मारुतिः । लंका दिव्यपुरी देव त्रिकूटशिखरे स्थिता ॥ २ ॥
स्वर्णप्राकारसंविना स्वर्णाट्टालकमण्डना । परिखाभिः परिवृता पूर्णानिर्मलोदकैः ॥ ३ ॥
नानोपवनशोभाढ्या दिव्यवापीभिरावृता । गृहैर्विचित्रशोभाढ्यैर्मणिस्तंभमयैः शुभैः ॥ ४ ॥
पश्चिमद्वारमापाद्य गजारूढाः सहस्रशः । उत्तरद्वारे तिष्ठन्ति वाजिवाहाः सपत्तयः ॥ ५ ॥
दशकोटिमिता सेना विविधाद्युधमण्डिता । लंकायाः परितो व्याप्ता सत्तर्का रक्षते पुरीम् । ६ ॥
करके मनुष्यमात्र विष्णुके अनुपम पदको प्राप्त करता है। उन्हीं साक्षात् रामके द्वारा आलिङ्गित होकर वायुपुत्र हनुमान् यदि महान् पुण्यशाली बन जायें तो इसमें आश्चर्य ही क्या है ॥ ३११ ॥ तदनन्तर डरके मारे कांपते हुए मारुतिने रामसे अपना गर्वरूपी अपराध, मुद्रिकाका वृत्तान्त तथा मुनिका वचन कह सुनाया ॥ ३१२ । यह सुना तो रामचन्द्रने हंसकर कहा कि यह कौतुक मैने ही मार्गमें मुनिरूप वारण करके दिखलाया था ॥ ३१३ ॥ यह काम मैने तुम्हारे गर्वको छुड़ानेके लिये ही किया था। यह देखो, जिस मुद्रिकाको तुम ले आये थे, वह तो मेरे हाथकी कनिष्ठिका अंगुलीमें विद्यमान है ॥ ३१४ । रामके हाथमें रामकी अगूठो देखो तो गर्व छोड़कर हनुमान्ने नमस्कार किया और उन्हें साक्षात् विष्णु माना ॥ ३१५ ॥ और यह भी माना कि इन्हींकी कृपासे मुझमें भी पौरुष आ गया है। हे गिरीन्द्रजे ! रामके लिये वायुपुत्रके द्वारा किया हुआ सर्वार्थसाधक सुन्दर चरित्र मैने तुमको इस प्रकार कह सुनाया ॥ ३१६ ॥ ३१७॥ इति शतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये सारकाण्डे भाषाटीकायां सुन्दरचरित्रं सीताशुद्धिर्नाम नवम सर्गः ॥ ९ ॥
शिवजी बोले—हे पार्वती ! रामने मारुतिसे कहा—तुम हमको विस्तारसे लंकाका स्वरूप बताओ। लङ्काका स्वरूप जानकर मैं प्रतीकारका उपाय सोचूँगा ॥ १ ॥ रामकी बात सुनकर मारुतिने कहा—हे देव ! त्रिकूट पर्वतके शिखरपर बद्ध लङ्का नामकी दिव्य पुरी बसी हुई है ॥ २ ॥ उसके चारों ओर सोनेका गढ़ है तथा वह सोनेके अटारियोंवाले भवनोंसे सुशोभित है। निर्मल जलसे परिपूर्ण खाईसे वह नगरी घिरी हुई है ॥ ३ ॥ अनेकानेक उपवनोंसे सुन्दर, दिव्य बावलियोंसे आवृत तथा चित्र विचित्र शोभावाले मणियोंके खम्भोंवाले सुन्दर महलोंसे सजी हुई है ॥ ४ ॥ उसके पश्चिमी द्वारपर हजारों गजारूढ़ तथा अश्वारूढ सिपाही खड़े रहते हैं ॥ ५ ॥ दस करोड़ पैदल तथा सवार सैनिक विविध शस्त्रास्त्रोंसे सुसज्जित होकर लङ्काका
| १०० | आनन्दरामायणे | [ सर्गः १० |
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नियुत्यर्बुदसंख्याना गजाश्चाश्वस्तथैव च । रक्षन्ति सदा लङ्कां नानामुखशराः प्रजाः ॥७॥ प्रकारैर्विविधैर्लङ्का शतघ्नीभिश्च संयुता । एवं स्थितायां देवेश शृणु त्वद्दासचेष्टितम् ॥८॥ दशाननबलांशस्य चतुर्थांशो मया हतः । दग्ध्वा लङ्कापुरीं स्वर्णप्राकारं धर्षितं मया ॥९॥ शतघ्न्यः संक्रमाश्चैव नाशिता मे रघूद्वह । देव त्वद्दर्शनादेव लङ्का भस्मीभवेत्पुनः ॥१०॥ सुवेलाद्रिश्चोत्तरेऽस्ति पतंगश्चाऽस्ति पश्चिमे । निकुम्भिला दक्षिणेऽस्ति तत्रास्ते योगिनीवटः ॥११॥ पूर्वे च लघुलङ्काऽस्ति सा मध्ये चातिशोभिता । त्रिकूटाद्रेश्चरे रम्ये मन्पुच्छानलधर्षिता ॥१२॥ प्रस्थानं कुरु देवेश गच्छामो लवणार्णवम् । तन्मारुतेर्वचः श्रुत्वा सुग्रीवं प्राह राघवः ॥१३॥ मृगांश्चमनिकान् सर्वान्प्रस्थानायाभिनोद्य । इदानीमेव विजयो मुहूर्त्तश्चाद्य वर्तते ॥१४॥ आश्विनी शुक्लदशमी श्रवणर्क्षसमन्विता । शुभाऽद्य वानरश्रेष्ठ गच्छामो लवणार्णवम् ॥१५॥ रक्षन्तु यूथपाः सेनामग्रे पृष्ठे च पार्श्वयोः । नलो भवेत्तथाऽग्रतः पृष्ठे नीलोऽथ रक्षतु ॥१६॥ सुषेणः सव्यपार्श्वे मे जांबवांस्तरे मम । गजो गवाक्षो गवयो मैदश्चैतेऽथ वानराः ॥१७॥ वह्निनेऋतिवायव्य ईशानदिक्षु समन्ततः । रक्षन्तु वानरीं सेनां द्विविदाद्यास्तथाऽपरे ॥१८॥ मदग्रे गच्छन्तु मवैत्र सेनायाः कुलघातिनः । आरुह्य मारुतिं चान्यद् गच्छत्यग्रतोऽङ्गदं सतः ॥१९॥ आरुह्य लक्ष्मणो यातु सुग्रीव त्वं मया सह । आगच्छध्वमिति चाज्ञाप्य ह्यांगदामः सलक्ष्मणः ॥२०॥ प्रतस्थे दक्षिणाशायां सेनामध्यगतो विभुः । तदा ते कपयश्चक्रुर्भुङ्कारान् भयानकान् ॥२१॥ वाद्यामासुर्वाद्यानि पञ्चवानकगोमुखैः । वारणेंद्रनिभाः सर्वे वानराः कामरूपिणः ॥२२॥ गतस्तदा दिवारात्रं क्वचित्सस्थुर्न ते क्षणम् । अभवञ्छुभशकुना लङ्कां गच्छतो राघवस्य हि ॥२३॥ ते सर्वं समतिक्रम्य मलयं च तथा गिरिम् । आययुश्चानुपूूर्व्येण ते सर्वे दक्षिणार्णवम् ॥२४॥
भागों पर पहरा कर रहे हैं ॥७॥ उसमें विविध सुरंगें लगी हैं और उसके गङ्गपर अनेक तोपें भी रखी हुई हैं । हे देवेश ! इस दशा में भी आपके इस दास ने वहाँ जाकर जो कुछ किया, सो सुनाइये॥७॥८॥ मैंने वहाँ जाकर रावणकी चौथाई सेना मार डाली है। लङ्कापुरीको जलाकर स्वर्णप्राकार गिरा दिया है ॥९॥ हे रघूद्वह मैंने तोप सदा संक्रम तोड डाली है। हे देव ! अब आपके नाममात्रसे ही लङ्का पुनः भस्म हो जायगी ॥१०॥ उस लङ्काके उत्तर सुवेलाद्रि है। पश्चिम पतंग है। दक्षिण निकुम्भिला है। जहाँपर योगिनीवट विद्यमान है। ११॥ पूर्वकी ओर लघु लंका है, जिसका मध्यभाग बड़ा ही रमणीक है। उस त्रिकूटके शिखरपर बसी हुई लङ्काको मैंने अपनी पूँछके आगसे जला दिया है ॥१२॥ हे देवेश ! अब आगे प्रस्थान करें, इस लाम क्षार समुद्रकी ओर चलें। मारुतिको बात सुनकर रामन सुग्रीवसे कहा-॥१३॥ हे सुग्रीव समस्त योनिकोको प्रस्थान करनेके लिए आज्ञा दे दो । आज इसी समय विजयप्राप्तिका शुभ मुहूर्त है ॥१४॥ आज श्रवणनक्षत्रसे युक्त आश्विन शुक्ल दशमीकी शुभ तिथि है। हे वानरश्रेष्ठ ! हमलोग आज लवणसागरकी ओर अवश्य प्रस्थान करें ॥१५॥ बड़े बड़े यूथपति वानर सेनाकी आगे पीछे और वागल रक्षा करें। आगे नल तथा पीछे नील रक्षा करे ॥१६॥ सुषेण मेरा बाई ओर तथा जाम्बवान् मेरी दहिनी बगलमें रहे। गज गवाक्ष, गवय और मैंद ये सब वानर अग्निकोण, नैऋत्यकोण वायव्यकोण तथा ईशानकोणमे रहकर वानरी सेनाकी चौतरफा रक्षा करें । शत्रुओंका मारमेमें निपुण द्विविद आदि वानर भी सेनाको सब ओरसे घेरकर चलें। मारुतिके कन्धेपर सवार होकर मैं आगे चलता हूँ और मेरे पीछे अंगदके कन्धेपर सवार होकर लक्ष्मण चलें। हे सुग्रीव ! तुम भी मेरे साथ चलो। इसी प्रकार अन्य सब वानरोंको 'चलो' ऐसी आज्ञा देकर लक्ष्मण सहित राम सेनाके बीच होकर दक्षिण दिशाकी ओर चल दिये। उस समय वे वानर भयानक भूङ्कार करने लगे ॥१३-२१॥ वे ढोल, मृदंग तथा गौके मुख सदृश बाजे बजाने लगे । कामरूप धारण करनेवाले तथा श्रेष्ठ हाथियोंके समान वीर सब वानर क्षणभर भी विश्राम न करके चलने लगे। लंकाके लिए प्रस्थित रामको अच्छे-अच्छे शकुन दीख पड़े ॥२२॥२३॥ वे मलयपर्वत तथा
सर्गः १०] सारकाण्डम् १०१
