भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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१०४आनन्दरामायणे[सर्गः १०

तत्रागत्याथ मां नत्वा रामकार्यं न्यवेदयत् । तच्छ्रुत्वाऽथ मया देवि राघवाय हनूमते ॥७४॥
द्वे लिङ्गे अर्पिते श्रेष्ठे ततोऽहं कपिमब्रुवम् । मयाऽपि दक्षिणे गंतुं पूर्वमेव विनिश्चितम् ॥७५॥
अगस्तिना विशेषेण यास्यामि राघवाज्ञया । एवं तद्वचनं श्रुत्वा मारुतिः प्राह मां पुनः ॥७६॥
कदा विनिश्चितं पूर्वं त्वयाऽत्र कुम्भजन्मना । तत्सर्वं मां वदस्वाद्य कृपां कृत्वा ममोपरि ॥७७॥
तन्मारुतिवचः श्रुत्वा ततोऽहमब्रुवं कपिम् । मारुते त्वं शृणुष्वाद्य पूर्ववृत्तं वदामि ते ॥७८॥
कदाचिन्नारदः श्रीमान्स्नात्वा श्रीनर्मदांऽभसि । श्रीमदोंकारमभ्यर्च्य सर्वदं सर्वदेहिनाम् ॥७९॥
व्रजन्विलोकयांचक्रे पुरो विन्ध्यं धराधराम् । संसाराघप्रसन्हारि रेवावारिपरिकृतम् ॥८०॥
रूपद्वयेन कुर्वन्तं स्थावरेण चरेण च । माभिख्येन यथार्थाख्यामुर्व्वरीमुर्व्वरीनिमाम् ॥८१॥
अथ तं नारदं दृष्ट्वा विन्ध्यः प्रत्युज्जगाम सः । गृहमानाय विधिवत्पूजयामास सादरम् ॥८२॥
गतश्रममथालोक्य बभाषेऽवनतो गिरिः । अद्यमद्यः परितृप्तस्त्वदंघ्रिरजसा मम । ८३॥
त्वदङ्गमणिमहसा महमाप्याततं तमः । मङ्गलार्थकरं चाद्य सुदिनं चाद्य मे मुने । ८ ॥
प्राक्तनैः सुकृतैरद्य फलितं मे जिगमिषोः । धराधरत्वं कुलिषु मान्यं मेऽद्य भविष्यति ॥८५॥
इति श्रुत्वा तदा किंचिदुच्छ्वस्य स्थितवान्मुनिः । पुनरुचे कुलिवरः सश्शमापन्नमानमः ॥८६॥
उच्छ्वासकारणं बदन् वद्दि सर्वाथकोविद । त्वाहं मार्जयाम्यद्य हृत्स्थेदं क्षणमात्रतः ॥८७॥
धराधराणामसमर्थ्यं मेत्रादीन् पूर्वपूरुषैः । दध्यंते समुदायानदहमेको दधे धराम् ॥८८॥
गौरीगुरुत्वाद्विमवात्राधिपत्याच्च भूसुताम् । सम्बन्धिन्वात्पशुपतेः स एको मानभूत्सताम् ॥८९॥
न मेरुः स्वर्णपूर्णत्वाद्वन्मानुनयाऽथवा । सुग्यङ्गतया वाऽपि कापि मान्यो मतो मम । ९०॥


आकाशमार्गसे ( पिछली ) वाणाशा ( काशां ) नगरीमे आया ॥ ७३ ॥ वहाँ आकर उन्होंने मुझको नमस्कार करके रामके कार्यके लिये निवेदन किया । हे देवि ! उस निवेदनको सुनकर मैने रामके लिए हनुमान्‌को दो उत्तम लिग दिये और कहा कि हे कपि ! मैन भी दक्षिण दिशाम जानका बहुत दिनाम निश्चय कर रक्खा है । ७४ ॥ ७५ ॥ यह निश्चय अगस्त्य मुनिक साथ हुआ था । पर बादमें सोचा कि जब विशेष-रूपसे रामकी आज्ञा होगी तभी जाऊँगा । मेरे मुखस यह सुनकर मारुतिने मुझसे फिर प्रश्न किया— । ७६ ॥ आपने पहिले कब और कहाँपर कुम्भजन्म ( अगस्त्य ) क साथ यह निश्चय किया था । यह सब हाल कृपा करके कह ॥ ७७ ॥ मारुतिकी बात सुनकर मैन कहा हे मरुते ! मै तुमको पूर्ववृत्तान्त बताता हूँ, सुनो ॥ ७८ ॥ एक समय श्रीमान् नारदमुनि नर्मदा नदीक पवित्र जलमे स्नान करके समस्त देहधारी प्राणियोंको सब कुछ देनेवाले ओंकारेश्वर शिवकी पूजा करके जा रहे थे । रास्तेमे संसार भरके पापको दूर करने-वाला तथा रेवाके जलसे परिकृत विन्ध्यपवंत सामने दिखाई दिया ॥ ७९ । ८० ॥ वह स्थावर तथा जंगम इन दो रूपोसे इस वसुमती पृथ्वोको यथार्थ नाम प्रदान कर रहा था । ८१ ॥ नारदको देखकर वह पर्वत सामने आया तथा उन्हे अपन घरपर ले जाकर सादर विधिवत् पूजन किया ॥ ८२ ॥ नारदजीका श्रम दूर हो जानेपर विन्ध्याचल विनम्र होकर कहने लगा कि आपके चरणरजसे मेरा पापपुञ्ज नष्ट हो गया ॥ ८३ ॥ हे महामुने ! आपके दैहिक तेजके संगसे अन्तःक मनोव्यथा पैदा करनेवाला मेर हृदयका अन्धकार दूर हो गया । आज मेरे लिए बडा शुभ दिन है ॥ ८४ । चिरकालसे उपार्जित मेरे प्राकृत पुण्य आज सफल हो गये । आजसे मै पर्वतोमें माननीय पर्वत माना जाऊँगा । ८५ ॥ यह सुनकर मुनिने कुछ लम्बी साँस ली । यह देखा तो घबराकर पर्वतने कहा हे सब अर्थोको जाननेवाले ब्रह्मन् ! इस उच्छ्वासका क्या कारण है ? आपने हृदयका खेद मै क्षणभरमे मार्जित कर दूंगा ॥ ८६ ॥ ८७ ॥ पूर्व पुरुषोंने मह आदि सब पर्वतोंको मिलाकर पृथ्वोको धारण करनेमें समर्थ बतलाया है, पर मैं अकेला ही उसको धारण कर सकता हूँ ॥ ८८ ॥ यद्यपि गौरीका पिता होनेसे पर्वतोका अधिपति होनेसे तथा पशुपति शिवका सम्बन्धी होनेके कारण केवल हिमालय ही सज्जनोंके मानका पात्र है ॥ ८९ ॥ मेरी समझमें तो सोनेसे भरा हुआ तथा रत्नमय शिखरोंवाला