भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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९८ आनन्दरामायणे [ सर्गः ९

कमण्डलौर्जलिभिश्चाऽथ मुद्रिका मुहुः। बहिः क्षिपन्मारुतिर्न नांतं तासां ददर्श सः ॥२९५॥
पुनः कमण्डलीं कृत्वा मुनिं नत्वा कपिः क्षणम् । चिंतयामास मनसि मादृशैः शतशः पुरा ॥२९६॥
समानीतास्ति सीतायाः शुद्धिः का गणनाऽद्य मे। इति निश्चित्य मनसि गतगर्वस्तदा कपिः ॥२९७॥
पुनर्दक्षिणमार्गेण ययौ यत्रांगदादयः । प्रायोपवेशनस्थास्ते तं दृष्ट्वा तुष्टमानसाः ॥२९८॥
बभूवुर्वानराः सर्वे समालिंग्याथ तं मुहुः । ज्ञात्वा तन्मुखतः सीता दृष्टाऽशोकवने त्विति ॥२९९॥
ययुस्ते राघव भ्रातृ मार्गे सुग्रीवपालितम् । दृष्ट्वा मधुवनं सर्वे दृष्ट्वा तं वालिनंदनम् ॥३००।
फलानि भक्षयामासुर्दधिषक्त्रो न्यषेधयत् । तनस्ते ताडयामासुर्दधिषक्त्र कपीश्वरम् ॥३०१।
ज्ञात्वा तं मातुलंमपि सुग्रीवस्यांगदादयः । स गत्वा सकलं वृत्त सुग्रीवाय न्यवेदयत् ॥३०२।
सोऽपि श्रुत्वा जनकजा दृष्टा तैरित्यमन्यत । नोचेन्मधुवनं रम्य कथमश्नन्ति वानराः ॥३०३।
ततो विसर्जयामास दधिषक्त्रं कपीश्वरः मानिषेधस्त्वया कार्यश्चं द्राद्य प्रेषयस्व तान् ॥३०४॥
ममांतकं ततो गत्वा दधिषक्त्रस्तथाऽकरोत् । ततः सुग्रीववचनं श्रुत्वा तेन समीरितम् । ३०५।
युयुस्ते वानराः सर्वे गम वन्ता पुरःस्थिताः । ततो हर्षान्मार्ह्रुतः म ब्रह्मपत्र न्यवेदयत् ।३०६॥
दत्त्वा चूडामणिं राम काकवृत्तं न्यवेदयत् , सन्छ्रुत्वा सकल वृत्त ज्ञात्वा मारुतिना कृतम् ॥३०७॥
लङ्कायां वायुपुत्रेण रामस्तुष्टो बभूव सः समालिंग्य हनूमंतं राघवो वाक्यमब्रवीत् ॥३०८॥
त्ववोपकारिणश्चाऽहं न पश्याम्यद्य मारुते । कर्तुं प्रत्युपकारं ते धन्योऽसि जगतीतले ॥३०९॥
परिरंभो हि मे लोके दुर्लभः परमात्मनः । अतस्त्वं मम भक्तोऽसि प्रियोऽसि हरिपुत्रक ॥३१०॥
यत्पादपद्मयुगलं तुलसीदलाद्यैः संपूज्य विष्णो पदवीमतुलां प्रयांति ।

गिन लो ॥ २९३ ॥ २९४ ॥ अब हनुमान् कमण्डलुमे अञ्जली भर-भरकर बारम्बार अँगूठियें बाहर निकालने लगे । पर कहीं उनको अन्त नहीं हुआ ॥ २९५ ॥ तब फिरसे उन्हें कमण्डलमें भर दिया और मुनिको नमस्कार करके क्षणभरके लिए वे मनमें विचार करने लगे कि आह ! पहिले मेरे जैसे सैकड़ों हनुमान् जाकर सीताकी खबर ले आये हैं तो मेरी कौन-सा गिनती है यह निश्चय करके वीर मारुति घमण्डको त्याग-कर दक्षिणमार्गमें जहाँ अङ्गदादि वानर बैठे थे, वहाँ गये। उपवासावस्थामें बैठे हुए वे सब वानर हनुमान्‌को देखकर बहुत प्रसन्न हुए ॥ २९६-२९८ ॥ वे सब उभय बारम्बार हृदयसे लगाने लगे और उनके मुखसे यह सुनकर कि मैं सीताको अशोकवाटिका में देख आया हूँ ॥ २९९ । तब सबक सब तुरन्त रामका ओर चल पड़े, रास्ते में उन्हें सुग्रीवका सुरक्षित मधुवन दिखाई दिया। तब सब वानर बालिक पुत्र अङ्गदसे पूछकर । ३०१ ॥ उस वनके फल खाने लगे। जब उसके रक्षक दधिमुखने रोका तो वे उसको मारने लगे। ३०० ॥ यह जानकर भी कि यह सुग्रीवका मामा है तथापि उसे पीटकर ही छोड़ा तदनन्तर दधिमुखने जाकर सब हाल सुग्रीवको कह सुनाया। यह सुनकर सुग्रीवने समझ लिया कि उन्होंने जनकतनयाका पता पा लिया है नहीं तो वे लोग मधुवनके फल तोड़कर खाते ॥ ३०२ ॥ ३०३ ॥ पश्चात् कपीश्वर सुग्रीवने दधिमुखको समझाकर भेजा और कहा कि उन्हें रोका मत, यहाँ भेज दो ॥ ३०४ ॥ सुग्रीवकी बात मानकर उसने वैसा ही किया। पश्चात् वे सब वानर दधिमुखसे सुग्रीवका आदेश सुनकर ॥ ३०५ ॥ रामके पास गये तथा हर्षित होकर उनके सम्मुख खड़े हो गये, तब हनुमान्ने सहर्ष ब्रह्माका दिया हुआ पत्र रामको अर्पण किया और चूडामणि देकर काकका वृत्तान्त कह सुनाया। सो सुनकर राम श्रीराम हनुमान्‌का किया हुआ सब कार्य जानकर ॥ ३०६ । ३०७ । ब्रह्माके पत्रसे राम अतिशय सन्तुष्ट हुए तदनन्तर राम हनुमान् को हृदयसे लगाके बोले- ॥ ३०८ ॥ हे मारुते तुमने मेरा बड़ा उपकार किया है इस उपकारका प्रत्युपकार करनेके लिये मुझे कुछ नहीं सूझता । सचमुच तुम संसारमें धन्य हो ॥ ३०९ ॥ इस संसारमें साक्षात् परमात्माका मेरा परिरम्भ ( आलिङ्गन ) दुर्लभ है, वह तुमको प्राप्त हो गया। इस कारण हे हरि-पुत्रक ! तुम प्रिय भक्त हो । ३१० ॥ जिन विष्णुके दोनों चरणकमलोंका तुलसीपत्र तथा जल आदिसे पूजन