कृतः सेनानिवेशश्च राघवेणार्धिमद्भुते । चक्रुर्मन्त्रं सागरस्य तरणार्थं प्लवङ्गमाः ॥२५॥ लङ्कायां वायुपुत्रेण कृतं दृष्ट्वा स रावणः । प्रहस्तादींस्तदा प्राह कथमग्रे भविष्यति ॥२६॥ एकेन कपिनाऽस्माकं पुरतो ज्वलिता पुरी । दृष्टा सीता वनं भग्नं राक्षसा निहता रणे ॥२७॥ ममातिलालितः पुत्रः कनीयानभितो रणे । तदा ते मन्त्रिणः सर्वे दुर्धर्षं दशाननम् ॥२८॥ राजन्नुपेक्षितोऽस्माभिर्मर्कटोऽयमिति स्फुटम् । वयं तवाज्ञया कुर्मो जगत् कृत्स्नमवानरम् ॥२९॥ कुम्भकर्णस्तदा प्राह रावणं राक्षसेश्वरम् । त्वया योग्यं कृतं नैतद्यद्धृता जानकी हृता ॥३०॥ यद्यप्यनुचितं कर्म त्वया कृतमजानता । सर्वं समं करिष्यामि स्वस्थचित्तो भव प्रभो ॥३१॥ देहि देव ममानुज्ञां हत्वा रामं सलक्ष्मणम् सुग्रीवं वानरांश्चैवागमिष्यामि पुनः क्षणात् ॥३२॥ कुम्भकर्णवचः श्रुत्वा तदा प्राह विभीषणः । महाभागवतः श्रीमान् रामभक्त्यैकतत्परः ॥३३॥ विलोक्य कुम्भश्रवणादिदैत्यान्मत्तप्रमत्तानविशेषयेन । विलोक्य कामानुगमप्रमत्तं दशाननं प्राह विशुद्धबुद्धिः ॥३४॥ न कुम्भकर्णेन्द्रजितौ च राजंस्तथा महापार्श्वमहोदरौ तौ । निकुम्भकुम्भौ च तथाऽतिकायः स्थातुं न शक्ता युधि राघवाग्रे ॥३५॥ सीतां च संकृत्य महाधनेन दत्त्वाऽभिरामाय सुखी भव त्वम् । नोचेन्न रामेण विमोक्ष्यसे त्वं गुप्तः सुरेन्द्रैरपि शङ्करेण ॥३६॥ एवं शुभं रावणः स विभीषणवचो हितम् । आत्मनः प्रतिजग्राह नैवाग्रे मौढ्यकारणात् ॥३७॥ कालेन नोदितो दैत्यो विभीषणमथाब्रवीत् । बन्धुरूपेण शत्रुस्त्वं जातो नास्त्यत्र संशयः ॥३८॥ योऽन्यस्त्वेवंविधं ब्रूयाद्वाक्यं हन्मि तदैव तम् । उत्तिष्ठ गच्छ दुर्बुद्धे धिक् त्वां राक्षसकुलाधम । ३९॥ रावणेनैवमुक्तः स रुष्टेष विभीषणः । चतुर्भिर्मन्त्रिभिर्युक्तो ययौ श्रीराघवान्तिकम् । ४०॥
अग्रसर होते हुए क्रमशः दक्षिण समुद्रपर जा पहुँचे ॥ २४ ॥ रामने उस वानरी सेनाको समुद्रके किनारे स्थान ठहरा दिया और सब वानर मिलकर समुद्रके पार करनेकी समस्यापर विचार करने लगे ॥ २५ ॥ उधर लङ्कामें वायुपुत्र हनुमानके कृत्यको देखकर रावणने प्रहस्तादि मन्त्रियोंको बुलाकर पूछा कि अब आगे क्या होगा ? ॥ २६ ॥ एक ही वानरने हमारी सम्पूर्ण लंका नगरी जला दी। उसने सीताको देख लिया, वनको उजाड़ा और राक्षसोंको मार डाला । २७ ॥ मेरा अतिशय प्रिय छोटे पुत्रको भी रणमें उसने समाप्त कर दिया । तब सब मन्त्री दशाननको घेर दिलासा देते हुए कहने लगे ॥ २८ ॥ हे राजन् ! यह तो हम लोगोंने वानर समझकर उसकी उपेक्षा कर दी थी । अब यदि आप आज्ञा दें तो हम समस्त संसारको वानरशून्य कर दें ॥ २९ ॥
कुम्भकर्णने राक्षसेश्वर रावणसे कहा—आपने यह उचित नहीं किया, जो जाकर जानकीको उठा लाये ॥ ३० । यद्यपि आपने अनजानमें यह अनुचित काम किया है। तथापि मैं सब कुछ ठीक कर दूँगा। हे प्रभो ! आप निश्चिन्त रहें । ३१ । आप मुझको आज्ञा दें तो लक्ष्मणसहित राम, सुग्रीव और सब वानरोंको मारकर क्षणभरमें लौट आऊँ ॥ ३२ ।
कुम्भकर्णकी बात सुनकर भगवद्भक्तोंमें श्रेष्ठ तथा भगवान् रामकी भक्तिमें लीन विभीषणने प्रमत्त कुम्भकर्ण आदि दैत्योंकी ओर दृष्टि डालते हुए कामानुर दशाननसे विचारपूर्वक कहा—॥ ३३ ॥ ३४ ॥ हे राजन् ! कुम्भकर्ण, महापार्श्व, महोदर, निकुम्भ, कुम्भ और अतिकाय भी युद्धमें रामके सामने नहीं ठहर सकते । ३५ । इसलिए आप रामका प्रचुर धनसे सत्कार करें और उन्हें सीता समर्पण करके सुखसे रहें। नहीं तो सुरेन्द्र तथा शंकरका शरणमें जानेपर भी आपको ये जीवित नहीं छोड़ेंगे ॥ ३६ ॥
इस प्रकार शुभ तथा हितकर विभीषणके वाक्यको भी रावणने अपने प्रतिकूल ही समझा ॥ ३७ ॥ कालके प्रेरित दैत्य रावणने विभीषणसे कहा—निःसन्देह तू बन्धुरूपमें मेरा शत्रु है ॥ ३८ ॥ यदि और कोई मुझसे ऐसा कहता तो मैं उसको उसी समय मार डालता । ओ दुर्बुद्धे ! अरे राक्षसाधम ! तुझे धिक्कार
१०२ आनन्दरामायणे [ सर्गः १०
राघवश्चापि तं ज्ञात्वा तेन सख्यं चकार सः । हनुमतोदधेस्तीरे लंकां च सिकतोद्भवाम् ॥४१॥ कारयित्वा रघूत्थस्त्वं मित्रं निर्मायथाङ्गदम् । लंकायाश्चैव राज्यार्थे वानरैरभ्यषेचयत् ॥४२॥ तदा विभीषणं प्राह रामचन्द्रो विदस्य च । न्यासभूता त्वियं लंका तावत्कालं तवास्ति मे ॥४३॥ यावता रावणं हत्वा तव दास्याम्यहं शुभाम् । हनुमत्कालङ्केत्येवं नाम्ना लङ्का ख्यातिं गमिष्यति ॥४४॥ हनुमल्लङ्काब्धेश्चस्तारे वर्ततेऽद्यापि पार्वति । विभीषणोद्धाराणन्ते रामस्तां मोचयिष्यति ॥४५॥ एतस्मिन्नन्तरे तत्र गगनस्थः शुकोऽब्रवीत् । प्रेषितो रावणेनैव सुग्रीवं प्राह वेगतः ॥४६॥ त्वामाह रावणो राजा तव नास्त्यर्थविप्लवः । अह यद्यहरं भार्यां राजपुत्रस्य किं तव ॥४७॥ किष्किन्धां याहि हरिभिस्त्वं वैरं कुरु मा मया । तं धृत्वा वानराः शीघ्रं बबन्धुर्लाङ्गलबन्धनैः ॥४८॥ शार्दूलश्चापि सेनां तां दृष्ट्वाऽथभयमाययौ । तच्छ्रुत्वा रावणश्चापि दीर्घचिन्तापरोऽभवत् ॥४९॥ रामः समन्त्रयामास तद्वैकान्ते स्थितः क्षणम् । विभीषणेन सुग्रीवमरुतिभ्यां समन्वितः ॥५०॥ तीत्वार्थं जलधेर्गुल्मं संस्थितो धन्वना पुरः । सर्वथा वचनं श्रोतुं राघवस्याथ सागरः ॥५१॥ मेघवद्गर्जनं कुर्वन् वामहस्तेन धिक्कृतः । अद्यापि सागरस्त्वत्र तूष्णीमेव न विद्यते ॥५२॥ अतः संमन्त्र्य रामस्तु तदा सागररोधसि । प्रायोपवेशनं चक्रे दर्भानास्तीर्य वेगतः ॥५३॥ दिनद्वयमतिक्रम्य तृतीयदिवसे तदा । उत्थाय दर्भशयनात्पुनर्लक्ष्मणमब्रवीत् ॥५४॥ पश्य लक्ष्मण दुष्टोऽसौ वारिधिर्मामुपागतम् । नाभिन्दति दुष्टात्मा दर्शनार्थं ममानघ ॥५५॥ जानाति मानुषोऽयं मां किं करिष्यन्ति वानराः । अद्य पश्य महाबाहो शोषयिष्यामि वारिधिम् ॥५६॥ पद्मयामेवाद्य गच्छन्तु वानरा विगतज्वराः । इत्युक्त्वा चापमाकृष्य संदधे बाणमुत्तमम् ॥५७॥
है । उठ, यहाँसे निकल जा ॥ ३६ ॥ रावणके इस प्रकार धिक्कारनेपर विभीषण अपने चार मन्त्रियोंको साथ लेकर श्रीरामके समीप चला गया ॥ ४० ॥ रामने परिचय पूछकर उसके साथ मित्रता कर ली । तदनन्तर रामने हनुमत् समुद्रके किनारे रेतीकी लंका बनवाकर उसम अपने मित्र विभीषणका लंकाके राज्यके पदपर वानरो द्वारा अभिषेक करवा दिया ॥ ४१ ॥ ४२ ॥ तब रामने हंसकर विभीषणसे कहा—मित्र ! यह लंका तुम्हारे पास तबतक धरोहररूपमे रहेगा । ४३ ॥ जबतक मै रावणको मारकर तुम्हे लंका न दे दूँ, यह लंका हनुमालङ्का नामसे प्रसिद्ध होगी ॥ ४४ ॥ हे पार्वती ! वह हनुमालङ्का लंका अभी भी समुद्रके किनारे विद्यमान है । रावणका अन्त हो जानेपर राम उस विभीषणसे छुड़ा लेंगे ॥ ४५ ॥ तदनन्तर आकाश- मे स्थित शुक बोला—हे सुग्रीव ! मुझे बड़ा संभ्रान्त से रावणने तुम्हारे पास भेजा है ॥ ४६ ॥ राजा रावणने कहा है कि हमन तुम्हारा कोई हानि नहीं की है । यदि मै राजपुत्र रामकी स्त्रीका हरण कर लाया तो इससे तुम्हारी क्या हानि हुई ॥ ४७ ॥ उसने कहा है कि तुम हमारे साथ शत्रुता न करके बंदरोंको लेकर किष्किन्धा लौट जाओ । इतना कहना था कि वानरोंने इस राक्षसको पकड़कर लंगोटीकी जडमें जकड़ दिया ॥ ४८ ॥ उसके साथ गुप्तसूपसे आया हुआ दूसरा शार्दूल नामका राक्षस उस विशाल सेनाको देखकर रावणके पास गया और वानरी सेनाका पराक्रम कह सुनाया । सो सुनकर रावण बड़ी भारी चिन्ता- में पड़ गया । ४९ । इधर रामचन्द्रजी भी एकान्तम जाकर विभीषण, सुग्रीव तथा हनुमान्के साथ मंत्रणा करने लगे ॥ ५० ॥ तदनन्तर वे समुद्रके जन्म कुछ दूर जाकर सबका बात सुननेके लिये खड़े हो गये । बादमें रामने मेघकी तरह गर्जन करके बायें हाथसे सागरको धिक्कारा और कहा कि तू अभी तक चुप ही है ॥ ५१ ॥ ५२ ॥ मंत्रणा पूर्ण करके राम सागरके किनारेपर आये और कुशा बिछाकर अनशन करने लगे ॥ ५३ ॥ दो दिन बिताकर तीसरे दिन कुशासनसे उठ खड़े हुए और लक्ष्मणसे कहा— । ५४ ॥ हे अनघ लक्ष्मण ! देखो, यह दुष्टात्मा वारिधि मुझे यहाँ आया जानकर भी मुझसे मिलने या मेरा दर्शन करने नहीं आया ॥ ५५ ॥ यह समझता है कि यह मनुष्यमात्र है । यह मेरा क्या कर लेगा और ये वानर भी क्या कर लेंगे । हे महा- बाहो ! देखो, मैं आज इसको सुखा लूंगा ॥ ५६ ॥ तब वानर बिना किसी कठिनाईके पाँवसे चलकर उस पार
सर्गः १०] सारकाण्डम् १०३
