श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 117, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः १०] सारकाण्डम् १०१
कृतः सेनानिवेशश्च राघवेणार्धिमद्भुते । चक्रुर्मन्त्रं सागरस्य तरणार्थं प्लवङ्गमाः ॥२५॥ लङ्कायां वायुपुत्रेण कृतं दृष्ट्वा स रावणः । प्रहस्तादींस्तदा प्राह कथमग्रे भविष्यति ॥२६॥ एकेन कपिनाऽस्माकं पुरतो ज्वलिता पुरी । दृष्टा सीता वनं भग्नं राक्षसा निहता रणे ॥२७॥ ममातिलालितः पुत्रः कनीयानभितो रणे । तदा ते मन्त्रिणः सर्वे दुर्धर्षं दशाननम् ॥२८॥ राजन्नुपेक्षितोऽस्माभिर्मर्कटोऽयमिति स्फुटम् । वयं तवाज्ञया कुर्मो जगत् कृत्स्नमवानरम् ॥२९॥ कुम्भकर्णस्तदा प्राह रावणं राक्षसेश्वरम् । त्वया योग्यं कृतं नैतद्यद्धृता जानकी हृता ॥३०॥ यद्यप्यनुचितं कर्म त्वया कृतमजानता । सर्वं समं करिष्यामि स्वस्थचित्तो भव प्रभो ॥३१॥ देहि देव ममानुज्ञां हत्वा रामं सलक्ष्मणम् सुग्रीवं वानरांश्चैवागमिष्यामि पुनः क्षणात् ॥३२॥ कुम्भकर्णवचः श्रुत्वा तदा प्राह विभीषणः । महाभागवतः श्रीमान् रामभक्त्यैकतत्परः ॥३३॥ विलोक्य कुम्भश्रवणादिदैत्यान्मत्तप्रमत्तानविशेषयेन । विलोक्य कामानुगमप्रमत्तं दशाननं प्राह विशुद्धबुद्धिः ॥३४॥ न कुम्भकर्णेन्द्रजितौ च राजंस्तथा महापार्श्वमहोदरौ तौ । निकुम्भकुम्भौ च तथाऽतिकायः स्थातुं न शक्ता युधि राघवाग्रे ॥३५॥ सीतां च संकृत्य महाधनेन दत्त्वाऽभिरामाय सुखी भव त्वम् । नोचेन्न रामेण विमोक्ष्यसे त्वं गुप्तः सुरेन्द्रैरपि शङ्करेण ॥३६॥ एवं शुभं रावणः स विभीषणवचो हितम् । आत्मनः प्रतिजग्राह नैवाग्रे मौढ्यकारणात् ॥३७॥ कालेन नोदितो दैत्यो विभीषणमथाब्रवीत् । बन्धुरूपेण शत्रुस्त्वं जातो नास्त्यत्र संशयः ॥३८॥ योऽन्यस्त्वेवंविधं ब्रूयाद्वाक्यं हन्मि तदैव तम् । उत्तिष्ठ गच्छ दुर्बुद्धे धिक् त्वां राक्षसकुलाधम । ३९॥ रावणेनैवमुक्तः स रुष्टेष विभीषणः । चतुर्भिर्मन्त्रिभिर्युक्तो ययौ श्रीराघवान्तिकम् । ४०॥
अग्रसर होते हुए क्रमशः दक्षिण समुद्रपर जा पहुँचे ॥ २४ ॥ रामने उस वानरी सेनाको समुद्रके किनारे स्थान ठहरा दिया और सब वानर मिलकर समुद्रके पार करनेकी समस्यापर विचार करने लगे ॥ २५ ॥ उधर लङ्कामें वायुपुत्र हनुमानके कृत्यको देखकर रावणने प्रहस्तादि मन्त्रियोंको बुलाकर पूछा कि अब आगे क्या होगा ? ॥ २६ ॥ एक ही वानरने हमारी सम्पूर्ण लंका नगरी जला दी। उसने सीताको देख लिया, वनको उजाड़ा और राक्षसोंको मार डाला । २७ ॥ मेरा अतिशय प्रिय छोटे पुत्रको भी रणमें उसने समाप्त कर दिया । तब सब मन्त्री दशाननको घेर दिलासा देते हुए कहने लगे ॥ २८ ॥ हे राजन् ! यह तो हम लोगोंने वानर समझकर उसकी उपेक्षा कर दी थी । अब यदि आप आज्ञा दें तो हम समस्त संसारको वानरशून्य कर दें ॥ २९ ॥
कुम्भकर्णने राक्षसेश्वर रावणसे कहा—आपने यह उचित नहीं किया, जो जाकर जानकीको उठा लाये ॥ ३० । यद्यपि आपने अनजानमें यह अनुचित काम किया है। तथापि मैं सब कुछ ठीक कर दूँगा। हे प्रभो ! आप निश्चिन्त रहें । ३१ । आप मुझको आज्ञा दें तो लक्ष्मणसहित राम, सुग्रीव और सब वानरोंको मारकर क्षणभरमें लौट आऊँ ॥ ३२ ।
कुम्भकर्णकी बात सुनकर भगवद्भक्तोंमें श्रेष्ठ तथा भगवान् रामकी भक्तिमें लीन विभीषणने प्रमत्त कुम्भकर्ण आदि दैत्योंकी ओर दृष्टि डालते हुए कामानुर दशाननसे विचारपूर्वक कहा—॥ ३३ ॥ ३४ ॥ हे राजन् ! कुम्भकर्ण, महापार्श्व, महोदर, निकुम्भ, कुम्भ और अतिकाय भी युद्धमें रामके सामने नहीं ठहर सकते । ३५ । इसलिए आप रामका प्रचुर धनसे सत्कार करें और उन्हें सीता समर्पण करके सुखसे रहें। नहीं तो सुरेन्द्र तथा शंकरका शरणमें जानेपर भी आपको ये जीवित नहीं छोड़ेंगे ॥ ३६ ॥
इस प्रकार शुभ तथा हितकर विभीषणके वाक्यको भी रावणने अपने प्रतिकूल ही समझा ॥ ३७ ॥ कालके प्रेरित दैत्य रावणने विभीषणसे कहा—निःसन्देह तू बन्धुरूपमें मेरा शत्रु है ॥ ३८ ॥ यदि और कोई मुझसे ऐसा कहता तो मैं उसको उसी समय मार डालता । ओ दुर्बुद्धे ! अरे राक्षसाधम ! तुझे धिक्कार