भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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१०२ आनन्दरामायणे [ सर्गः १०

राघवश्चापि तं ज्ञात्वा तेन सख्यं चकार सः । हनुमतोदधेस्तीरे लंकां च सिकतोद्भवाम् ॥४१॥ कारयित्वा रघूत्थस्त्वं मित्रं निर्मायथाङ्गदम् । लंकायाश्चैव राज्यार्थे वानरैरभ्यषेचयत् ॥४२॥ तदा विभीषणं प्राह रामचन्द्रो विदस्य च । न्यासभूता त्वियं लंका तावत्कालं तवास्ति मे ॥४३॥ यावता रावणं हत्वा तव दास्याम्यहं शुभाम् । हनुमत्कालङ्केत्येवं नाम्ना लङ्का ख्यातिं गमिष्यति ॥४४॥ हनुमल्लङ्काब्धेश्चस्तारे वर्ततेऽद्यापि पार्वति । विभीषणोद्धाराणन्ते रामस्तां मोचयिष्यति ॥४५॥ एतस्मिन्नन्तरे तत्र गगनस्थः शुकोऽब्रवीत् । प्रेषितो रावणेनैव सुग्रीवं प्राह वेगतः ॥४६॥ त्वामाह रावणो राजा तव नास्त्यर्थविप्लवः । अह यद्यहरं भार्यां राजपुत्रस्य किं तव ॥४७॥ किष्किन्धां याहि हरिभिस्त्वं वैरं कुरु मा मया । तं धृत्वा वानराः शीघ्रं बबन्धुर्लाङ्गलबन्धनैः ॥४८॥ शार्दूलश्चापि सेनां तां दृष्ट्वाऽथभयमाययौ । तच्छ्रुत्वा रावणश्चापि दीर्घचिन्तापरोऽभवत् ॥४९॥ रामः समन्त्रयामास तद्वैकान्ते स्थितः क्षणम् । विभीषणेन सुग्रीवमरुतिभ्यां समन्वितः ॥५०॥ तीत्वार्थं जलधेर्गुल्मं संस्थितो धन्वना पुरः । सर्वथा वचनं श्रोतुं राघवस्याथ सागरः ॥५१॥ मेघवद्गर्जनं कुर्वन् वामहस्तेन धिक्कृतः । अद्यापि सागरस्त्वत्र तूष्णीमेव न विद्यते ॥५२॥ अतः संमन्त्र्य रामस्तु तदा सागररोधसि । प्रायोपवेशनं चक्रे दर्भानास्तीर्य वेगतः ॥५३॥ दिनद्वयमतिक्रम्य तृतीयदिवसे तदा । उत्थाय दर्भशयनात्पुनर्लक्ष्मणमब्रवीत् ॥५४॥ पश्य लक्ष्मण दुष्टोऽसौ वारिधिर्मामुपागतम् । नाभिन्दति दुष्टात्मा दर्शनार्थं ममानघ ॥५५॥ जानाति मानुषोऽयं मां किं करिष्यन्ति वानराः । अद्य पश्य महाबाहो शोषयिष्यामि वारिधिम् ॥५६॥ पद्मयामेवाद्य गच्छन्तु वानरा विगतज्वराः । इत्युक्त्वा चापमाकृष्य संदधे बाणमुत्तमम् ॥५७॥

है । उठ, यहाँसे निकल जा ॥ ३६ ॥ रावणके इस प्रकार धिक्कारनेपर विभीषण अपने चार मन्त्रियोंको साथ लेकर श्रीरामके समीप चला गया ॥ ४० ॥ रामने परिचय पूछकर उसके साथ मित्रता कर ली । तदनन्तर रामने हनुमत् समुद्रके किनारे रेतीकी लंका बनवाकर उसम अपने मित्र विभीषणका लंकाके राज्यके पदपर वानरो द्वारा अभिषेक करवा दिया ॥ ४१ ॥ ४२ ॥ तब रामने हंसकर विभीषणसे कहा—मित्र ! यह लंका तुम्हारे पास तबतक धरोहररूपमे रहेगा । ४३ ॥ जबतक मै रावणको मारकर तुम्हे लंका न दे दूँ, यह लंका हनुमालङ्का नामसे प्रसिद्ध होगी ॥ ४४ ॥ हे पार्वती ! वह हनुमालङ्का लंका अभी भी समुद्रके किनारे विद्यमान है । रावणका अन्त हो जानेपर राम उस विभीषणसे छुड़ा लेंगे ॥ ४५ ॥ तदनन्तर आकाश- मे स्थित शुक बोला—हे सुग्रीव ! मुझे बड़ा संभ्रान्त से रावणने तुम्हारे पास भेजा है ॥ ४६ ॥ राजा रावणने कहा है कि हमन तुम्हारा कोई हानि नहीं की है । यदि मै राजपुत्र रामकी स्त्रीका हरण कर लाया तो इससे तुम्हारी क्या हानि हुई ॥ ४७ ॥ उसने कहा है कि तुम हमारे साथ शत्रुता न करके बंदरोंको लेकर किष्किन्धा लौट जाओ । इतना कहना था कि वानरोंने इस राक्षसको पकड़कर लंगोटीकी जडमें जकड़ दिया ॥ ४८ ॥ उसके साथ गुप्तसूपसे आया हुआ दूसरा शार्दूल नामका राक्षस उस विशाल सेनाको देखकर रावणके पास गया और वानरी सेनाका पराक्रम कह सुनाया । सो सुनकर रावण बड़ी भारी चिन्ता- में पड़ गया । ४९ । इधर रामचन्द्रजी भी एकान्तम जाकर विभीषण, सुग्रीव तथा हनुमान्के साथ मंत्रणा करने लगे ॥ ५० ॥ तदनन्तर वे समुद्रके जन्म कुछ दूर जाकर सबका बात सुननेके लिये खड़े हो गये । बादमें रामने मेघकी तरह गर्जन करके बायें हाथसे सागरको धिक्कारा और कहा कि तू अभी तक चुप ही है ॥ ५१ ॥ ५२ ॥ मंत्रणा पूर्ण करके राम सागरके किनारेपर आये और कुशा बिछाकर अनशन करने लगे ॥ ५३ ॥ दो दिन बिताकर तीसरे दिन कुशासनसे उठ खड़े हुए और लक्ष्मणसे कहा— । ५४ ॥ हे अनघ लक्ष्मण ! देखो, यह दुष्टात्मा वारिधि मुझे यहाँ आया जानकर भी मुझसे मिलने या मेरा दर्शन करने नहीं आया ॥ ५५ ॥ यह समझता है कि यह मनुष्यमात्र है । यह मेरा क्या कर लेगा और ये वानर भी क्या कर लेंगे । हे महा- बाहो ! देखो, मैं आज इसको सुखा लूंगा ॥ ५६ ॥ तब वानर बिना किसी कठिनाईके पाँवसे चलकर उस पार