तदा चचाल वसुधा दिशश्च तमसावृताः । चुक्षुभे सागरो वेलां भयाद्योजनपञ्चकम् ॥५८॥
तिमिप्रभृतयो भीताः प्रतप्ताः परितस्त्रसुः । एतस्मिन्नन्तरे साक्षान्सागरो दिव्यरूपधृक् ॥५९॥
शङ्खपाद्येन रामं समर्च्य प्रपणाम सः । अथ तुष्टाव दीनात्मा प्रार्थयामास राघवम् ॥६०॥
अभयं देहि मे राम स्वकामा मार्गं ददामि ते । इति तद्वचनं श्रुत्वा राघवः प्राह सागरम् ॥६१॥
अमोघोऽयं महाबाणः कस्मिन्देशे निपात्यताम्। लक्ष्यं दर्शय मे शीघ्रं बाणस्यास्य पयोनिधे ॥६२॥
सागर उवाच
रामोत्तरप्रदेशोऽस्ति द्रुमकुल्य इति श्रुतः । प्रदेशस्तत्र बहवः पापान्मानो दिवानिशम् ॥६३॥
बाधन्ते मां रघूश्रेष्ठ तत्र ते पात्यतां शरः । रामेण मुक्तो बाणोऽसौ क्षणादाभीरमण्डलम् ॥६४॥
हत्वा पुनः समागम्य तूणीरे पूर्ववत्स्थितः । ततोऽब्रवीद्रघुश्रेष्ठं सागरो विनयान्वितः ॥६५॥
मयि सेतुं कारयस्व नलेनोपलनिर्मितम् । विश्वकर्मसुतश्चायं वरो लब्धोऽस्त्यनेन हि ॥६६॥
द्विजस्य जाह्नवीतोये शालिग्रामस्त्वनेन हि । त्यक्तस्तदा तेन शप्तः पषाणादि तरिष्यति ॥६७॥
त्वद्धस्तादिति शापोऽयं वरश्चात्र समून्तः । इत्युक्त्वा राघवं नत्वा ययौ विधुरदृश्यताम् ॥६८॥
नलमाज्ञापयामास सेत्वर्थं रघुनन्दनः । सेतुप्रथमकल्पेतु विघ्नेशं स्थाप्य राघवः ॥६९॥
नवग्रहाणां पूजार्थं पाषाणांश्च सादरम् । नलहस्तेन संस्थाप्य पूजं तत्र महोदधौ ॥७०॥
ततः सागरसंयोगे स्वनाम्ना लिङ्गमनुत्तमम् । स्थापयिष्याति निश्चित्य मारुतिं वाक्यमब्रवीत् ॥७१॥
काशीं गत्वा शिवलिङ्गमानयेहमनुत्तमम् । मुहूर्तमध्ये नोचेन्मे मुहूर्ता त्क्रमो भवेत् ॥७२॥
तद्रामवचनं श्रुत्वा तथेत्युक्त्वा स मारुतिः । ययावाकाशमार्गेण क्षणाद्वाणमयीं मम ॥७३॥
जा सकूँगा। इतना कहकर रामने धनुषपर बाण चढ़ाकर डोरी खींची ॥५७॥ उस समय पृथिवी कांप उठी, सब दिशाओंमें अंधेरा छा गया, समुद्र भयसे क्षुब्ध होकर अपने किनारंसे चार कोस आगे बढ़ गया ॥५८॥ मीन, तिमि तथा अन्य नामकी मछलिये और मगरमच्छ आदि जलजन्तु सन्तप्त तथा व्याकुल हो गये। तब समुद्र दिव्य रूप धारण करके प्रकट और रामको रत्नोंकी भेट दे तथा नमस्कार करके दीनभावसे प्रार्थनापूर्वक कहने लगा- ॥ ५९ । ६० । हे राम ! कृपा करके आप मुझे अभयदान दे । मैं आपको लङ्का जानेका रास्ता अभी देता हूँ। उसके वचनको सुनकर रामने कहा- ॥ ६१ ॥ हे पयोनिधे ! यह मेरा महाबाण अमोघ है, टाले नहीं जा सकता। बतलाओ इसे कहाँपर गिराऊँ। इस बाणका कोई लक्ष्य बताओ ॥ ६२ ॥ सागरने कहा हे राम ! उत्तर दिशामें द्रुमकुल्य नामका देश है। वहाँ बहुतपर पापी आभीर रहते हैं। वे मुझको रात-दिन सताते हैं। हे रघूश्रेष्ठ ! आप इस बाणको वहीं ही गिराइए। तदनन्तर रामने बाण छोड़ा तो उसने जाकर क्षणभरम समस्त आभीरमण्डलको मार डाला और पुनः वापस लौटकर रामके तरकसमें पूर्ववत स्थित हो गया। बादम सागरने विनयपूर्वक रघुश्रेष्ठ रामजीस कहा-॥ ६३-६५॥ हे राघव ! आप मेरे ऊपर नलके द्वारा पत्थरोका पुल बँधवाएं । नल विश्वकर्माका पुत्र है। उसने जलपर पत्थर तैरानेका वर प्राप्त किया है ॥ ६६ ॥ एक बार इसने एक ब्राह्मणका पूज्य शालिग्राम उठाकर गङ्गाजीके जलम्ये फेंक दिया था। तब उसने शाप दिया कि जा, तेरा डाला पत्थर भी पानीमे तैरेगा । ६७ ॥ यह शाप भी वर माना जायगा। इतना कह तथा रामको नमस्कार करक समुद्र अदृश्य हो गया ॥ ६८ ॥ तदनन्तर रघुनन्दन रामने नलको पुल बाँधनेकी आज्ञा दी। सेतु बाँधत समय पहिले गणेशजीकी स्थापना की गयी ॥ ६९ ॥ पश्चात् नवग्रहांकी पूजाके लिए नलके हाथसे सादर नौ पाषाणोंकी समुद्रमे स्थापना करवाई गयी ॥ ७० ॥ इसके बाद 'अपने नाम-से मैं सागरके सङ्गमपर उत्तम शिवलिङ्ग स्थापित करूँगा' ऐसा निश्चय करके रामने मारुतिसे कहा-॥ ७१ ॥ हे हनुमन् ! तुम काशी जाकर शिवजीसे एक उत्तम लिङ्ग मुहूर्तमात्रमें माँग ले आओ। नहीं तो मेरा यह शुभ मुहूर्त टल जायगा ॥ ७२ ॥ रामकी आज्ञा सुनकर हनुमान्ने 'तथास्तु' कहा और क्षणभरमें उड़कर
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तत्रागत्याथ मां नत्वा रामकार्यं न्यवेदयत् । तच्छ्रुत्वाऽथ मया देवि राघवाय हनूमते ॥७४॥
द्वे लिङ्गे अर्पिते श्रेष्ठे ततोऽहं कपिमब्रुवम् । मयाऽपि दक्षिणे गंतुं पूर्वमेव विनिश्चितम् ॥७५॥
अगस्तिना विशेषेण यास्यामि राघवाज्ञया । एवं तद्वचनं श्रुत्वा मारुतिः प्राह मां पुनः ॥७६॥
कदा विनिश्चितं पूर्वं त्वयाऽत्र कुम्भजन्मना । तत्सर्वं मां वदस्वाद्य कृपां कृत्वा ममोपरि ॥७७॥
तन्मारुतिवचः श्रुत्वा ततोऽहमब्रुवं कपिम् । मारुते त्वं शृणुष्वाद्य पूर्ववृत्तं वदामि ते ॥७८॥
कदाचिन्नारदः श्रीमान्स्नात्वा श्रीनर्मदांऽभसि । श्रीमदोंकारमभ्यर्च्य सर्वदं सर्वदेहिनाम् ॥७९॥
व्रजन्विलोकयांचक्रे पुरो विन्ध्यं धराधराम् । संसाराघप्रसन्हारि रेवावारिपरिकृतम् ॥८०॥
रूपद्वयेन कुर्वन्तं स्थावरेण चरेण च । माभिख्येन यथार्थाख्यामुर्व्वरीमुर्व्वरीनिमाम् ॥८१॥
अथ तं नारदं दृष्ट्वा विन्ध्यः प्रत्युज्जगाम सः । गृहमानाय विधिवत्पूजयामास सादरम् ॥८२॥
गतश्रममथालोक्य बभाषेऽवनतो गिरिः । अद्यमद्यः परितृप्तस्त्वदंघ्रिरजसा मम । ८३॥
त्वदङ्गमणिमहसा महमाप्याततं तमः । मङ्गलार्थकरं चाद्य सुदिनं चाद्य मे मुने । ८ ॥
प्राक्तनैः सुकृतैरद्य फलितं मे जिगमिषोः । धराधरत्वं कुलिषु मान्यं मेऽद्य भविष्यति ॥८५॥
इति श्रुत्वा तदा किंचिदुच्छ्वस्य स्थितवान्मुनिः । पुनरुचे कुलिवरः सश्शमापन्नमानमः ॥८६॥
उच्छ्वासकारणं बदन् वद्दि सर्वाथकोविद । त्वाहं मार्जयाम्यद्य हृत्स्थेदं क्षणमात्रतः ॥८७॥
धराधराणामसमर्थ्यं मेत्रादीन् पूर्वपूरुषैः । दध्यंते समुदायानदहमेको दधे धराम् ॥८८॥
गौरीगुरुत्वाद्विमवात्राधिपत्याच्च भूसुताम् । सम्बन्धिन्वात्पशुपतेः स एको मानभूत्सताम् ॥८९॥
न मेरुः स्वर्णपूर्णत्वाद्वन्मानुनयाऽथवा । सुग्यङ्गतया वाऽपि कापि मान्यो मतो मम । ९०॥
आकाशमार्गसे ( पिछली ) वाणाशा ( काशां ) नगरीमे आया ॥ ७३ ॥ वहाँ आकर उन्होंने मुझको नमस्कार करके रामके कार्यके लिये निवेदन किया । हे देवि ! उस निवेदनको सुनकर मैने रामके लिए हनुमान्को दो उत्तम लिग दिये और कहा कि हे कपि ! मैन भी दक्षिण दिशाम जानका बहुत दिनाम निश्चय कर रक्खा है । ७४ ॥ ७५ ॥ यह निश्चय अगस्त्य मुनिक साथ हुआ था । पर बादमें सोचा कि जब विशेष-रूपसे रामकी आज्ञा होगी तभी जाऊँगा । मेरे मुखस यह सुनकर मारुतिने मुझसे फिर प्रश्न किया— । ७६ ॥ आपने पहिले कब और कहाँपर कुम्भजन्म ( अगस्त्य ) क साथ यह निश्चय किया था । यह सब हाल कृपा करके कह ॥ ७७ ॥ मारुतिकी बात सुनकर मैन कहा हे मरुते ! मै तुमको पूर्ववृत्तान्त बताता हूँ, सुनो ॥ ७८ ॥ एक समय श्रीमान् नारदमुनि नर्मदा नदीक पवित्र जलमे स्नान करके समस्त देहधारी प्राणियोंको सब कुछ देनेवाले ओंकारेश्वर शिवकी पूजा करके जा रहे थे । रास्तेमे संसार भरके पापको दूर करने-वाला तथा रेवाके जलसे परिकृत विन्ध्यपवंत सामने दिखाई दिया ॥ ७९ । ८० ॥ वह स्थावर तथा जंगम इन दो रूपोसे इस वसुमती पृथ्वोको यथार्थ नाम प्रदान कर रहा था । ८१ ॥ नारदको देखकर वह पर्वत सामने आया तथा उन्हे अपन घरपर ले जाकर सादर विधिवत् पूजन किया ॥ ८२ ॥ नारदजीका श्रम दूर हो जानेपर विन्ध्याचल विनम्र होकर कहने लगा कि आपके चरणरजसे मेरा पापपुञ्ज नष्ट हो गया ॥ ८३ ॥ हे महामुने ! आपके दैहिक तेजके संगसे अन्तःक मनोव्यथा पैदा करनेवाला मेर हृदयका अन्धकार दूर हो गया । आज मेरे लिए बडा शुभ दिन है ॥ ८४ । चिरकालसे उपार्जित मेरे प्राकृत पुण्य आज सफल हो गये । आजसे मै पर्वतोमें माननीय पर्वत माना जाऊँगा । ८५ ॥ यह सुनकर मुनिने कुछ लम्बी साँस ली । यह देखा तो घबराकर पर्वतने कहा हे सब अर्थोको जाननेवाले ब्रह्मन् ! इस उच्छ्वासका क्या कारण है ? आपने हृदयका खेद मै क्षणभरमे मार्जित कर दूंगा ॥ ८६ ॥ ८७ ॥ पूर्व पुरुषोंने मह आदि सब पर्वतोंको मिलाकर पृथ्वोको धारण करनेमें समर्थ बतलाया है, पर मैं अकेला ही उसको धारण कर सकता हूँ ॥ ८८ ॥ यद्यपि गौरीका पिता होनेसे पर्वतोका अधिपति होनेसे तथा पशुपति शिवका सम्बन्धी होनेके कारण केवल हिमालय ही सज्जनोंके मानका पात्र है ॥ ८९ ॥ मेरी समझमें तो सोनेसे भरा हुआ तथा रत्नमय शिखरोंवाला
