श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 119, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः १०] सारकाण्डम् १०३
तदा चचाल वसुधा दिशश्च तमसावृताः । चुक्षुभे सागरो वेलां भयाद्योजनपञ्चकम् ॥५८॥
तिमिप्रभृतयो भीताः प्रतप्ताः परितस्त्रसुः । एतस्मिन्नन्तरे साक्षान्सागरो दिव्यरूपधृक् ॥५९॥
शङ्खपाद्येन रामं समर्च्य प्रपणाम सः । अथ तुष्टाव दीनात्मा प्रार्थयामास राघवम् ॥६०॥
अभयं देहि मे राम स्वकामा मार्गं ददामि ते । इति तद्वचनं श्रुत्वा राघवः प्राह सागरम् ॥६१॥
अमोघोऽयं महाबाणः कस्मिन्देशे निपात्यताम्। लक्ष्यं दर्शय मे शीघ्रं बाणस्यास्य पयोनिधे ॥६२॥
सागर उवाच
रामोत्तरप्रदेशोऽस्ति द्रुमकुल्य इति श्रुतः । प्रदेशस्तत्र बहवः पापान्मानो दिवानिशम् ॥६३॥
बाधन्ते मां रघूश्रेष्ठ तत्र ते पात्यतां शरः । रामेण मुक्तो बाणोऽसौ क्षणादाभीरमण्डलम् ॥६४॥
हत्वा पुनः समागम्य तूणीरे पूर्ववत्स्थितः । ततोऽब्रवीद्रघुश्रेष्ठं सागरो विनयान्वितः ॥६५॥
मयि सेतुं कारयस्व नलेनोपलनिर्मितम् । विश्वकर्मसुतश्चायं वरो लब्धोऽस्त्यनेन हि ॥६६॥
द्विजस्य जाह्नवीतोये शालिग्रामस्त्वनेन हि । त्यक्तस्तदा तेन शप्तः पषाणादि तरिष्यति ॥६७॥
त्वद्धस्तादिति शापोऽयं वरश्चात्र समून्तः । इत्युक्त्वा राघवं नत्वा ययौ विधुरदृश्यताम् ॥६८॥
नलमाज्ञापयामास सेत्वर्थं रघुनन्दनः । सेतुप्रथमकल्पेतु विघ्नेशं स्थाप्य राघवः ॥६९॥
नवग्रहाणां पूजार्थं पाषाणांश्च सादरम् । नलहस्तेन संस्थाप्य पूजं तत्र महोदधौ ॥७०॥
ततः सागरसंयोगे स्वनाम्ना लिङ्गमनुत्तमम् । स्थापयिष्याति निश्चित्य मारुतिं वाक्यमब्रवीत् ॥७१॥
काशीं गत्वा शिवलिङ्गमानयेहमनुत्तमम् । मुहूर्तमध्ये नोचेन्मे मुहूर्ता त्क्रमो भवेत् ॥७२॥
तद्रामवचनं श्रुत्वा तथेत्युक्त्वा स मारुतिः । ययावाकाशमार्गेण क्षणाद्वाणमयीं मम ॥७३॥
जा सकूँगा। इतना कहकर रामने धनुषपर बाण चढ़ाकर डोरी खींची ॥५७॥ उस समय पृथिवी कांप उठी, सब दिशाओंमें अंधेरा छा गया, समुद्र भयसे क्षुब्ध होकर अपने किनारंसे चार कोस आगे बढ़ गया ॥५८॥ मीन, तिमि तथा अन्य नामकी मछलिये और मगरमच्छ आदि जलजन्तु सन्तप्त तथा व्याकुल हो गये। तब समुद्र दिव्य रूप धारण करके प्रकट और रामको रत्नोंकी भेट दे तथा नमस्कार करके दीनभावसे प्रार्थनापूर्वक कहने लगा- ॥ ५९ । ६० । हे राम ! कृपा करके आप मुझे अभयदान दे । मैं आपको लङ्का जानेका रास्ता अभी देता हूँ। उसके वचनको सुनकर रामने कहा- ॥ ६१ ॥ हे पयोनिधे ! यह मेरा महाबाण अमोघ है, टाले नहीं जा सकता। बतलाओ इसे कहाँपर गिराऊँ। इस बाणका कोई लक्ष्य बताओ ॥ ६२ ॥ सागरने कहा हे राम ! उत्तर दिशामें द्रुमकुल्य नामका देश है। वहाँ बहुतपर पापी आभीर रहते हैं। वे मुझको रात-दिन सताते हैं। हे रघूश्रेष्ठ ! आप इस बाणको वहीं ही गिराइए। तदनन्तर रामने बाण छोड़ा तो उसने जाकर क्षणभरम समस्त आभीरमण्डलको मार डाला और पुनः वापस लौटकर रामके तरकसमें पूर्ववत स्थित हो गया। बादम सागरने विनयपूर्वक रघुश्रेष्ठ रामजीस कहा-॥ ६३-६५॥ हे राघव ! आप मेरे ऊपर नलके द्वारा पत्थरोका पुल बँधवाएं । नल विश्वकर्माका पुत्र है। उसने जलपर पत्थर तैरानेका वर प्राप्त किया है ॥ ६६ ॥ एक बार इसने एक ब्राह्मणका पूज्य शालिग्राम उठाकर गङ्गाजीके जलम्ये फेंक दिया था। तब उसने शाप दिया कि जा, तेरा डाला पत्थर भी पानीमे तैरेगा । ६७ ॥ यह शाप भी वर माना जायगा। इतना कह तथा रामको नमस्कार करक समुद्र अदृश्य हो गया ॥ ६८ ॥ तदनन्तर रघुनन्दन रामने नलको पुल बाँधनेकी आज्ञा दी। सेतु बाँधत समय पहिले गणेशजीकी स्थापना की गयी ॥ ६९ ॥ पश्चात् नवग्रहांकी पूजाके लिए नलके हाथसे सादर नौ पाषाणोंकी समुद्रमे स्थापना करवाई गयी ॥ ७० ॥ इसके बाद 'अपने नाम-से मैं सागरके सङ्गमपर उत्तम शिवलिङ्ग स्थापित करूँगा' ऐसा निश्चय करके रामने मारुतिसे कहा-॥ ७१ ॥ हे हनुमन् ! तुम काशी जाकर शिवजीसे एक उत्तम लिङ्ग मुहूर्तमात्रमें माँग ले आओ। नहीं तो मेरा यह शुभ मुहूर्त टल जायगा ॥ ७२ ॥ रामकी आज्ञा सुनकर हनुमान्ने 'तथास्तु' कहा और क्षणभरमें उड़कर