श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 115, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें| सर्गः १० ] | सारकाण्डम् | ९९ |
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तेनैव किं पुनरसौ परिष्वङ्गतो रामेण वायुतनयः कृतपुण्यपुञ्जः ।३११॥
रामे स मारुतिः प्राह भीतभीतोऽतिकम्पितः मयाऽपराधितमिति मुद्रावृत्तं मुनेर्वचः ॥३१२॥
तच्छ्रुत्वा रामचन्द्रोऽपि विहस्योवाच मारुतिम् । मयैव दर्शितं मार्गे कौतुकं मुनिरूपिणा ॥३१३॥
त्वद्गर्वपरिहारार्थं मुद्रिकां मन्करे स्थिताम् । कनिष्ठिकायां त्वं पश्य समानीतां त्वयाद्य वै ॥३१४॥
तां राममुद्रिकां दृष्ट्वा श्रीरामस्य करांगुलौ । ननाम गतवर्गः स रामं विष्णुममन्यत ॥३१५॥
मय्यप्यस्यैव कृपया पौरुषं चेत्यमन्यत । एवं गिरीन्द्रजे प्रोक्तं चरित्रं सुंदरमभिधम् ॥३१६॥
रामार्थं वायुपुत्रेण कृतं सर्वार्थदायकम् ॥३१७॥
इति श्रीमच्छतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये सारकाण्डे
सुन्दरचरित्रे सीताशुद्धिर्नाम नवमः सर्गः ॥ ९ ॥
दशमः सर्गः
( राम-रावणसेनाका संघर्ष )
श्रीशिव उवाच
अथाह मारुतिं रामो मां वदस्व सविस्तरम् । लंकास्वरूपं ज्ञात्वा च प्रतीकारं करोम्यहम् ॥ १ ॥
तद्रामवचनं श्रुत्वा कथयामास मारुतिः । लंका दिव्यपुरी देव त्रिकूटशिखरे स्थिता ॥ २ ॥
स्वर्णप्राकारसंविना स्वर्णाट्टालकमण्डना । परिखाभिः परिवृता पूर्णानिर्मलोदकैः ॥ ३ ॥
नानोपवनशोभाढ्या दिव्यवापीभिरावृता । गृहैर्विचित्रशोभाढ्यैर्मणिस्तंभमयैः शुभैः ॥ ४ ॥
पश्चिमद्वारमापाद्य गजारूढाः सहस्रशः । उत्तरद्वारे तिष्ठन्ति वाजिवाहाः सपत्तयः ॥ ५ ॥
दशकोटिमिता सेना विविधाद्युधमण्डिता । लंकायाः परितो व्याप्ता सत्तर्का रक्षते पुरीम् । ६ ॥
करके मनुष्यमात्र विष्णुके अनुपम पदको प्राप्त करता है। उन्हीं साक्षात् रामके द्वारा आलिङ्गित होकर वायुपुत्र हनुमान् यदि महान् पुण्यशाली बन जायें तो इसमें आश्चर्य ही क्या है ॥ ३११ ॥ तदनन्तर डरके मारे कांपते हुए मारुतिने रामसे अपना गर्वरूपी अपराध, मुद्रिकाका वृत्तान्त तथा मुनिका वचन कह सुनाया ॥ ३१२ । यह सुना तो रामचन्द्रने हंसकर कहा कि यह कौतुक मैने ही मार्गमें मुनिरूप वारण करके दिखलाया था ॥ ३१३ ॥ यह काम मैने तुम्हारे गर्वको छुड़ानेके लिये ही किया था। यह देखो, जिस मुद्रिकाको तुम ले आये थे, वह तो मेरे हाथकी कनिष्ठिका अंगुलीमें विद्यमान है ॥ ३१४ । रामके हाथमें रामकी अगूठो देखो तो गर्व छोड़कर हनुमान्ने नमस्कार किया और उन्हें साक्षात् विष्णु माना ॥ ३१५ ॥ और यह भी माना कि इन्हींकी कृपासे मुझमें भी पौरुष आ गया है। हे गिरीन्द्रजे ! रामके लिये वायुपुत्रके द्वारा किया हुआ सर्वार्थसाधक सुन्दर चरित्र मैने तुमको इस प्रकार कह सुनाया ॥ ३१६ ॥ ३१७॥ इति शतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये सारकाण्डे भाषाटीकायां सुन्दरचरित्रं सीताशुद्धिर्नाम नवम सर्गः ॥ ९ ॥
शिवजी बोले—हे पार्वती ! रामने मारुतिसे कहा—तुम हमको विस्तारसे लंकाका स्वरूप बताओ। लङ्काका स्वरूप जानकर मैं प्रतीकारका उपाय सोचूँगा ॥ १ ॥ रामकी बात सुनकर मारुतिने कहा—हे देव ! त्रिकूट पर्वतके शिखरपर बद्ध लङ्का नामकी दिव्य पुरी बसी हुई है ॥ २ ॥ उसके चारों ओर सोनेका गढ़ है तथा वह सोनेके अटारियोंवाले भवनोंसे सुशोभित है। निर्मल जलसे परिपूर्ण खाईसे वह नगरी घिरी हुई है ॥ ३ ॥ अनेकानेक उपवनोंसे सुन्दर, दिव्य बावलियोंसे आवृत तथा चित्र विचित्र शोभावाले मणियोंके खम्भोंवाले सुन्दर महलोंसे सजी हुई है ॥ ४ ॥ उसके पश्चिमी द्वारपर हजारों गजारूढ़ तथा अश्वारूढ सिपाही खड़े रहते हैं ॥ ५ ॥ दस करोड़ पैदल तथा सवार सैनिक विविध शस्त्रास्त्रोंसे सुसज्जित होकर लङ्काका