सर्गः १०] बालकाण्डम् १०५
सर्गः १०] बालकाण्डम् १०५
परे श्रुते न किं शैला इत्युक्तोऽनर्हकृत्यः । इह संति सतो मान्या मान्यास्ते तु स्वभूमिषु ॥९१॥ सवैश्वेदेहसंदेहा वदरैकपाश्रिताः विषवृक्षीषधिव्योऽप्यन्तोऽप्यन्तर्मित्रगभः ॥९२॥ नीलश्च नीलनिलयो मंदरो मंदलोचनः । मलयः स मलयो गंधं नद्याप रैवतः ॥९३॥ हेमकूटत्रिकूटाद्याः कूटाङ्गपदभाग् तु ते । किष्किन्धक्रोञ्चमख्याद्या मागस्त्या न ते भुवः ॥९४॥ इति विंध्यवचः श्रुत्वा नारदो हृद्यचिन्तयत् अहंवंशवेशभंगो न महद्भाव कल्पते ॥९५॥ श्रीशैलमुख्याः किं शैला नेह सन्त्यपलश्रियः येषां शिखरमात्रादिर्शनेन मुक्तये मताम् ॥९६॥ अथास्य बलमालोच्यमिति ज्ञात्वाऽब्रवीन्मुनिः गन्ययुक्तं कि भवता गिरिराजं विमुञ्चता ॥९७॥ परः शैलेषु शैलेन्द्रो मेरुस्त्वामवमन्यते । मया निश्शायित चेन्नत्यद्यापि निवेदितम् ॥९८॥ अथवा मद्विधानां हि केय चिंता महन्मनाम् । पश्यत्यस्तु तुभ्यमित्युक्त्वा ययौस व्योमवर्त्मना ९९॥ गत मुनौ निंदिंद स्वमनायोद्विग्नमानसः । चिंते विचारयामास मेरोः श्रेष्ठ्य कथं विति ॥१००॥ देवं प्रदक्षिणं कुर्यान्नित्यमेव दिवाकरः । सग्रहमंडलो नूनं मन्यमानो बलाधिकम् ॥१०१॥ इति निश्चित्य विंध्याद्रिर्ववृधे स मुधैषणः । निरुध्य त्राध्यमध्वान स्वम्भोऽभूद्गगनांगणे ॥१०२॥ ततः प्रभाते सूर्योऽसौ दिशि याम्यां समुद्यतः । गंतुं रुद्धं स्वपंथानं दृष्ट्वाऽभ्यस्थोऽभवद्गिरौ ॥१०३॥ योजनानां सहस्रे द्वे द्वे शते द्वे च योजने । पः स्वमध्यनिमेपार्द्धाद्याति नापिरिर स्थितः ॥१०४॥ गते बहुतिथे काले प्राच्योदीच्या भृशार्दिताः । चण्डरश्मेः करत्रातशनमतापनाशिताः ॥१०५॥ पाश्चात्या दाक्षिणात्याश्च निद्रापुद्रितलोचनाः । भ्रमिता एव दृश्यंते मतःप्रहमवश्यम् ॥१०६॥ स्वाहास्वधावषट् स्वाहार्जने जपनीताने । पंचयज्ञक्रियालोगात्तच्चक्रम् भुवनत्रयम् ॥१०७॥
क्या दण्डक०का निवासस्थान सुन्दर भी वह विन्ध्य माननीय नहीं है ॥१०॥ क्या पृथिवीका धारण करने- अन्य सैकड़ों पर्वत इस संसारमें नहीं हैं? क्या वे सभी पर्वत सज्जनोंके मान्य हैं? नहीं, यदि हैं भी तो केवल अपने-अपने स्थानपर ॥९१॥ उदयाचल मन्द है। वह राक्षस का आश्रय देनका कृपा कल्पस ही सम्भव है। त्रिगर्तारि ओषधिमात्र धारण करते हैं, अन्तानल निस्तेज हो गया है ॥९२॥ नीलाञ्जनके नाम सम्द्रुमात्र है। मन्दराचल मन्ददृष्टि है। मलय पर्वत सर्पोंका घर है। रैवत निर्धन है ॥९३॥ हेमकूट तथा त्रिकूट आदि केवल कूट दगापदवाले ही हैं। किष्किन्धा, कौञ्च और सह्य पर्वत भी सृष्टिके बाझको हरण करनेमें समर्थ नहीं है ॥९४॥ विन्ध्याचलकी इस बातको सुनकर नारदन मनमें विचार किया कि प्राणी महत्त्वके योग्य नहीं होता ॥९५॥ क्या इस श्रीशैल आदि पर्वत निर्मल कान्ति- सम्पन्न तथा यशस्वी नहीं है ? जिसके शिखरके दर्शनमात्रसे शुद्ध अन्तःकरणवाले महान् पुरुषोंको मुक्ति मिल जाती है ॥९६॥ अतएव आज इसके बलकी परीक्षा करनी चाहिए। ऐसा विचार करके नारद मुनिने कहा - दूसर पर्वतोंका बल कुछ वर्णन किया है ॥९७॥ पर पर्वतोंमें श्रेष्ठ मेरुपर्वत तुम्हारा अपमान करता है। वह तुमसे भी अपनेको बढ़कर मानता है। बस, यही कारण है कि मैंने सम्भाषणत किया था और यह बात तुमसे भी कह दी ॥९८॥ अथवा हम जैसे महात्माओंको इस बातकी क्या चिंता है। तुम्हारा कल्याण हो ? इतना कहकर वे व्योममार्गसे चले गये ॥९९॥ नारद मुनिके चले जानेपर अतिशय चिन्ताकुल होकर विन्ध्याचलने अपने आपको बड़ी निन्दा की और सोचने लगा कि मेरुकी इतनी बड़ी महिमा क्यों है ? ॥१००॥ उस मेरुकी नक्षत्रों सहित सूर्यनारायण प्रतिदिन उसकी परिक्रमा करते हैं। सम्भवतः इसीसे उसको अपने बल-पौरुष तथा महत्त्वका अभिमान है ॥१०१॥ ऐसा निश्चय करके विन्ध्याचलने उसकी समृद्धि देखने- की उत्सुकता अपना शरीर बहुत ऊपरको बढ़ाया और मूर्द्धके समान [खम्भा] बनकर आकाशाप्यो बीचमें खड़ा हो गया ॥१०२॥ प्रातःकाल सूर्यने दक्षिण दिशाकी ओर जानेको प्रस्थान किया। तब रास्ता रुका देखकर वे वहीं रुक गए। जब बहुत दिन बीत गये, तब सूर्यके प्रचण्ड किरणसमूहके हाथसे पूर्व तथा उत्तर दिशाके लोग जलने लगे ॥१०३-१०५॥ पश्चिम तथा दक्षिण दिशाके लोगोंकी आँखें निद्रासे मुंदी रहीं। ये सब ॥१०६-१०७॥
१०६ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः १०
ततः सुरा विधेर्वाक्यादगस्तिं तन्निषेधतुम् । प्रार्थयामासुरात्रेय स मुनिर्विकलोऽभवत् ॥१०८॥
तदाऽगस्तिर्मयोक्तः स गच्छ त्वं दक्षिणां दिशम् । वाक्यान्मे गिरि बद्ध्वा मा खिद त्वं मरुत्प्रभाम् ॥१०९॥
अहमप्यचिरेणैव तत्र सिद्धास्तवे सेतौ श्रीराघवार्थं यास्यामि दक्षिणां दिशम् ॥११०॥
इति मद्बचनं श्रुत्वाऽगस्तिर्मुष्टमनास्तदा । मुक्त्वा काशीं ययौ विन्ध्यं लोपामुद्रामन्वितः॥१११॥
तमगस्त्यं सपत्नीकं दृष्ट्वा विन्ध्योऽतिकम्पितः । अतिखर्वनरो भूत्वा निनिंसुरवनीमिव ॥११२॥
आज्ञाप्रसादः क्रियतां किं करोमोति चाब्रवीत् तद्विन्ध्यवचनं श्रुत्वाऽगस्तिः प्राह च सादरम् । ११३॥
विन्ध्य साधुरसि प्राज्ञो मां च जानासि तत्त्वतः । पुनरागमनं चैन्मे तावत्त्वं त्वंतरो भव ॥११४॥
इत्युक्त्वा दक्षिणामाशामगस्तिः स ययौ तदा । वेपमानो गिरिः प्राह पुनर्जन्यमाद्य मेऽभवत् ॥११५॥
उच्छ्रिते द्वात्रिंशाब्दैः स मुनिं पश्यति दक्षिणे । नागमं तं मुनिं दृष्ट्वा पुनः खर्वोऽवनिष्ठिते ॥११६॥
अद्य श्वो वा परश्वो वा ह्यागमिष्यति वै मुनिः । इति चिन्तन्महाभागो गिरिर्ज्ञाताववस्थितः । ११७॥
मासापि मुनिशतानि नाद्यापि गिरिरागवे । अगस्त्येऽपि च तत्काले कालज्ञाऽबालकाल्पयत् ॥११८॥
जगत्स्वास्थ्यमवापोर्ध्वं पूर्ववद्भानुमन्वरैः । स मुनिर्दण्डके गत्वा मद्ध्वयं सम्प्रणच्छति । ११९॥
करोति मन्प्रतीक्षां च तस्माद्यास्याम्यहं कपे । इत्युक्तो मारुतिः काश्यां मया देवि विसर्जितः ॥१२०॥
जगामाकाशमार्गेण शीघ्रं गर्वं स मारुतिः । किंचिद्रर्वममाविष्ठो लिंगद्वयसमन्वितः ॥१२१॥
दृष्ट्वै तद्गर्वतो ज्ञात्वा सुग्रीवादीन् उचेऽब्रवीत् । मुहूर्त्तानिक्रमे सेतुर भविष्यति मनावहम् ॥१२२॥
कृत्वा लिंगं सैकतं च सेत्वादौ स्थापयामि वै । इत्युक्त्वा वानरान् सर्वान्मुनिभिः सनिषेचितः ॥१२३॥
