भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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सर्गः ९] सारकाण्डम् ९५


व्यथितः स निरुत्साहो गृहीतो घोरकर्मणा । परामापदमापन्नो मनसाऽचिन्तयद्धरिम् ॥ २४७ ॥
एकाग्रो निगृहीतात्मा विशुद्धेनान्तरात्मना । प्रगृह्य पुष्कराग्रेण कांचनं कमलोत्तमम् ॥ २४८ ॥
नैवेद्यं मनसा ध्यात्वा पूजयित्वा जनार्दनम् । आपद्मोक्षमभिप्रेप्सुन्प्रास्तौषीत् स्तोत्रमुदारधीः ॥ २४९ ॥
तत्कृतेन स्तवेनैव सुप्रीतः परमेश्वरः । आरुह्य गरुडं विष्णुर्गतवान् सुरोत्तमः ॥ २५० ॥
ग्राहग्रस्तं गजेन्द्रं च तं ग्राहं च जलाशयात् । उद्धहत्प्रमेयात्मा तरसा मधुसूदनः ॥ २५१ ॥
जलस्थं दारयामास नक्रं चक्रेण माधवः । मोचयन्मत्तमातङ्गं पाशेभ्यः शरणागतम् ॥ २५२ ॥
आसीद्गजः पुरा पाण्ड्य इन्द्रद्युम्न इति श्रुतः । एकदा मनसोन्योन्यो बभूव ध्यानतत्परः ॥ २५३ ॥
यदृच्छया ययौ तत्र कुम्भजन्मा नृपांतिकम् । ध्यानास्थं स नृपो नैव मुनिं वेद समागतम् ॥ २५४ ॥
ददौ शापं मुनिर्नृपं दृष्ट्वाऽऽसनं तु नोत्थितम् । तपोमदेनमत्प्राप्तौ स्तम्भान्नोत्थितोऽसि माम् २५५ ॥
अतो भव गजो भ्रांतो मदेन विपिनेऽचिरात् । सं श्रुत्वा नृपतिः शापं च प्रणम्य पुनः पुनः ॥ २५६ ॥
विशापं प्रार्थयामास मुनिः प्राह हरेः करात् । भविष्यति विमुक्तिस्ते यदा ग्राहो धरिष्यति ॥ २५७ ॥
पुरा तत्रैव गंधर्वस्त्वप्सरोगणसंयुतः । सम्प्राप्तो जलक्रीडां कर्तुं हूहूः समागतः ॥ २५८ ॥
मघस्यघमर्पणार्थं तं दृष्ट्वा स देवलं द्विजम् । मन्वित्तं च बहिश्चेत्कर्तुंगन्धर्वः सम्यचिन्तयत् ॥ २५९ ॥
स्वयं भूत्वा जले लीनस्सम्पाद्यो स्वकरेण हि । पदं धृत्वा कर्षयनं ज्ञात्वा तमशपन्मुनिः ॥ २६० ॥
ग्राहवन्मे गृही पादौ तस्माद्ग्राहो भवान् भुवि । तेन संप्रार्थितः प्राह हरिस्यामुद्धरिष्यति ॥ २६१ ॥
एवं तौ पूर्वशापेन पतितावतिसङ्कटे । हरिमुद्धृत्य तौ ताभ्यां ययौ स्वीयस्थलं पुनः ॥ २६२ ॥


करन लगा ॥ २४६ ॥ २४६ । उस आप परार्म ग्राहसेन न होकर गजराज दुःखी और निरुत्साह हो गया ।
उस समय इस प्रकारकी परम विपत्तिको प्राप्त होकर वह श्रीहरिका चिन्तन करने लगा ॥ २४७ ॥ तदनन्तर
इन्द्रियोंका निग्रह करके उसने एकाग्र मन तथा शुद्ध अन्तःकरणसे सुवर्णके समान उत्तम एक कमलपुष्प
शूंडके अग्रभागसे पकड़कर शान्त भावसे मन ही मन जनार्दन भगवान्का आवाहन, पूजन, ध्यान तथा नैवेद्य
अर्पण करके विपत्तिसे छुटकारा पानेके हेतु स्तुतिप्रारम्भ किया ॥ २४८ ॥ २४९ ॥ उसकी स्तुतिसे प्रसन्न परमे-
श्वर सुरोत्तम भगवान् विष्णु स्वयं गरुडपर सवार होकर वहाँ आये ॥ २५० ॥ उन अप्रमेय आत्मा मधुसूदन
भगवान्ने उस ग्राह हुए गजेन्द्रको जलसे शीघ्र ही बाहर निकाला ॥ २५१ ॥ उन्होंने जलमें रहनेवाले
ग्राहका अपने चक्रसे मार डाला और शरणागत गजराजको पाशोंसे छुड़ा दिया ॥ २५२ ॥ यह हाथी पूर्व
जन्ममें पाण्ड्यवंशी इन्द्रद्युम्न नामका राजा था । एक बार उसने ध्यान करके तप करना आरम्भ किया
॥ २५३ ॥ जब वह तप कर रहा था, तभी उसके पास अगस्त्य मुनि एकाएक जा पहुंचे । ध्यानमें स्थित
राजाको मुनिके आनेका कुछ पता न था ॥ २५४ ॥ मुनिने अपने आनेपर राजाको खड़े होते न देखकर
शाप दे दिया कि तपके घमण्डसे मेरे आनेपर भी तुम खड़े नहीं हुए ॥ २५५ ॥ इसलिए शीघ्र ही तुम वनमें
मदान्मत हाथी हो जाओ । यह सुनकर राजा इन्द्रद्युम्न बारम्बार मुनिको प्रणाम करके शापसे मुक्त
होनेकी प्रार्थना करने लगा । तब मुनिने कहा कि तुमको ग्राह (मगरमच्छ) पकड़ेगा, तब प्रभुके हाथसे
तुम्हारी मुक्ति होगी ॥ २५६ ॥ २५७ ॥ उन्हीं दिनों हूहू नामक गन्धर्व विशिष्ट अप्सराओंके साथ लेकर उस
सरोवरमें जलक्रीड़ा करनेके लिए आया ॥ २५८ । उसने देखा कि उस सरोवरके जलमें खड़े होकर देवल
मुनि बहुत देरसे अघमर्षण अर्थात् सम्पूर्ण पापोंको नष्ट करनेवाले मन्त्रका जप कर रहे हैं और अभी बाहर
निकलना नहीं चाहते । तब वह उनका बाहर निकालनेका उपाय सोचने लगा ॥ २५९ ॥ तदनन्तर स्वयं
जलमें डुबकी मारकर वह अपने हाथसे उनके पाँवोंको पकड़कर खींचने लगा । यह देखकर मुनि उसको
पहिचान गये और शाप दिया- ॥ २६० ॥ तूने ग्रहकी तरह मेरे पाँव पकड़े हैं, इसलिए तू यहाँपर मगर-
मच्छ बनेगा । पुनः गन्धर्वके प्रार्थना करनपर मुनिने कहा कि श्रीहरि तेरा इस शापसे उद्धार करेंगे ॥ २६१ ॥
इस प्रकार पूर्व जन्ममें प्राप्त शापके कारण अतिशय भीषण सङ्कटमें पड़े हुए उन गन्धर्वका भगवान्ने उद्धार