श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 136, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें१२० आनन्दरामायणे [ सर्गः ११
बाणहस्तं तमालोक्य हुङ्कारं विधाय सः। नैवायं राघवश्चेति मन्त्वा ध्यान्त्वा शुभं हृदि ॥६५॥ भरतं मारुतिः प्राह रामदूतोऽह्य मे बलम् । पश्यस्वि त्यं तद्विर ता श्रुत्वा तं भरतोऽब्रवीत् ॥६६॥ बंधुना मम रामेण कुतो वह समागमः । क्व जात मतिस्तार दंडकारण्यवासिना ॥६७॥ तत्सर्वं मारुतिर्वृत्तं सञ्चाख्य राघवस्य तु । भरतेनेषुणा दत्तं गिरिं धृत्वा ययौ पुनः ॥६८॥ लङ्कां गन्त्वा स वह्निभिश्ची रयाम्य लिक्ष्मणम् । वानरांश्च भरतस्य रामं वृत्तं न्यवेदयत् ॥६९॥ पुनर्नीत्वा यथास्थानं तं संस्थाप्य महाचलम् । लक्ष्मणो जीवितश्चेति संभाव्य भरतं पुनः ॥७०॥ ययावाकाशमार्गेण लङ्कां गन्तुं मनो दधे । नृपानाकारयामास साकेते भरतोऽपि सः ॥७१॥ साहाय्यार्थं राघवस्य लङ्कां गन्तुं मनो दधे । ततः समापायार्भीनो रावणः प्राह राक्षसान् ॥७२॥ गच्छध्वं त्वरित दूताः पाताले तौ महाबलौ । ऐरावणो महातुष्टस्तथा मैरावणो महान् ॥७३॥ तयोर्मे कथनीयं हि युद्धवृत्तं वयस्ययोः । तथेति ते गता दूतास्तौ तद्वृत्तं न्यवेदयन् ॥७४॥ तौ श्रुत्वा विह्वलात्मानौ लङ्कायां समरस्थितौ रामं च लक्ष्मणं हंतु निशायां तौ समागतौ ॥७५॥ तदर्थन्तुस्तौ पुच्छस्य परिधं हि हनूमतः । कपीनां तत्र सेनायास्तदाकाशत्सहस्रशौ ॥७६॥ निपेततुः कपानां तु सेनायां रामलक्ष्मणौ कांचिन्निद्रितौ दृष्ट्वा शिलायां मणरक्षमन् ॥७७॥ निन्यतुस्तौ शिलीं शीघ्रमपाताल निजमन्दिरम् एतस्मिन्नन्तरेऽदृष्ट्वा सेनायां रामलक्ष्मणौ ॥७८॥ मारुतिः पादमार्गेण तयोः पातालमाययौ । एतस्मिन्नन्तरे मार्ग लङ्कादक्षिणदिक्कटे । ७९ । निकुंभिलायां श्वपनिं कपोती प्राह गृहिणी । नाथाय नरमांसं मे भोक्तुं स्पृहयते मनः ॥८०॥ स प्राहाद्य ममानति वर्तते रामलक्ष्मणौ । रसातलं हि दैत्याभ्यां देव्यग्रेतौ वधिष्यतः । ८१॥ अथ श्वस्तद्वधे जाते मांसमानीय तेऽर्पये । तद्वाक्य मारुतिः श्रुत्वा किंचित्तोषणुतो ययौ ॥८२॥
और तेज बाण धनुषपर चढ़ाया ॥ ६४ ॥ उनको हाथमें बाण लिये देख मारुति धू-भू करके मनमें यह सोचकर कि ये राम नहीं हैं ॥ ६५ ॥ भरतसे बोले कि 'मैं रामका दूत हूँ । आज तुम देख लो।' उनका यह वाक्य सुनकर भरतने कहा ॥ ६६ ॥ दण्डकारण्यवासी मेरे भाई रामके साथ तुम्हारा समागम कहाँ हुआ ? सो विस्तारपूर्वक कहो । तब मारुति भरतका सब हाल सुनाकर भरत द्वारा दिये हुए उस पर्वतको वृक्ष उठाकर चल पड़े ॥ ६७-६८ ॥ लङ्कामें जा तथा वह्निदीर्घ लक्ष्मण तथा वानरोंको जीवित करके उन्होंने रामको भरतका समाचार कह सुनाया ॥ ६९ ॥ फिर पहाड़ ले जाकर लङ्कासे उस को उसके स्थानपर रख आये और भरतको लक्ष्मणक जीवित हो उठनेका शुभ समाचार भी सुना दिया । ७० । इतना काम करके हनुमान् पुनः बड़ी तेजीके साथ लङ्कामें लौट आये । उधर भरतने भी ध्यान सब राजाओंको एकत्र करके लङ्कामें जाकर रामकी सहायता देनेका विचार किया । तभी संग्राम और रावणने भी राक्षसोंको बुलाकर कहा- ७१ । ७२ । हे दूतो ! तुम लोग शीघ्र पातालमें जाकर वहाँ बलवान् महान् उग्र ऐरावण तथा महाश्रु मैरावण इन दोनों मेरे मित्रोंको यहाँके युद्धका समाचार बताओ । 'तथास्तु' कहकर वे दूत वहाँ गये और उन दोनोंको सब वृत्तान्त निवेदन कर दिया । ७३ ॥ ७४ ॥ यह सुनकर वे दोनों बड़ी आतुरताके साथ लङ्कामें आ पहुँचे और रात्रिके समय समनरक्षणाका हरण करनेके लिय रामके शिविरम गये ॥ ७५ । वहाँ उन दोनोंने वानरोंकी सेनाके चारो ओर हनुमान्की पूंछका बना हुआ दुर्गम परिघ देखा । तब महाबलात् उन दैत्योने आकाश मार्गसे कूदकर कपियोंका सेनामें प्रवेश किया । वहीं राम-लक्ष्मणजीको एक शिलापर युद्धश्रम थककर सोए हुए देख उन दोनोने उस शिला समेत रामलक्ष्मणको उठा लिया और पातालमें ले गये। रास्तेमे लङ्काके दक्षिण किनारे निकुम्भिला गुफामें स्थित एक गर्भवती कपोतिनी अपने पतिसे कह रही थी कि हे नाथ ! आज मुझे नरमांस खानेकी इच्छा हो रही है ॥ ७६-८०। पतिने कहा-आज दो दैत्य राम-लक्ष्मणको रसातलमें ले आये हैं । ये दोनों देवीके सम्मुख मारे जायँगे ॥ ८१ ॥ कल उनका वध हो जानेपर मैं