की देखकर वा आकाशका गृह और नक्षत्र ही विद्यमान दिखायी देते थे । १०६ ।। संसारका व्यवहार, अग्निहोत्र तथा पंचयज्ञकी क्रियाओंके लोप हो जानेसे संसार क्षीण होने लगा ॥ १०७ ॥ अनन्तर ब्रह्माजीके कहनेसे देवताओने जाकर विन्ध्य पर्वतके गुरु अगस्त्य मुनिसे प्रार्थना की। तब मुनि घबराकर यहां काशीमें आये ॥ १०८ ॥ मैने (शिवजीने) अगस्त्य मुनिसे कहा कि तुम दक्षिण दिशाकी ओर जाओ, वहां जाकर विन्ध्यपर्वतको अपने बाक्यमें बांधकर निश्चिन्त भावसे मेरा भजन करना ॥ १०९ ॥ काशीत्यागसे मैं जो तुम्हारा खेद दूर करनेके लिए सेतुबन्धपर रामकी पूजा प्राप्त करनेके लिए शीघ्र ही दक्षिण प्रदेशमें आऊंगा ॥ ११० ॥ मेरे इस कथनको सुनकर अगस्त्यमुनि प्रसन्नतापूर्वक उसी समय काशी छोड़कर अपनी स्त्री लोपामुद्राके साथ विन्ध्यपर्वतकी ओर चल पड़े ॥ १११ ॥ सपत्नीक मुनिको देखकर विन्ध्याचल कंपने लगा और मानो पृथ्वीमें घुस जाना चाहता हो, इस प्रकार अतिखर्व (छोटा) रूप धारण करके बोला कि मैं आपका दास हूँ। मुझे कुछ आज्ञा देनको कृपा करें। विन्ध्यकी बात सुनकर अगस्त्य मुनि बोले- ॥ ११२ ॥ ॥ ११३ ॥ हे विन्ध्य तुम साधु, पण्डित तथा बुद्धिमन् हो और मुझे भली भांति जानते हो। अतः जबतक मैं उधरसे लौटकर पुनः यहाँ न आऊं, तब तक तुम इसी प्रकार वामनरूप नीचा सिर किये हुए रहो ॥११४॥ इतना कहकर अगस्त्य दक्षिणकी ओर चले गये। तब कम्पित होकर विन्ध्यने कहा कि आजके दिन मेरा पुनर्जन्म हुआ है ॥ ११५ ॥ बत्तीस वर्ष बाद जब उसने सिर उठाकर दक्षिणकी ओर देखा तो मुनि नहीं दिखायी दिये। तब फिर उसने वैसे ही नीचा सिर कर लिया ॥ ११६ ॥ आज, कल या परसोंतक मुनिको यहाँ अवश्य आ जाना चाहिये । इस प्रकार सोचता हुआ विन्ध्य बड़ी चिन्ता करने लगा । ११७॥ पर न वे मुनि आज तक आये और न पर्वत खड़ा हुआ । काशीमें रविका गमनवान् सूर्यके साथही वरुणने भी उसी समय अपने दण्डका क्षोभ किया । ११८॥ तब सूर्यके संचारसे जगत् पूर्ववत् पुनः स्वस्थ हुआ। वे अगस्त्य मुनि दण्डकारण्यमे जाकर मेरे वचनका स्मरण करते हुए मेरा प्रणोता कर रहे हैं, इस कारण हे कपि हनुमन् ! तू वही अवश्य जायेगा। हे देवि ! इतना कहकर मैने मारुतिको काशीसे विदा किया ॥ ११९ ॥ १२० ॥ तब मारुति शीघ्र आकाशमार्गसे रामके पास चले। उस समय मेरे दो लिंग प्राप्त करके उनके मनमें कुछ अभिमान हुआ ॥ १२१ ॥ रामने इस गर्वको जान लिया और सुग्रीव आदिसे कहा कि प्रतिज्ञाका मुहूर्त बीता जा रहा है। इसलिए मैं बालूका लिंग बनाकर सेतुके इस छोरपर स्थापित किये देता हूँ। तदनुसार सब मुनियों और
सर्गः १०] सारकाण्डम् २०७
सैकतं स्थापयामास लिङ्गं रामो विधानतः। तदा संस्मार मनसि कौतुकं रघुनन्दनः ॥१२४॥ श्रावयन्ती मणिः द्यौश्च सायंकोटिशतप्रभोपमः। तं वरं च मणिं कण्ठे बबन्ध रघुनन्दनः ॥१२५॥ वस्त्रपुष्पैर्धनैर्वस्त्रैश्चामरव्येषुभिः दिव्यैः पाद्यार्घ्यं च पूजयामास तान् मुनीन्द्रान्॥१२६॥ दत्तस्वं मुनयस्तश वरंवेगातिपूरिताः। ययुः स्वीयाश्रमान् मार्गे द्राग्ददर्श स मारुतिः ॥१२७॥ पप्रच्छ मारुतिर्विप्रान् यूयं केन प्रपूरिताः। तेऽप्यूचुर्लिङ्गमाराध्य रामेणैव पूरिताः ॥१२८॥ तत्तेषां वचनं श्रुत्वा क्रोधाविष्टोऽप्यचिन्तयत् । वृथाऽहं भ्रमितस्तेन रामेणाद्य प्रतारितः ॥१२९॥ इत्थं वदन्ययौ रामं क्रोधात्स्वीये पदद्वयम् । भुवि हतात्थ पतितस्तदा भूम्यां पदद्वयम् ॥१३०॥ गतं कपिस्तदा राममब्रवीत्किं न मे स्मृतः। सीताशुद्धिर्मया लङ्कां गत्वानीतेति सोऽद्य हि ॥१३१॥ तस्य मेऽद्योपवापोऽत्र काशीं प्रेष्य त्वया कृतः । किमर्थं भ्रमितश्चाहं यदीत्थं ते हृदि स्थितम् ॥१३२॥ अमरिष्यन्मया ज्ञातं चेत्पूर्वं हृद्गतं तव। काशीमद्य हि गत्वा किमर्थं लिङ्गमानये ॥१३३॥ एकं त्वदर्थमानीतमपरं लिङ्गमुत्तमम्। मयाऽऽप्यार्यं समानीतं तदग्रे किं करोम्यहम् ॥१३४॥ एवं क्रोधयुतं वाक्यं किञ्चिद्गर्वसमन्वितम्। रामः श्रुत्वा कपिं प्राह कपे त्वं सत्यवागसि ॥१३५॥ पर्यन्तस्थापितं लिङ्गं समुत्पाट्य त्वं बलात् । स्थापयामि त्वयानीतं ह्यद्या विश्वेश्वराभिधम्॥१३६॥ तथेत्युक्त्वा मारुतिः स संवृतस्येश्वरस्य च। प्रवेष्ट्य मस्तके पुच्छं बलेनान्दोलयन्मुहुः ॥१३७॥ त्रुटितं वत्कपेः पुच्छं पपात भुवि मूर्च्छितः। असुर्वानराः सर्वे न चचालेशस्तदा ॥१३८॥ स्वस्थो भूत्वा मारुतिः स गलगर्वस्तदाऽभवत् । ननाम परया भक्त्या प्रार्थयामास तं मुहुः ॥१३९॥ मायाऽपराधितं राम तत्क्षमस्व कृपानिधे । तदाह मारुतिं रामस्त्वं मल्लिङ्गोत्तरे न्विदम् ॥१४०॥
वानरोंको बुलाकर रामने विधिवत् बालुका लिङ्गको स्थापित कर दिया। पश्चात् भगवान् रामने कौतुक मणिका स्मरण किया ॥ १२३-१२४ ॥ स्मरण करते ही करोड़ों सूर्यके समान प्रभाशाली वह मणि आकाशमार्गसे आ गया। तब रघुनन्दन रामने उस मणिको कण्ठमें बाँध लिया ॥ १२५ ॥ उस मणिसे प्राप्त धन, वस्त्र, आभरण, शंख, धनु, दिव्य बाणवान तथा पायस आदिसे रामने मुनियोंका पूजन-सत्कार किया ॥ १२६ ॥ श्रीरामसे पूजा प्राप्त करके प्रसन्न हो मुनि अपने-अपने आश्रमोंको जा रहे थे, तभी रास्ते में उन्हें मारुतिने देख लिया ॥ १२७ ॥ तब हनुमान्ने उनसे पूछा कि आपकी पूजा किसने की है ? उन्होंने उत्तर दिया कि रामने शिवालयकी आराधना तथा स्थापना करके हम लोगोंका पूजन की है ॥ १२८ ॥ हनुमान् उनकी बात सुनते ही क्रुद्ध होकर विचारने लगे कि रामने आज मुझसे व्यर्थ इतना परिश्रम कराके ठगा है ॥ १२९ ॥ यह विचारते हुए वे क्रोधसे रामके पास गये और जातेही उन्होंने अपने दोनों पाँवोंको जमीनपर पटका। इससे उनके दोनों पांव पृथ्वीमें धंस गये। बादमें हनुमान्ने रामसे कहा कि क्या आपका मेरा स्मरण नहीं था ? जिस हनुमान्ने लङ्कामें सीताकी खोज की थी और लौटकर आपको उनकी खबर दी थी, ॥ १३० । १३१ ॥ उसी हनुमान्का आज आपने काशी भेजकर ऐसा उपहास किया ? यदि आपके मनमें यह था तो फिर मुझे इस तरह व्यर्थ क्यों सताया ? ॥ १३२ । यदि मुझे आपका अभिप्राय ज्ञात हो जाता तो मैं कभी काशी जाकर ये दो शिवलिंग न लाता ॥ १३३ ॥ इनमें से एक आपके लिए और दूसरा उत्तम शिवलिंग अपने लिये ले आया हूँ। अब मैं इस आपके शिवलिंगका क्या करूँ ! ॥ १३४ ॥ इस प्रकार कुछ क्रोध तथा गर्वयुक्त हनुमान्का वाक्य सुनकर रामने कहा कि हे कपे ! तुम्हारा कहना सत्य है । १३५॥ अब तुम यदि इस मेरे स्थापित लिङ्गको पूँछसे लपेटकर उखाड़ लो तो मैं तुम्हारे लाये हुए विश्वेश्वरलिङ्गको यहीं तुरन्त स्थापित कर दूँ। ॥ १३६॥ 'बहुत अच्छा' कहकर हनुमान्ने उस बालूके लिंगके उपरी भागमें पूँछ लपेटकर बारम्बार खूब जोरसे हिलाया ॥ १३७॥ जिससे सहसा उनकी पूँछ टूट गयी। वे जमीनपर गिर पड़े और मूर्च्छित हो गये। परन्तु बालुका लिंग तनिक भी नहीं हिला यह देखकर सब वानर हंसने लगे ॥ १३८॥ थोड़ी देरमें मारुति स्वस्थ हो गया गर्व छोड़कर भक्तिसे रामको नमस्कार करके प्रार्थना करने लगे — ॥ १३९॥
| १०८ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः १० |
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विश्वनाथाभिधं लिङ्गं स्वीयं संस्थापयाधुना । तथेति मारुतिर्लिङ्गं स्थापयामास सादरम् ॥१४१॥
मारुतेश्चैव लिङ्गाय ददौ रामो वरं तदा अमपूज्य विश्वनाथं मारुते त्वत्प्रतिष्ठितम् ॥१४२॥
यमादौ पूजयन्त्यत्र ये नरा लिङ्गमनुत्तमम् । रामेश्वराभिधं सेतौ तेषां पूजा वृथा भवेत् ॥१४३॥
इत्युक्त्वा तं पुनः प्राह रामो राजीवलोचनः । मदर्थं यत्समानीतं त्वया लिङ्गं महत्तमम् ॥१४४॥
विश्वनाथस्य तत्पृष्ठामस्तु देवालये चिरम् । अनर्चितमवन्यां तदप्रतिष्ठितमुत्तमम् ॥१४५॥
अग्र कालान्तरेणाहं तच्चापि स्थापयामि वै । तत्तत्र वर्ततेऽद्यापि लिङ्गं विश्वेश्वरान्तिके ॥१४६॥
अप्रतिष्ठापितं भूमौ न केनापि प्रपूजितम् । पुनः प्राह कपिं रामस्त्वमत्र च्छिन्नलाङ्गुलः ॥१४७॥
वस भूमौ गुप्तपादः स्मरन्मद्रूपगर्वित निवृतम् । ततः कपिः स्वीयमूर्तिं स्थापयामास स्वाग्रतः ॥१४८॥
छिन्नपुच्छा गुप्तपादा सा तत्राद्यापि वर्तते । पतितो मूर्च्छितो यत्र मारुतिस्तत्र तद्ध्रुवम् । १४९॥
बभूव मारुतेर्नाम्ना तीर्थं पापप्रणाशनम् । रामस्तत्राकरोत्पुण्यं स्वनाम्ना तीर्थमुत्तमम् । १५०।
