भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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११८ आनन्दरामायणे [ सर्गः १०

न ज्ञातोऽयं मया राम प्रासादो मस्तकेन मे । उत्पाटितश्च लंकायाः समानीतस्तवांतिकम् ॥ २४१॥ पुनर्नीत्वाऽद्य लंकायामेनं संस्थापयाम्यहम् । इत्युक्त्वा परिगृह्याथ राघवस्याज्ञयाऽगदः ॥२४२॥ प्रासादं पूर्ववत्स्थाप्य लङ्कायां स ययौ पुनः । सुवेलाद्री राघवेन्द्रं नत्वा वृत्तं न्यवेदयत् ॥ २४३॥ यद्यत्कृतं तु लङ्कायां संवादं रावणस्य च । रामोऽपि श्रुत्वा तन्मवं स्निन्वा तं परिषस्वजे ॥ २४४॥ अथ श्रीगमचन्द्रोऽपि सुवेलाद्री स्थितस्तदा । लीलया चापमादाय मुमोच चोत्तमं शरम् ॥ २४५॥ तेन छत्रसहस्राणि किरीटदशकं तथा । लङ्कायां राक्षसेन्द्रस्य प्रासादे संस्थितस्य च ॥ २४६॥ चिच्छेद निमिषार्धेन कपिनां पश्यतां प्रभुः । एतस्मिन्नंतरे तत्र रामाग्रे संस्थितो महान् ॥ २४७॥ न दत्तं जानकीं श्रुत्वा रावणेनांगदाग्रतः । क्रोधेन महताविष्टः सुग्रीवः प्लवगाग्रणीः ॥२४८॥ ययावुड्डीय लङ्कायां दशार्यं राक्षसैर्वृतम् । प्रासादमध्यस्थं छत्रहीनं प्रन्यदसारमम् ॥ २४९॥ सुग्रीवो रावणं गत्वा जघान दृढमुष्टिना । पातयामास भूम्यां तं वराभिद्यमनागदः ॥ २५०॥ चक्रतुस्तौ बाहुयुद्धं तुमुलं रोमहर्षणम् । उच्चांघ्रिकग्पृष्ठस्तैः कर्णाक्षशलतोरुभिः ॥२५१॥ तदासीज्जर्जरोगंङ्गः स रावणः कपिघाततः । दुद्रुवे बाहुयुद्धं हन्त्यक्त्वा गेहं विलज्जितः ॥ २५२॥ तदाऽऽच्छिद्य तन्मुकुटं ययौ रामं कपीश्वरः । नत्वा राघवं भक्त्या वृत्तं सर्वं न्यवेदयत् ॥ २५३॥ तं समालिङ्ग्य रामोऽपि सुग्रीवं प्राह सादरम् । मामपृष्ट्वा कथं बन्धो गतस्त्वय दशाननम् ॥ २५४॥ त्वज्जीवितं विपन्नं चेत्तर्हि किं सीतया मम । भविष्यति न सौख्यं हि मंद्रशं साहसं कुरु ॥ २५५॥ ततो भेरीमृदंगार्धैर्वाद्यंस्ते वानरोत्तमाः । लङ्कां व्येष्टयामासुश्चतुर्दारिषु संस्थिताः ॥ २५६॥ तदा तं मुकुटं रामोऽङ्गदाय रावणस्य च । ददौ तुष्टो दशेशाय लङ्कां रोद्धुं प्रनोदयन् ॥ २५७॥

बोले-॥ २४० ॥ हे राम ! मुझे तो इस बातका पता भी नहीं था कि मेरे मस्तकपर मकान है और लंकासे उखड़कर यहाँ आपके पास तक चला आया है ॥ २४१ ॥ मैं इसको फिरसे जाकर लङ्कामें रख आता हूँ । इतना कह और रामको आज्ञा पाकर अंगद तुरन्त लौटे ॥ २४२ ॥ वे उस प्रसादको पूर्ववत् लङ्कामें रखकर पुनः रामके पास आ गये और नमस्कार करके सब वृत्तान्त निवेदन किया ॥ २४३ ॥ लङ्कामें जाकर उन्होंने जो कुछ किया था और रावणके साथ जो संवाद हुआ था, वह सब रामसे कहा। सो सुनकर रामने उनको हृदय- से लगा लिया ॥ २४४ ॥ तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजीने मुवेलाद्रिपर खड़े होकर लाघवपूर्वक एक उत्तम बाण धनुषपर चढ़ाकर छोड़ा ॥ २४५ ॥ उससे लंकाके महलपर स्थित राक्षसेश्वर रावणके दसों मुकुट तथा हजारों छत्र कटकर क्षणभरमें वानरोंके समक्ष आ गिरे। इतनेमें रामके आगे खड़े सुग्रीवने जब अंगदके मुखसे यह सुना कि रावण सीताको देनेके लिये तैयार नहीं है। तब अत्यन्त कुपित होकर वानरोमें अग्रणी सुग्रीव उड़कर लंकामें वहाँ जा पहुँचे, जहाँ कि महलपर छत्र तथा किरीटोंरहित अत्यन्त व्यग्र मनसे रावण बैठा था ॥ २४६-२४९ ॥ वहाँ जाकर सुग्रीवने रावणको जोरसे एक मुक्का मारा। जिससे दशानन सिंहासनसे जमीनपर गिर पड़ा ॥ २५० ॥ तदनन्तर कपीश सुग्रीव तथा राक्षसेश्वर रावणका आपसमें घोर मल्लयुद्ध होने लगा। वे एक दूसरेको उठा-उठाकर चित-पट करने लगे। जिससे कि उनके हाथ-पाँव तथा छाती शृंग निर्मम प्रहारके कारण बड़ी चोट लगती थी ॥ २५१ ॥ अन्तमें सुग्रीवकी मारसे रावणके सब अंग जर्जरित हो गये । तब रावण बाहुयुद्ध करके लज्जाके मारे घरमें भाग गया ॥ २५२ ॥ उस समय उसका मुकुट छीनकर कपीश्वर सुग्रीव रामके पास आ गये और भक्तिपूर्वक नमस्कार करके सब समाचार कहा ॥ २५३ ॥ रामने आदरके साथ सुग्रीवका आलिंगन किया और कहा- हे बन्धो ! तुम मुझसे बिना कहे चुपकेसे रावणके साथ युद्ध करने क्यों चले गये ? ॥२५४॥ कहीं तुम्हारे प्राण संकटमें पड़ जाते तो हम सीताको पा करक भी कौनसा सुख भोगते ? अबसे कभी ऐसा साहस नहीं करना ॥ २५५ ॥ बादमें नगाड़ा मृदंग तथा तुरही आदि बाजे बजाते हुए सब वानरयोद्धाओंने लंकाको घेर लिया और चारों दरवाजोंको रोककर खड़े हो गये ॥ २५६ ॥ सत्यवान् रामने वह रावणका मुकुट प्रसन्न होकर सेनापति अंगदको दे दिया और लंकाको घेरनेके लिये