भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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१०६ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः १०


ततः सुरा विधेर्वाक्यादगस्तिं तन्निषेधतुम् । प्रार्थयामासुरात्रेय स मुनिर्विकलोऽभवत् ॥१०८॥
तदाऽगस्तिर्मयोक्तः स गच्छ त्वं दक्षिणां दिशम् । वाक्यान्मे गिरि बद्ध्वा मा खिद त्वं मरुत्प्रभाम् ॥१०९॥
अहमप्यचिरेणैव तत्र सिद्धास्तवे सेतौ श्रीराघवार्थं यास्यामि दक्षिणां दिशम् ॥११०॥
इति मद्बचनं श्रुत्वाऽगस्तिर्मुष्टमनास्तदा । मुक्त्वा काशीं ययौ विन्ध्यं लोपामुद्रामन्वितः॥१११॥
तमगस्त्यं सपत्नीकं दृष्ट्वा विन्ध्योऽतिकम्पितः । अतिखर्वनरो भूत्वा निनिंसुरवनीमिव ॥११२॥
आज्ञाप्रसादः क्रियतां किं करोमोति चाब्रवीत् तद्विन्ध्यवचनं श्रुत्वाऽगस्तिः प्राह च सादरम् । ११३॥
विन्ध्य साधुरसि प्राज्ञो मां च जानासि तत्त्वतः । पुनरागमनं चैन्मे तावत्त्वं त्वंतरो भव ॥११४॥
इत्युक्त्वा दक्षिणामाशामगस्तिः स ययौ तदा । वेपमानो गिरिः प्राह पुनर्जन्यमाद्य मेऽभवत् ॥११५॥
उच्छ्रिते द्वात्रिंशाब्दैः स मुनिं पश्यति दक्षिणे । नागमं तं मुनिं दृष्ट्वा पुनः खर्वोऽवनिष्ठिते ॥११६॥
अद्य श्वो वा परश्वो वा ह्यागमिष्यति वै मुनिः । इति चिन्तन्महाभागो गिरिर्ज्ञाताववस्थितः । ११७॥
मासापि मुनिशतानि नाद्यापि गिरिरागवे । अगस्त्येऽपि च तत्काले कालज्ञाऽबालकाल्पयत् ॥११८॥
जगत्स्वास्थ्यमवापोर्ध्वं पूर्ववद्भानुमन्वरैः । स मुनिर्दण्डके गत्वा मद्ध्वयं सम्प्रणच्छति । ११९॥
करोति मन्प्रतीक्षां च तस्माद्यास्याम्यहं कपे । इत्युक्तो मारुतिः काश्यां मया देवि विसर्जितः ॥१२०॥
जगामाकाशमार्गेण शीघ्रं गर्वं स मारुतिः । किंचिद्रर्वममाविष्ठो लिंगद्वयसमन्वितः ॥१२१॥
दृष्ट्वै तद्गर्वतो ज्ञात्वा सुग्रीवादीन् उचेऽब्रवीत् । मुहूर्त्तानिक्रमे सेतुर भविष्यति मनावहम् ॥१२२॥
कृत्वा लिंगं सैकतं च सेत्वादौ स्थापयामि वै । इत्युक्त्वा वानरान् सर्वान्मुनिभिः सनिषेचितः ॥१२३॥


की देखकर वा आकाशका गृह और नक्षत्र ही विद्यमान दिखायी देते थे । १०६ ।। संसारका व्यवहार, अग्निहोत्र तथा पंचयज्ञकी क्रियाओंके लोप हो जानेसे संसार क्षीण होने लगा ॥ १०७ ॥ अनन्तर ब्रह्माजीके कहनेसे देवताओने जाकर विन्ध्य पर्वतके गुरु अगस्त्य मुनिसे प्रार्थना की। तब मुनि घबराकर यहां काशीमें आये ॥ १०८ ॥ मैने (शिवजीने) अगस्त्य मुनिसे कहा कि तुम दक्षिण दिशाकी ओर जाओ, वहां जाकर विन्ध्यपर्वतको अपने बाक्यमें बांधकर निश्चिन्त भावसे मेरा भजन करना ॥ १०९ ॥ काशीत्यागसे मैं जो तुम्हारा खेद दूर करनेके लिए सेतुबन्धपर रामकी पूजा प्राप्त करनेके लिए शीघ्र ही दक्षिण प्रदेशमें आऊंगा ॥ ११० ॥ मेरे इस कथनको सुनकर अगस्त्यमुनि प्रसन्नतापूर्वक उसी समय काशी छोड़कर अपनी स्त्री लोपामुद्राके साथ विन्ध्यपर्वतकी ओर चल पड़े ॥ १११ ॥ सपत्नीक मुनिको देखकर विन्ध्याचल कंपने लगा और मानो पृथ्वीमें घुस जाना चाहता हो, इस प्रकार अतिखर्व (छोटा) रूप धारण करके बोला कि मैं आपका दास हूँ। मुझे कुछ आज्ञा देनको कृपा करें। विन्ध्यकी बात सुनकर अगस्त्य मुनि बोले- ॥ ११२ ॥ ॥ ११३ ॥ हे विन्ध्य तुम साधु, पण्डित तथा बुद्धिमन् हो और मुझे भली भांति जानते हो। अतः जबतक मैं उधरसे लौटकर पुनः यहाँ न आऊं, तब तक तुम इसी प्रकार वामनरूप नीचा सिर किये हुए रहो ॥११४॥ इतना कहकर अगस्त्य दक्षिणकी ओर चले गये। तब कम्पित होकर विन्ध्यने कहा कि आजके दिन मेरा पुनर्जन्म हुआ है ॥ ११५ ॥ बत्तीस वर्ष बाद जब उसने सिर उठाकर दक्षिणकी ओर देखा तो मुनि नहीं दिखायी दिये। तब फिर उसने वैसे ही नीचा सिर कर लिया ॥ ११६ ॥ आज, कल या परसोंतक मुनिको यहाँ अवश्य आ जाना चाहिये । इस प्रकार सोचता हुआ विन्ध्य बड़ी चिन्ता करने लगा । ११७॥ पर न वे मुनि आज तक आये और न पर्वत खड़ा हुआ । काशीमें रविका गमनवान् सूर्यके साथही वरुणने भी उसी समय अपने दण्डका क्षोभ किया । ११८॥ तब सूर्यके संचारसे जगत् पूर्ववत् पुनः स्वस्थ हुआ। वे अगस्त्य मुनि दण्डकारण्यमे जाकर मेरे वचनका स्मरण करते हुए मेरा प्रणोता कर रहे हैं, इस कारण हे कपि हनुमन् ! तू वही अवश्य जायेगा। हे देवि ! इतना कहकर मैने मारुतिको काशीसे विदा किया ॥ ११९ ॥ १२० ॥ तब मारुति शीघ्र आकाशमार्गसे रामके पास चले। उस समय मेरे दो लिंग प्राप्त करके उनके मनमें कुछ अभिमान हुआ ॥ १२१ ॥ रामने इस गर्वको जान लिया और सुग्रीव आदिसे कहा कि प्रतिज्ञाका मुहूर्त बीता जा रहा है। इसलिए मैं बालूका लिंग बनाकर सेतुके इस छोरपर स्थापित किये देता हूँ। तदनुसार सब मुनियों और