स्वाङ्गेन स्थापयामास मूर्तिं तत्र रघूद्वहः । सेतुमाधवनाम्नी सा वर्ततेऽद्यापि पार्वति ॥१५१॥
स्वनाम्ना लक्ष्मणश्चापि चकार तीर्थमुत्तमम् । ततो रामः स्वहस्तेन स्पृष्ट्वा मारुतिलाङ्गुलम् ॥१५२॥
चकार पूर्ववद्रम्यं दृढसन्धिसमन्वितः । तत्पुच्छवेष्टनाज्जातः कृशो रामेशमस्तकः ॥१५३।
स तथैव कृशोऽद्यापि तत्रास्ति शिवमस्तकः । तदारभ्य त्यक्तगर्वश्चाभूद्रामे स मारुतिः ॥१५४।
ततोऽहं सैकताल्लिङ्गादाविर्भूय रघूद्वहम् । अब्रुवं देवि तत्सर्वं शृणुष्व ते वदाम्यहम् ॥१५५।
राघवेन्द्र गुणश्रेष्ठ शृणु वृत्तं पुरातनम् । एकदाऽहं पुरा भूमौ मलिनाम्बरसंयुतः । १५६।
भिक्षार्थं कौतुकाद्विप्ररूपेणाविचरं सुखम् । ऋषीणामाश्रमायेषु ह्यटनन् मां विलोक्य च ॥१५७॥
हे राम ! मम वा अपराध हुआ हो, उसे क्षम कर । यह श्लोक अप श्रुतिनिधि है । तदनन्तर रामने कहा हे मारुति तुम मत्स्थापित लिङ्गके उत्तरकी ओर इस विश्वनाथ नामक अपने लिङ्गको स्थापित करो । 'तथास्तु' कहकर मारुतिने सादर शिवलिंगकी स्थापना कर दी ॥१४०॥१४१॥ तब रामने उस मारुतिलिङ्गको वरदान देत हुए कहा हे मारुते तुम्हारे द्वारा स्थापित विश्वनाथलिङ्गकी पूजा किये बिना जो सेतुबन्धरामेश्वरकी पूजा करेगा उसकी पूजा व्यर्थ हो जायगी ॥ १४२॥ १४३॥ इतना कहकर रामने फिर हनुमान्से कहा कि जो तुम मेरे लिए उत्तम लिङ्ग लाये हो ॥ १४४॥ वह विश्वनाथलिङ्ग यों ही इस देवालयमें पड़ा रहे । बहुत कालतक यह उत्तम लिङ्ग पृथ्वीपर अपूजित ही पड़ा रहेगा । १४५॥ आगे चलकर बहुत दिनों बाद इसकी भी मैं अच्छी स्थापना करूंगा। वह लिङ्ग अभी भी वहीं विश्वेश्वरलिङ्गके पास पड़ा हुआ है । १४६ ॥ न अभी उसका प्रतिष्ठा हुई है और न कोई उसकी पूजा ही करता है रामने फिर हनुमान्से कहा कि तुम्हारी पूंछ यहींपर छिन्न हुई है । अतः तुम यहींपर भूमिमें छिन्नपुच्छ तथा गुप्तपाद होकर अपने गर्वका स्मरण करते हुए पड़े रहो, तब हनुमान्ने अपने आगे वहीं अपनी मूर्ति स्थापित कर दी । १४७ १४८।, तथा का वहीं हनुमान्की छिन्नपुच्छ और गुप्त पांवकी मूर्ति विद्यमान है । जहाँपर मारुति मूर्छित होकर गिरे थे, वह उत्तम स्थान मारुतिके नामसे पवित्र तथा पापोंको नष्ट करनेवाला तीर्थ प्रसिद्ध हुआ । वहीं ही रामने भी अपने नामसे एक उत्तम तीर्थ बनाया ॥ १४९ ॥ १५० । रामने वहीं अपने अंगकी एक मूर्ति भी स्थापित कर दी । सेतुमाधव नामकी वह मूर्ति अभी भी वहां प्रस्तुत है ॥ १५१ ॥ हे पार्वति ! लक्ष्मणने भी वहीं अपने नामका उत्तम तीर्थ स्थापित किया । पश्चात् रामने अपने हाथसे छूकर हनुमान्की पूंछको पूर्ववत् सुन्दर तथा दृढ़ सन्धियुक्त बनाकर हनुमान्को प्रसन्न कर लिया । पूंछके लपेटे जानेके कारण रामेश्वरका मस्तक कुछ दब गया था ॥ १५२ ॥ १५३ ॥ वह शिवमस्तक अभी भी वैसा ही चिपटा है, तबसे हनुमान् रामके समक्ष सर्वथा गर्व्वरहित हो गये । १५४। हे देवि ! उस समय बालुक लिङ्गमसे प्रकट होकर मैने रघूद्वह रामसे जो कुछ कहा था, वह सब तुमको सुनाता हूँ । ध्यान देकर सुनो ॥१५५ । मैन कहा - हे राघवेन्द्र ! हे रघुश्रेष्ठ तुम्हें मैं एक प्राचीन इतिहास सुनाता हूँ । एक समय कौतुकवश मै पुराने कपड़े पहिन तथा ब्राह्मणका
सर्गः १०] बालकाण्डम् १०९
सर्गः १०] बालकाण्डम् १०९
मद्रूपमोहिताः सर्वा ऋषिपत्न्यः सहस्रशः । भग्नेच्छे ताः समागन्तुमृषिभित्रासिता अपि ॥१५८॥ ततो ते मुनयः सर्वे मामज्ञात्वा मुनीश्वराः । ददुः शापं महाघोरं क्रोधसञ्चिन्नमानसाः ॥१५९॥ ऋष्यर्थे मोहिता नार्यस्त्वया तस्माद्विद्विजोत्तम । पतत्वद्य रतेरंगं लिंगं भुवि च नो गिरा ॥१६०॥ एवं द्विजैस्तदा शप्तोऽपतल्लिङ्गं तदा भुवि । द्विजशापस्य सं राम गतोऽहं गुप्ततां तदा ॥१६१॥ द्विजनायोऽप्यदृष्ट्वा मां जग्मुः स्वं स्वं गृहं प्रति । तल्लिंगं वर्धते भूयो गगनं व्याप्य संस्थितम् ॥१६२॥ तद्दृष्ट्वा चकिता देवास्तस्यान्तं द्रष्टुमुद्यताः । पश्यन्तस्तस्य नोऽप्यन्दानन्तमौण्ड्यं बेधसः ॥१६३॥ तदा मामेत्य स विधिभेदाऽङ्गं न्यवेदयत् । अकाले प्रलयस्त्वद्य शम्भोऽनेन भविष्यति ॥१६४॥ तदा मया पूर्ववृत्तं विधि संश्राव्य सादराम् । त्रिशूलो देयसो दत्तम् छेतुं सोऽब्रवीच्च माम् ॥१६५॥ कथं तैऽङ्गं दास्येऽहं त्वमेव छेत्तुमर्हसि । ततो मयार्कखण्डानि कृतानि तस्य राघव ॥१६६॥ त्रिशूलेनापि क्षिप्तानि भूमौ निर्गतानि हि । तज्जातान्यत्र लिंगानि ज्योतिर्मयानि द्वादश ॥१६७॥ ॐकारः सोमनाथश्च त्र्यम्बको मल्लिकार्जुनः । नागेशो वैद्यनाथश्च काशीविश्वेश्वरस्त्वहम् ॥१६८॥ केदारेशो महाकालो भी मेशो घुमृणेश्वरः । एवमेकादश प्रोक्ता ज्योतिर्लिङ्गमयाः शुभाः ॥१६९॥ गन्धमादननाम्नेगो मेरोरीशानदिक्स्थितः । आपोच्छिन्नः न कस्यापि मानवस्याक्षियोचरः ॥१७०॥ तदा ते मुनयः सर्वे शिवं बुद्ध्वा तु लज्जिताः । ददुश्च पुनर्लिंगं मदास्तु गिरिजाप्रिय ॥१७१॥ ततः प्रलयवातेन गन्धमादननामकम् । तन्मेरोरुत्तरे शृङ्गेप्रकम्पानापतद्भुवि ॥१७२॥ तदिदं बान्धिमद्येऽगं दानेण सागरागाम् । गन्धमादननाम्नेदं शृङ्गं पश्यात्र राघव ॥१७३॥ गन्धमादननाम्नश्च लिंगं द्वादशमं शिवम् । अस्यप्रतिष्ठितलिंगम्य हंप्राप्यामान्तिके स्थितम्॥१७४॥
... कर आनंदसे भिक्षाके लिए मुनियोंके आश्रममें विचर रहा था। इस प्रकार ऋषियोंके आश्रममें घूमता हुआ रूप देखकर संख्या ऋषिपत्नियां मन होकर मोहित हो गयीं। पतिव्रताके संस्कारपर भी न नहीं रही और घर पदपूर्वक पूछने लगीं ॥ १५६-१५८ ॥ तब वे सब मुनि और मुनि न पहिचानकर बहुत घबराय और क्रुद्ध होकर उन्होंने मुझ बड़ा भयानक शाप दे दिया ॥ १५९ ॥ उन्होंने कहा—अरे अधम ब्राह्मण ! तूने रति करनेके लिए हमारे स्त्रियोंको मोहित कर लिया है, इससे तेरे रति का साधन अङ्ग अर्थात् लिङ्ग हमारे कहेनुसार कटकर समान पर गिर पड़े ॥ १६० ॥ हे राम ! उनके शापम द्विजवर्य्याश मेरा लिङ्ग कटकर तुरन्त जमीनपर गिर पड़ा। आश्रम में अन्तर्धान हो गया ॥ १६१ ॥ मुझ न देखकर ऋषियोंके स्त्रिय भी अपने-अपने घर चली गयीं । तदनन्तर वह लिङ्ग इस प्रकार बढ़ा कि आकाश तक व्याप्त हो गया ॥ १६२॥ यह देखकर ब्रह्मा बहुत चकित हुए और उसका अन्त देखनेके लिए उद्यत हो गये । बहुत कालतक देख पन्ता नान्तान्तर भी न पाया। जब मेरे लिङ्गका अन्त नहीं मिला ॥ १६३ ॥ तब उस परम अम्बर ईश्वरने तुरन्त उनसे कहा—हे शम्भो, इस ही अकालमें ही प्रलय होना चाहता है ॥ १६४ ॥ मैंने ब्रह्माको पूर्ववृत्तान्त सुना कर सादर उनके हाथमें उस लिङ्गको काटनेके लिए अपना त्रिशूल दे दिया। तब ब्रह्मा ने कहा— ॥ १६५ ॥ न ब्रह्मा आपके अङ्गको कैसे काट सकता हूँ। आप ही इसे काटें । हे राघव ! तब मैंने उस लिङ्गके बारह टुकड़े कर डाले ॥ १६६ ॥ फिर त्रिशूलसे ही उठाकर उनको भूमिपर इधर उधर फेंक दिया, वे ही बारह टुकड़े यहांपर बारह ज्योतिर्लिङ्ग नामसे प्रख्यात हुए ॥ १६७॥ ॐकारनाथ, सोमनाथ, त्र्यम्बकेश्वर, मल्लिकार्जुन, नागेश, वैद्यनाथ, काशी विश्वनाथ, केदारनाथ, करदारेश्वर, महाकाल, और घुमृणेश्वर ये ग्यारह शुभ ज्योतिर्लिङ्ग हैं ॥ १६८ । १६९॥ बारहवां लिङ्ग गन्धमादन पर्वतके ईशान कोणवाल शिखरपर बहुत काल तक स्थित रहकर भी किसी मनुष्यका दृष्टान्त नहीं भ या ॥ १७० ॥ तब मुनियोंने शिवके रूप शिवको पहिचानकर पुनः वर दिया—हे गिरिजाप्रिय ! तुमदुष्ट फिर लिंग हो जाय ॥ १७१ ॥ तदनन्तर उस समय वह मेरुका गन्धमादन नामक उत्तरी शिखर प्रलयवायुसे उड़कर यहाँ आ गिरा ॥ १७२ ॥ हे राघव ! यह गन्धमादन शिखरको तुम यहाँ देखिया समुद्रके संगमपर नसमें देख सकते हो ॥ १७३ ॥ बारहवां गन्धमादन ...
