भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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९६आनन्दरामायणे[ सर्गः ९

क्षुधितेनाथ तार्थ्योऽथ प्रार्थितः प्राह तं हरिः। गच्छ भक्षय पत्तिने गजग्राहकलेवरे ॥ २६३ । ययौ तार्थ्यः सरः पुण्यं तत्रभूद्भृगुशृङ्गराट् । कलेवरंतिकं प्राप्तस्त निहत्य खगेश्वरः ॥ २६४ । पदेनैकेन भृङ्गमपरेण कलेवरं । धृत्वा तार्थ्यः शुद्धदेशं भक्षणार्थमपश्यत् ॥ २६५ । तावत्क्षीरार्णवे जांबूनदवृक्षं समैक्षय सः आयासविस्तृतोच्चैस्तु सहस्रयोजनं शुभम् ॥ २६६ । तच्छाखायां विशालायां यावत्तस्थौ न पक्षिराट् । तावद्भग्नं तच्छाखा बालखिल्यास्तपोयुताः ॥ २६७ ॥ षष्टिश्च पक्षिमाहर्ष्याश्चिकालं समश्रिताः । तांस्तान्दृष्ट्वाऽन्तरिक्षे वशाय तच्छाखामथशक्तिनः ॥ २६८ । धृत्वा स्वचञ्चुना शाखां वभ्राम गगने पुनः । ततो दृष्ट्वा कश्यपं स्वतातं नत्वा व्यजिज्ञपत् ॥ २६९ ॥ वद शुद्धां मुवं मंड्य कुर्याहं यत्र भोजनम् । तदा तं कश्यपः प्राह शतयोजनसागरे ॥ २७० । लंकानाम्नी शुद्धभूमिस्तत्र त्वं कुरु भोजनम् । तत्पितुर्वचनात्तूर्णं ययौ तार्थ्यः क्षणेन सः ॥ २७१ ॥ प्रोथयोः पक्षयोः शाखां स्थाप्य तानभक्षयन्मुदा । तस्य केऽस्थिसम्भूताश्शृङ्गाणि त्रीणि चाभवन् ॥ २७२ ॥ त्रिकूट इति नाम्ना स लङ्कायां गिरिराडभूत् । तेषु शृङ्गेषु तां शाखां तार्क्ष्यः संस्थाप्य संपयौ । २७३ । बालखिल्यास्तपोऽन्ते ते ययुर्विष्णोः परं पदम् । भावात्तच्छाखाऽन्तर्गते मा लङ्कायां शृङ्गमूत्रेपु ॥ २७४ ॥ प्राप्तभूतां क्षैत्रेणेन न विदुस्तां तु राक्षसाः । लङ्काऽग्निना द्रवीभूता मर्दयन्ती शवावगान् ॥ ७५ ॥ एषात्र तद्रसेनामील्लङ्काभूर्माद्दामयी । तां दृष्ट्वा चक्रितो वेगादग्रे सीतां ययौ कपिः ॥ २७६ ॥ दृष्ट्वाऽशोके पुनः सीतां तामाह कपिकुञ्जरः । मस्कन्धमंस्थिता गममय पश्यसि जानकि ॥ २७७ । सा प्राह मोषितामन्तर्मा रामो न सहिष्यति । नीत्वा पुनर्मुद्रिकां त्वं राघवाय समर्पय ॥ २७८ ॥


किया और दोनोंको साथ लेकर अपने धाम पधारे । २६२ तदनन्तर भूख सहन्त श्रीहरिसे आहारकी प्रार्थना की । श्रीहरिने कहा कि जाओ, सरोवर के तटपर पड़े हुए गज ग्राहके शरीरको खाओ । २६३ ॥ गरुड वहां गये तो उन कलेवरोंके पास भृगु नामक एक गृध्रराजको देखा । दशन दो पक्षिराज हंस गरुड़ने उसे मार डाला । २६४ । तत्पश्चात् एक टांगमे शृङ्गको तथा दूसरी टांगस गज ग्राहक शरीरोको पकड़कर उन्हें खानेके लिए कोई शुद्ध स्थान खोजने लगे । २६५ । इतनेमे गरुडको क्षीरसागरमे एक जाम्बूनद ( सुवर्ण ) का वृक्ष दिखाया दिया । वह लम्बाई चौड़ाई तथा ऊंचाईमे हजार योजन परिमाणवाला था और देखनेमे बड़ा ही सुन्दर लगता था ॥ २६६॥ पक्षिराज गरुड जाकर ज्यों ही उसकी एक शाखापर बैठे, वैसे ही उसकी वह शाखा टूट पड़ी । उसके टूटनस उसपर बहुत कालमे रहनवाले साठ हजार बालखिल्य ऋषि अधोमुख होकर गिरने लगे उनकी यह दशा देखकर पक्षिराज गरुडके मनमे ऋषियोंके शापकी शंका समा गया ॥ २६७ ॥ २६८ ॥ अतएव उस शाखाको चोंचमे पकड़कर वे आकाशमे फिर भ्रमण करने लगे । तभी उन्हें अपने पिता कश्यप दिखायी पड़े। तब नमस्कार करके उनसे निवेदन किया -॥ २६९ ॥ आप कई ऐसी पवित्र जगह बतलाइये, जहाँ मैं भोजन कर सकूँ । तब कश्यपने कहा कि सौ योजन विस्तृत लंका नामकी विशुद्ध भूमि है, वहाँ जाकर तुम भोजन कर सकते हो । अपने पिताका बात अनुमार करके गरुड क्षणभरमे लङ्का जा पहुंचे ॥ २७० । ॥ २७१ ॥ बालखिल्य ऋषियों सहित शाखाको अपनी ऊँची पाँखॉपर धरे हुए वे आनन्दसे उन मृत शरीरों- को खाने लगे, जिन्हें पंजोंमे पकड़ लाये थे । उन गज ग्राह तथा गीधके शरीरसे निकली हुई हड्डियोंसे वहाँ तीन बड़े भारी शिखर खड़े हो गये ॥ २७२ ॥ उन तीनोका लङ्कामे पवनराज त्रिकूट नाम पड़ गया । गरुड़ने उन्हीं शिखरोपर उस शाखाको रख दिया और चले गये ॥ २७३ ॥ वहीपर तपस्या पूरी करके वे बालखिल्य ऋषि विष्णूके परम पदको प्राप्त हो गये । लंकाम उन शिखरोक मध्यमे स्थित शाखा पाषाणके समान हो गया था । इसी कारण राक्षस लोग उसे नहीं पहचान पाये थे । जब हनुमानने लङ्काको अग्निसे जलाया, तब वह द्रवित होकर राक्षसोंका मर्दन करती हुई गिर पड़ी । उसके रससे लंकाकी भूमि सुवर्णमयी हो गयी । यह लीला देखकर हनुमान् चकित हो गये और शीघ्र ही सीताके समीप आये ॥ २७४-२७६ ॥ अशोकवनमे सीताको पूर्ववत् स्थित देखकर कपिकुञ्जर हनुमान् सीतासे बोले हे जानकी ! आप मेरे कन्धे-