भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 128

११२ आनन्दरमायणे [ सर्गः १०


ततः सैन्ययुतो रामः सुवेलाद्रिं ययौ मुदा दिदृक्षू रावणो लङ्कामध्यारोहाद्रि शुभम् ॥२०८॥ सुवेलाद्रिं महारम्यं तरुवल्लिर्विराजितम् । ददर्श लङ्कां विस्तीर्णां रामश्चित्रध्वजाकुलाम् ॥२०९॥ चित्रप्रासादमध्वां स्वर्णप्राकारतोरणाम् । परिखाभिः शतघ्नीभिः सक्रमैश्च विराजिताम् ॥२१०॥ प्रासादोपरि विस्तीर्णप्रदेशे दशकन्धरम् । पश्यंत कपिसैन्यं तं सन्ददर्श रघूद्वहः ॥२११॥ ततो रामेण मुक्तः स शुको गत्वा दशाननम् । कपिसैन्यं दर्शयंस्त बोधयामास रावणम् ॥२१२॥ सीतां प्रयच्छ रामाय लङ्काराज्ये विभीषणम् । कृत्वा तं शरणं याहि नो चेद्रामान्न मोक्ष्यसे ॥२१३॥ तच्छ्रुत्वा रावणः क्रोधाच्छुकं धिक्कृत्य वै मुहुः । दूतैर्गेहाद्वहिः कृत्वा रामसेनां व्यलोकयत् ॥२१४॥ शुकोऽपि ब्राह्मणः पूर्वं वसिष्ठो मन्त्रवित्तमः अयजन् क्रतुभिर्देवान् विरोधो राक्षसैर्भूत् ॥२१५॥ वज्रदंष्ट्र इति ख्यातस्तदैको राक्षसो महान् मांसाद्य याचितं दृष्ट्वा मुनिना कुम्भजन्मना ॥२१६॥ शुकभार्यावपुर्धृत्वा नृमांसं समर्पयत् । तदा क्रुद्धः शुकस्तेन त्वं रक्षो भव मा चिरम् ॥२१७॥ रक्षःकृतं पुनर्ध्यात्वाज्ञात्वा तन्प्रार्थितोऽब्रवीत् । रामस्य दर्शनं कृत्वा बोधयित्वा दशाननम् ॥२१८॥ त्वं प्राप्स्यसि निजं रूपं तस्माज्जातः शुको द्विजः। सुवेलशिखरे संस्थः समऽय कपिसन्ततः ॥२१९॥ सूचनार्थं रिपुं रामोऽङ्गदं लङ्कामचोदयत् सोऽपि रामाज्ञया गन्त्वा नानानीत्युक्त्वैरस्तदा ॥२२०॥ रावणं बोधयामास सभायां लांगुलासने । संस्थितोऽभीतवद्वालितनयः स्वस्थमानसः ॥२२१ । शृणु रावण मद्वाक्यं हितं ते प्रवदाम्यहम् । सीतां सस्कृत्य सधनां प्रयच्छ राघव जवात् ॥२२२ । मयं नारायणं विद्धि विदेह्यं स्यञ्च भद्रवे । यत्पादपोतमाश्रित्य ज्ञानिनो भवसागरम् ॥२२३॥ तरन्ति भक्तिपूतास्ते दत्तो रामो न मानुषः । मद्वाक्यं कुरु राजेन्द्र कुलकौशलहेतवे ॥२२४॥

आ पहुंचे। वानरोम उत्तम असख्य वानर सुवेल पर्वतपर जा चढ़े ॥ २०६ ॥ २०७ ॥ उनके पीछे राम भी अपनी सेनाके साथ सहर्ष सुवेलागिरिपर गये। वहाँ जाकर राम लंकाको देखनेके लिए उसके एक सुन्दर शिखरपर चढ़े ॥ २०८ ॥ वह पर्वत बड़े मन हर वृक्षों तथा लताओंसे मंडित था । वहाँ रामने बड़ा विस्तृत, रंग बिरंगी ध्वजाओंसे व्याप्त, अनेक प्रकारके भवनोंसे सघन, स्वर्णके गड़ तथा तोरण युक्त खाई, बुग्गों तथा सोपानोंसे विराजित लंकाको देखा ॥ २०९ ॥ २१० ॥ वहींसे रामने एक प्रासाद ( महल ) के ऊपर विस्तीर्ण प्रदेशमें बैठकर कपिसेनाको देखते हुए दशकन्धर रावणको देखा ॥ २११ ॥ तदनन्तर रामने कैद किये हुए शुकको छुड़वा दिया उसने जाकर रावणको वानर सेना दिखायी और समझाया - ॥२१२। तुम सीता रामको दे दो, लङ्काका राज्य विभीषणको दे दो और रामकी शरणमें चल जाओ। नहीं तो राम तुमको जीवित नहीं छोड़ेंगे ॥ २१३ ॥ यह सुनकर क्रोधसे पागल रावणने शुकको बार-बार धिक्कारा और दूतोंसे बाहर निकलवाकर रामकी सेना देखने लगा ॥ २१४ ॥ शुक पहिले एक श्रेष्ठ ब्राह्मण था । उसने यज्ञ द्वारा देवताओंको प्रसन्न किया था इस कारण राक्षसों से उसका विरोध हो गया । २१५ । तदनन्तर एक दिन वज्रदंष्ट्र नामक राक्षसने अगस्त्य मुनिको शुकसे मामांस माँगते देखकर शुककी स्त्रीका रूप धरण करके मनुष्यका मांस पकाकर मुनिको परास दिया, तब मुनिने क्रुद्ध होकर शुकको शाप दे दिया कि जा, तू शीघ्र राक्षस हो जा । २१६ ॥ २१७ ॥ पुनः शुकके प्रार्थना करनेपर मुनिने ध्यान धरके देखा तो मालूम हुआ कि यह तो एक राक्षसका कृत्य है। तब मुनिने कहा-हे शुक ! तू रामका दर्शन करके और रावणको समझाकर फिरसे अपने स्वरूपको प्राप्त हो जायगा। इसी कारण अब वह शुक पुनः ब्राह्मण हो गया । इधर रामने सुवेल पर्वतके शिखरपर बैठकर बानरोंको आमन्त्रित किया और शत्रुको सूचना देनेके लिए अङ्गदको लंका भेजा। उसने जाकर रामकी आज्ञासे अनेक नीतिवाक्यों द्वारा रावणको समझाया । २१८- २२० ॥ सभामें अपनी पूँछका मोड़ा बनाकर उसपर बैठे हुए अंगदने निर्भय होकर स्वस्थ मनसे रावणको समझाते हुए कहा - ॥ २२१ ॥ हे रावण ! मैं तुमको हितका उपदेश देता हूँ, सुनो । मेरी सलाह मानो और धनसे सीताका सत्कार करके झटपट रामको दे आओ ॥ २२२ ॥ रामको साक्षात् नारायण समझो