११० आनन्दरामायणे [ सर्गः १०
एतावत्कालपर्यन्तं नेदं केचिदलोकितम् । अद्य त्वया सादराद्यद्दृष्टं स्पष्टं विमोक्षदम् ॥१७५॥ स्वप्रतिष्ठितलिङ्गस्य प्रसादादवनीतले । ख्यातिं गतं त्विदं लिङ्गं यस्मात्तस्माद्रघूत्तम ॥१७६॥ अस्य लिङ्गस्य यज्ज्योतिर्मदीये त्वत्प्रतिष्ठिते । याम्यद्यैव संकेतेऽत्र लिङ्गे सेतौ स्थिरा भव ॥१७७॥ ज्योतिर्लिङ्गं द्वादशमं तव रामेश्वराभिधम् । वदिष्यन्ति जनाः सर्वे ह्यद्यारभ्य रघूत्तम ॥१७८॥ पूजास्रग्वादिकं कर्म यद्यत्किंचिदिरा मम । सर्वत्र लिङ्गे तत्सर्वमस्तु रामेश्वरे सदा ॥१७९॥ अहं चापि मुनेर्वाक्यादगस्तेस्त्वत्प्रियापि च । त्यक्त्वा काशीमागतोऽस्मि त्वल्लिङ्गेऽस्मिन्सदावसम् ॥ प्रणमेत्सेतुबन्धे यः पुमान् रामेश्वरं शिवम् । ब्रह्महत्यादिपापेभ्यो मुच्यते तदनुग्रहात् ॥१८१॥ स्वं प्रदाय रघुश्रेष्ठ वरं देन जनाः सदा । स्नानार्थमाययिष्यन्ति मणिकर्णीजलं मम ॥१८२॥ शर्वस्यैतद्वचनं श्रुत्वा प्रमथो गणनायकः । जगाद स्नात्वा सेतुबन्धे रामेशं परिपश्यति ॥१८३॥ संकल्प्य नियतो भूत्वा गृहीत्वा सेतुवालुकाम्। काडिकामिर्यत्नेन गत्वा वाराणसीं शुभाम् ॥१८४॥ क्षिप्य्त्वा तां बालुकां त्यक्त्वा वेण्यां बालुकण्डिकाम् । आनीय गङ्गासलिलं रामेश्वरमभिषिच्य च ॥१८५॥ समुद्रे त्यक्तकङ्कारो मोक्षं प्राप्नोत्यसंशयम् । संकल्पेन विना गंतो रामेशं नागमिव्यति ॥१८६॥ आगता चेत्तदा ज्ञेयः संकल्पः पूर्वजन्मनि । कृतोऽस्तीत्यत्र मद्रूपवाद्यात्र कार्या विचारणा ॥१८७॥ एवं नानावदान्रामो यावल्लिङ्गाग्र मोऽब्रवीत् । तावत्तत्र समायातः कुम्भजन्मा मुनीश्वरः ॥१८८॥ नत्वा शङ्करो रामं रामोऽपि प्रणनाम तम् । तदा मुनिः प्राह रामं प्रसादात्तव राघव ॥१८९॥ दर्शनं विश्वनाथस्य जातं मेऽद्यात्र वै चिरात् । अथात्र तुष्टिर्जाता मे लिङ्गमत्र करोम्यहम् ॥१९०॥ इत्युक्त्वा स्थापयामास स्वनाम्ना लिङ्गमुत्तमम् । रामेश्वराग्निदिग्भागे कुम्भजन्मा मुदान्वितः ॥१९१॥
प्रिया तुम्हारे प्रतिष्ठित लिंगकी ईशानदिशामें वाम ही विद्यमान है ॥ १७४ ॥ इतने समय तक इसको किसीने नहीं देखा था । पर आज वानरसहित तुमने इस मोक्षप्रद लिंगका स्पष्ट देख लिया है ॥ १७५ ॥ तुम्हारे द्वारा स्थापित लिंगकी महिमासे ही पृथ्वीपर इसकी प्रसिद्धि हुई है। इस कारण हे रघुत्तम ! इस लिंगका जो ज्योति है, वह ज्योति तुम्हारे द्वारा स्थापित बालुकामय लिंगमें भरे कहुनेसे आज ही चली जायगी ॥ १७६ ॥ १७७ ॥ हे रघूत्तम ! आजसे बारहवां ज्योतिर्लिंग तुम्हारा स्थापित रामेश्वर ही दुनियाके सब मनुष्योम प्रसिद्ध होगा ॥ १७८ ॥ भेंट वस्त्रगले दूवा आदि सब उपचार तथा तुम्हारे रामेश्वर लिंगका ही होगा ॥ १७९ ॥ मैं या अगस्त्य मुनिके तथा तुम्हारे कहनेसे काशी छोड़कर यहाँ आ गया हूँ और अब तुम्हारे इस लिंगमें ही निवास करूंगा ॥ १८० ॥ जो मनुष्य सेतुबन्ध रामेश्वरको प्रणाम करेगा, वह मेरी कृपासे ब्रह्महत्या आदि भयानक पापोसे भी मुक्त हो जायगा ॥ १८१ ॥ हे रघुश्रेष्ठ ! आप मुझे यह वर दें कि सब लोग मुझे स्नान करानेक लिए सदा काशीका मणिकर्णिकाका जल लाकर चढ़ाण करें ॥ १८२ ॥ हे पार्वती ! शरे इस वचनको सुनकर श्रीराम हर्षित होकर बोले कि जो मनुष्य सेतुबन्धमें स्नान करके रामेश्वर शिवका दर्शन करेंगे ॥ १८३ ॥ फिर दृढ़ संकल्पसे सेतुकी बालुकाको काँवरमें रखकर प्रेम तथा यत्नसे काशीमे से जाकर गङ्गाके प्रवाहम् डालने और उस काँवरको वही छोड़कर दूसरी काँवरके द्वारा गंगाजल लाकर उससे रामेश्वरका अभिषेक करेंगे ॥ १८४ ॥ १८५ ॥ वहाँ उस काँवरको को समुद्रमें फेंककर निःसंदेह सायुज्यपदको प्राप्त होगे । जबतक दृढ़ संकल्प न होगा, तब तक रामेश्वर आना न होगा ॥ १८६ ॥ कदाचित् कोई आगया तो यही मानना चाहिए कि उसके पूर्वजन्मका संकल्प था । मेरे कहनेसे आप इस बातमें तनिक भी संदेह न करें ॥ १८७ ॥ इस प्रकार राम जब अनेक वर दे रहे थे, तभी वहीं कुम्भजन्मा (अगस्त्य) मुनि आ पहुंचे ॥ १८८ ॥ उन्होंने वहाँ आकर शिव तथा रामको प्रणाम किया । तब रामने भी मुनिको प्रणाम किया । अगस्त्य मुनिने रामसे कहा— हे राघव ! आपके अनुग्रहसे मुझे आज बहुत दिनके बाद विश्वनाथका दर्शन प्राप्त हुआ है। इससे मुझे बड़ी प्रसन्नता हो रही है। इसलिए मैं भी यहाँ एक लिंग स्थापित करता हूँ ॥ १८९ ॥ १९० ॥ इतना कहकर अगस्त्य मुनिने भी अपने नामसे एक उत्तम
सर्गः १०] सारकाण्डम् १११
पूजयामास तल्लिङ्गमगस्त्येश्वरनामकम् । नत्वा स्तुत्वा विश्वनाथं शम्भुं रामेश्वरं तथा ॥१९२॥
दृष्ट्वा पुरातनं लिङ्गं गंधमादननामकम् । ययौ स्वीयाश्रमं तुष्टः कुंभजन्मा मुनीश्वरः ॥१९३॥
सेतौ रामेश्वरस्यैव देवि देवालये शुभे । दिश्याग्नेय्यामगस्ती शमीशान्यां गंधमादनम् ॥१९४॥
वर्तेतेऽद्यापि द्वे लिङ्गे कश्चिज्जानाति वा न वा । प्रसिद्धोऽभूच्च रामेशः स्वर्गमृत्युरसातले ॥१९५॥
ततो रामाज्ञया सेतुं नलः कर्तुं मनो दधे । किंचिद्गर्वसमाविष्टस्तज्ज्ञातं राघवेण हि ॥१९६॥
यावदेकां शिलां त्यक्त्वा नलोऽन्यां प्रक्षिपञ्जले ।
तावत्तरंगकल्लोलैः सागरस्य इतस्ततः ॥१९७॥
गच्छन्तिस्म शिलाः सर्वास्ता दृष्ट्वा खिन्नमानसः । गलगर्वस्तदा रामं नलो वृत्तं न्यवेदयत् ॥१९८॥
रामः श्रुत्वा नलं प्राह रामेति द्वेऽक्षरे मम । द्वयोः संधिसिद्ध्यर्थं पृथग्विलिखतां द्वयोः ॥१९९॥
सर्वत्रैव लिखित्वा हि दृढः संधिर्भविष्यति । तथेति रामवचनात्तथा चक्रे नलस्तदा ॥२००॥
कृतः पंचदिनैः सेतुः शतयोजनमुत्तमः । कृतानि प्रथमेनाह्ना योजनानि चतुर्दश ॥२०१॥
द्वितीयेन तथा चाह्ना योजनानां च विंशतिः । तृतीयेन तथा चाह्ना योजनान्येकविंशतिः ॥२०२॥
चतुर्थेन तथा चाह्ना द्वाविंशतिरिति श्रुतम् । पंचमेन त्रयोविंशद्योजनानां कृतं त्विति ॥२०३॥
विस्तृतो द्वादश प्रोक्तो योजनानि दृढन्वयः । एवं बबंध सेतुं स नलो वानरसत्तमः ॥२०४॥
ये मज्जंति निमज्जयंति च परान् ते प्रस्तरा दुस्तरे वार्धौ येन तरंति वानरभटान् संतारयंतेऽपि च ।
नैते ग्रावगुणा न वारिधिगुणा नो वानराणां गुणाः श्रीमद्राघवधेः प्रतापमहिमा सोऽयं समुज्जृम्भते ॥२०५॥
तेनैव जग्मुः कपयो योजनानां शतं द्रुतम् । आरुह्य मारुतिं रामो लक्ष्मणोऽप्यंगदं तथा ॥२०६॥
जगाम वायुवल्लङ्कासंनिधिं सेनया पुरः । असंख्याताः सुवेलाद्रिं रुरुहुः प्लवगोत्तमाः ॥२०७॥
