भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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१००आनन्दरामायणे[ सर्गः १०

नियुत्यर्बुदसंख्याना गजाश्चाश्वस्तथैव च । रक्षन्ति सदा लङ्कां नानामुखशराः प्रजाः ॥७॥ प्रकारैर्विविधैर्लङ्का शतघ्नीभिश्च संयुता । एवं स्थितायां देवेश शृणु त्वद्दासचेष्टितम् ॥८॥ दशाननबलांशस्य चतुर्थांशो मया हतः । दग्ध्वा लङ्कापुरीं स्वर्णप्राकारं धर्षितं मया ॥९॥ शतघ्न्यः संक्रमाश्चैव नाशिता मे रघूद्वह । देव त्वद्दर्शनादेव लङ्का भस्मीभवेत्पुनः ॥१०॥ सुवेलाद्रिश्चोत्तरेऽस्ति पतंगश्चाऽस्ति पश्चिमे । निकुम्भिला दक्षिणेऽस्ति तत्रास्ते योगिनीवटः ॥११॥ पूर्वे च लघुलङ्काऽस्ति सा मध्ये चातिशोभिता । त्रिकूटाद्रेश्चरे रम्ये मन्पुच्छानलधर्षिता ॥१२॥ प्रस्थानं कुरु देवेश गच्छामो लवणार्णवम् । तन्मारुतेर्वचः श्रुत्वा सुग्रीवं प्राह राघवः ॥१३॥ मृगांश्चमनिकान् सर्वान्प्रस्थानायाभिनोद्य । इदानीमेव विजयो मुहूर्त्तश्चाद्य वर्तते ॥१४॥ आश्विनी शुक्लदशमी श्रवणर्क्षसमन्विता । शुभाऽद्य वानरश्रेष्ठ गच्छामो लवणार्णवम् ॥१५॥ रक्षन्तु यूथपाः सेनामग्रे पृष्ठे च पार्श्वयोः । नलो भवेत्तथाऽग्रतः पृष्ठे नीलोऽथ रक्षतु ॥१६॥ सुषेणः सव्यपार्श्वे मे जांबवांस्तरे मम । गजो गवाक्षो गवयो मैदश्चैतेऽथ वानराः ॥१७॥ वह्निनेऋतिवायव्य ईशानदिक्षु समन्ततः । रक्षन्तु वानरीं सेनां द्विविदाद्यास्तथाऽपरे ॥१८॥ मदग्रे गच्छन्तु मवैत्र सेनायाः कुलघातिनः । आरुह्य मारुतिं चान्यद् गच्छत्यग्रतोऽङ्गदं सतः ॥१९॥ आरुह्य लक्ष्मणो यातु सुग्रीव त्वं मया सह । आगच्छध्वमिति चाज्ञाप्य ह्यांगदामः सलक्ष्मणः ॥२०॥ प्रतस्थे दक्षिणाशायां सेनामध्यगतो विभुः । तदा ते कपयश्चक्रुर्भुङ्कारान् भयानकान् ॥२१॥ वाद्यामासुर्वाद्यानि पञ्चवानकगोमुखैः । वारणेंद्रनिभाः सर्वे वानराः कामरूपिणः ॥२२॥ गतस्तदा दिवारात्रं क्वचित्सस्थुर्न ते क्षणम् । अभवञ्छुभशकुना लङ्कां गच्छतो राघवस्य हि ॥२३॥ ते सर्वं समतिक्रम्य मलयं च तथा गिरिम् । आययुश्चानुपूूर्व्येण ते सर्वे दक्षिणार्णवम् ॥२४॥

भागों पर पहरा कर रहे हैं ॥७॥ उसमें विविध सुरंगें लगी हैं और उसके गङ्गपर अनेक तोपें भी रखी हुई हैं । हे देवेश ! इस दशा में भी आपके इस दास ने वहाँ जाकर जो कुछ किया, सो सुनाइये॥७॥८॥ मैंने वहाँ जाकर रावणकी चौथाई सेना मार डाली है। लङ्कापुरीको जलाकर स्वर्णप्राकार गिरा दिया है ॥९॥ हे रघूद्वह मैंने तोप सदा संक्रम तोड डाली है। हे देव ! अब आपके नाममात्रसे ही लङ्का पुनः भस्म हो जायगी ॥१०॥ उस लङ्काके उत्तर सुवेलाद्रि है। पश्चिम पतंग है। दक्षिण निकुम्भिला है। जहाँपर योगिनीवट विद्यमान है। ११॥ पूर्वकी ओर लघु लंका है, जिसका मध्यभाग बड़ा ही रमणीक है। उस त्रिकूटके शिखरपर बसी हुई लङ्काको मैंने अपनी पूँछके आगसे जला दिया है ॥१२॥ हे देवेश ! अब आगे प्रस्थान करें, इस लाम क्षार समुद्रकी ओर चलें। मारुतिको बात सुनकर रामन सुग्रीवसे कहा-॥१३॥ हे सुग्रीव समस्त योनिकोको प्रस्थान करनेके लिए आज्ञा दे दो । आज इसी समय विजयप्राप्तिका शुभ मुहूर्त है ॥१४॥ आज श्रवणनक्षत्रसे युक्त आश्विन शुक्ल दशमीकी शुभ तिथि है। हे वानरश्रेष्ठ ! हमलोग आज लवणसागरकी ओर अवश्य प्रस्थान करें ॥१५॥ बड़े बड़े यूथपति वानर सेनाकी आगे पीछे और वागल रक्षा करें। आगे नल तथा पीछे नील रक्षा करे ॥१६॥ सुषेण मेरा बाई ओर तथा जाम्बवान् मेरी दहिनी बगलमें रहे। गज गवाक्ष, गवय और मैंद ये सब वानर अग्निकोण, नैऋत्यकोण वायव्यकोण तथा ईशानकोणमे रहकर वानरी सेनाकी चौतरफा रक्षा करें । शत्रुओंका मारमेमें निपुण द्विविद आदि वानर भी सेनाको सब ओरसे घेरकर चलें। मारुतिके कन्धेपर सवार होकर मैं आगे चलता हूँ और मेरे पीछे अंगदके कन्धेपर सवार होकर लक्ष्मण चलें। हे सुग्रीव ! तुम भी मेरे साथ चलो। इसी प्रकार अन्य सब वानरोंको 'चलो' ऐसी आज्ञा देकर लक्ष्मण सहित राम सेनाके बीच होकर दक्षिण दिशाकी ओर चल दिये। उस समय वे वानर भयानक भूङ्कार करने लगे ॥१३-२१॥ वे ढोल, मृदंग तथा गौके मुख सदृश बाजे बजाने लगे । कामरूप धारण करनेवाले तथा श्रेष्ठ हाथियोंके समान वीर सब वानर क्षणभर भी विश्राम न करके चलने लगे। लंकाके लिए प्रस्थित रामको अच्छे-अच्छे शकुन दीख पड़े ॥२२॥२३॥ वे मलयपर्वत तथा