तक स्थापित किया। मुनिने अगस्त्यके साथ रामेश्वरके अग्निकोणमें उसका स्थापना की ॥ १९१ ॥ इस प्रकार मुनिने अगस्त्येश्वर नामक लिङ्गका पूजा करके विश्वनाथ, रामेश्वर एवं गौरीश्वरकी स्तुति तथा प्रणाम करनेके अनन्तर पुरातन गन्धमादन लिङ्गका दर्शन किया और प्रसन्न होकर अपने आश्रमको चले गये । १९२ ॥ १९३ ॥
हे देवि ! सेतुबंध रामेश्वरके देवालयमें ही आग्नेयकोणमें अगस्त्येश्वर तथा ईशानकोणमें गन्धमादनेश्वरका लिङ्ग अभी भी विद्यमान है। उन्हें कोई इन नामोंसे जानता है और कोई नहीं भी जानता । रामेश्वरका लिंग स्वर्ग, पाताल तथा मृत्यु इन तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध हो गया ॥ १९४ ॥ तदनन्तर रामकी आज्ञासे नलने कुछ गर्वयुक्त होकर पुल बाँधना आरम्भ कर दिया । रामको इस गर्वका पता लग गया ॥ १९५ ॥ १९६ ॥ इसके बाद नलने जलमें एक पत्थर डालकर दूसरा ज्यों ही डाला, त्यों ही समुद्रकी तरंगित लहरियोंसे सब शिलाएं इधर-उधर फिसलने लगीं । यह दशा ही खिन्नमन हो तथा गर्व त्यागकर नल रामके पास गये और सब वृत्तान्त निवेदन किया । १९७ ॥ १९८ ॥ यह सुनकर रामने नलसे कहा कि मेरे नामके 'रा म' ये दो अक्षर पत्थरोंको एक साथ मिलानेके लिये दोनों शिलाओकी बगलमें लिख दो । १९९ ॥ ऐसा लिख देनेसे सब एक दूसरेके साथ दृढ़तासे जुड़ जायेंगे और संधि (जोड़) न टूटेगी । नलने भी 'तथास्तु' कहकर रामके कथनानुसार ही किया ॥ २०० ॥ ऐसा करनेपर पाँच दिनमें सौ योजन लम्बा, सुन्दर और दृढ़ सेतु बन गया । पहिले दिन चौदह योजन, दूसरे दिन बीस, तीसरे दिन इक्कीस, चौथे दिन बाईस और पाँचवें दिन तेईस योजन पुल बाँधा । इस प्रकार सौ योजन पूरे हो गये । २०१-२०३ ॥ उसमें भी बारह योजन एकमात्र पत्थर-का ही पक्का पुल बनाया गया । इस तरह वानरोत्तम नलने सेतु बाँधकर तैयार किया ॥ २०४ ॥ जो पत्थर स्वयं डूबते और दूसरोंको डुबाते हैं, वे ही दुस्तर समुद्रमें स्वयं तैरने तथा दूसरोंको तारने लग गये । यह गुण न पत्थरका है, न समुद्रका और न बानरोंका । परन्तु यह गुण तो केवल दशरथतनय रामका ही है । जिनकी महिमा सर्वत्र व्याप्त हो रही है ॥ २०५ ॥ उस पुलके द्वारा वानरगण सौ योजन सागर शीघ्र ही पार कर गये । राम हनुमान्के कंधे तथा लक्ष्मण अङ्गदके कंधेपर चढ़कर वायुवेगसे सेनाके साथ लंकाके पास
११२ आनन्दरमायणे [ सर्गः १०
ततः सैन्ययुतो रामः सुवेलाद्रिं ययौ मुदा दिदृक्षू रावणो लङ्कामध्यारोहाद्रि शुभम् ॥२०८॥ सुवेलाद्रिं महारम्यं तरुवल्लिर्विराजितम् । ददर्श लङ्कां विस्तीर्णां रामश्चित्रध्वजाकुलाम् ॥२०९॥ चित्रप्रासादमध्वां स्वर्णप्राकारतोरणाम् । परिखाभिः शतघ्नीभिः सक्रमैश्च विराजिताम् ॥२१०॥ प्रासादोपरि विस्तीर्णप्रदेशे दशकन्धरम् । पश्यंत कपिसैन्यं तं सन्ददर्श रघूद्वहः ॥२११॥ ततो रामेण मुक्तः स शुको गत्वा दशाननम् । कपिसैन्यं दर्शयंस्त बोधयामास रावणम् ॥२१२॥ सीतां प्रयच्छ रामाय लङ्काराज्ये विभीषणम् । कृत्वा तं शरणं याहि नो चेद्रामान्न मोक्ष्यसे ॥२१३॥ तच्छ्रुत्वा रावणः क्रोधाच्छुकं धिक्कृत्य वै मुहुः । दूतैर्गेहाद्वहिः कृत्वा रामसेनां व्यलोकयत् ॥२१४॥ शुकोऽपि ब्राह्मणः पूर्वं वसिष्ठो मन्त्रवित्तमः अयजन् क्रतुभिर्देवान् विरोधो राक्षसैर्भूत् ॥२१५॥ वज्रदंष्ट्र इति ख्यातस्तदैको राक्षसो महान् मांसाद्य याचितं दृष्ट्वा मुनिना कुम्भजन्मना ॥२१६॥ शुकभार्यावपुर्धृत्वा नृमांसं समर्पयत् । तदा क्रुद्धः शुकस्तेन त्वं रक्षो भव मा चिरम् ॥२१७॥ रक्षःकृतं पुनर्ध्यात्वाज्ञात्वा तन्प्रार्थितोऽब्रवीत् । रामस्य दर्शनं कृत्वा बोधयित्वा दशाननम् ॥२१८॥ त्वं प्राप्स्यसि निजं रूपं तस्माज्जातः शुको द्विजः। सुवेलशिखरे संस्थः समऽय कपिसन्ततः ॥२१९॥ सूचनार्थं रिपुं रामोऽङ्गदं लङ्कामचोदयत् सोऽपि रामाज्ञया गन्त्वा नानानीत्युक्त्वैरस्तदा ॥२२०॥ रावणं बोधयामास सभायां लांगुलासने । संस्थितोऽभीतवद्वालितनयः स्वस्थमानसः ॥२२१ । शृणु रावण मद्वाक्यं हितं ते प्रवदाम्यहम् । सीतां सस्कृत्य सधनां प्रयच्छ राघव जवात् ॥२२२ । मयं नारायणं विद्धि विदेह्यं स्यञ्च भद्रवे । यत्पादपोतमाश्रित्य ज्ञानिनो भवसागरम् ॥२२३॥ तरन्ति भक्तिपूतास्ते दत्तो रामो न मानुषः । मद्वाक्यं कुरु राजेन्द्र कुलकौशलहेतवे ॥२२४॥
आ पहुंचे। वानरोम उत्तम असख्य वानर सुवेल पर्वतपर जा चढ़े ॥ २०६ ॥ २०७ ॥ उनके पीछे राम भी अपनी सेनाके साथ सहर्ष सुवेलागिरिपर गये। वहाँ जाकर राम लंकाको देखनेके लिए उसके एक सुन्दर शिखरपर चढ़े ॥ २०८ ॥ वह पर्वत बड़े मन हर वृक्षों तथा लताओंसे मंडित था । वहाँ रामने बड़ा विस्तृत, रंग बिरंगी ध्वजाओंसे व्याप्त, अनेक प्रकारके भवनोंसे सघन, स्वर्णके गड़ तथा तोरण युक्त खाई, बुग्गों तथा सोपानोंसे विराजित लंकाको देखा ॥ २०९ ॥ २१० ॥ वहींसे रामने एक प्रासाद ( महल ) के ऊपर विस्तीर्ण प्रदेशमें बैठकर कपिसेनाको देखते हुए दशकन्धर रावणको देखा ॥ २११ ॥ तदनन्तर रामने कैद किये हुए शुकको छुड़वा दिया उसने जाकर रावणको वानर सेना दिखायी और समझाया - ॥२१२। तुम सीता रामको दे दो, लङ्काका राज्य विभीषणको दे दो और रामकी शरणमें चल जाओ। नहीं तो राम तुमको जीवित नहीं छोड़ेंगे ॥ २१३ ॥ यह सुनकर क्रोधसे पागल रावणने शुकको बार-बार धिक्कारा और दूतोंसे बाहर निकलवाकर रामकी सेना देखने लगा ॥ २१४ ॥ शुक पहिले एक श्रेष्ठ ब्राह्मण था । उसने यज्ञ द्वारा देवताओंको प्रसन्न किया था इस कारण राक्षसों से उसका विरोध हो गया । २१५ । तदनन्तर एक दिन वज्रदंष्ट्र नामक राक्षसने अगस्त्य मुनिको शुकसे मामांस माँगते देखकर शुककी स्त्रीका रूप धरण करके मनुष्यका मांस पकाकर मुनिको परास दिया, तब मुनिने क्रुद्ध होकर शुकको शाप दे दिया कि जा, तू शीघ्र राक्षस हो जा । २१६ ॥ २१७ ॥ पुनः शुकके प्रार्थना करनेपर मुनिने ध्यान धरके देखा तो मालूम हुआ कि यह तो एक राक्षसका कृत्य है। तब मुनिने कहा-हे शुक ! तू रामका दर्शन करके और रावणको समझाकर फिरसे अपने स्वरूपको प्राप्त हो जायगा। इसी कारण अब वह शुक पुनः ब्राह्मण हो गया । इधर रामने सुवेल पर्वतके शिखरपर बैठकर बानरोंको आमन्त्रित किया और शत्रुको सूचना देनेके लिए अङ्गदको लंका भेजा। उसने जाकर रामकी आज्ञासे अनेक नीतिवाक्यों द्वारा रावणको समझाया । २१८- २२० ॥ सभामें अपनी पूँछका मोड़ा बनाकर उसपर बैठे हुए अंगदने निर्भय होकर स्वस्थ मनसे रावणको समझाते हुए कहा - ॥ २२१ ॥ हे रावण ! मैं तुमको हितका उपदेश देता हूँ, सुनो । मेरी सलाह मानो और धनसे सीताका सत्कार करके झटपट रामको दे आओ ॥ २२२ ॥ रामको साक्षात् नारायण समझो