श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 137, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः ११ ] सारकाण्डम् १२१
तावद्ददर्श तद्द्वारे संस्थितं मकरध्वजम् । स दृष्ट्वा तं हनुमन्तं पप्रच्छ मकरध्वजः ॥८३॥
कस्त्वं कुतः समायातः स्ववृत्तं प्राह मारुतिः । रामदूतस्तु लङ्कायाश्चानीतौ रामलक्ष्मणौ ॥८४॥
निद्रितौ निशि दैत्याभ्यामत्र पातालमध्य हि । तयोः शोधार्थमायातोऽस्मि वेत्सि वदस्व तौ ॥८५॥
तन्मारुतिवचः श्रुत्वा स प्राह मकरध्वजः । पिता मे वर्तते तत्र स्वेदेनार्जनिसंभवः ॥८६॥
तच्छ्रुत्वा चकितः प्राह हनुमान् मकरध्वजम् । हनुमतः कुतः पत्नी सोऽब्रवीन्मारुतिं पुनः ॥८७॥
लङ्कादाहे पुरा कृत्वा सागरे शीतलं कृतम् । यदा पुच्छं मारुतिना तदा तद्घर्मस्रुतिनात् ॥८८॥
कण्ठाच्छ्लेष्मा बहिष्पक्तः सागरे सोऽपतत्तदा ।
मकर्या भक्षितः सोऽपि तस्यां जातः सुतोऽस्म्यहम् ॥८९॥
तच्छ्रुत्वा मारुतिः प्राह सोऽयमेव न संशयः । तदा ननाम पितरं तथा वृत्तं न्यवेदयत् ॥९०॥
कामाक्ष्याश्च बलिं कर्तुं निश्चितौ पूर्वमेव हि । तवाननेतुं यद्योद्युक्तौ लङ्कां गत्वा सुरोत्तमौ ॥९१॥
यः कामाक्ष्याः पुरः कर्तुं तयोर्दानं विनिधितम् । गच्छ देवालये गत्वा तत्र स्थित्वा हरस्व तौ ॥९२॥
ततः स मारुतिर्गत्वा भ्रमरार्भकरूपधृक् । देवालये प्रविश्याथ कपाटानि बबन्ध सः ॥९३॥
तावद्देव्यौ महाकाली पूजार्थे द्वारि संस्थिता । शनैर्देव्याः स्वरेणैव मारुतिस्तां वचोऽब्रवीत् ॥९४॥
पूजा कार्या मयास्यैव मयैतौ रामलक्ष्मणौ । वनोद्भवैः फलैः पुष्पादितिभिः सम्यक् प्रपूजितौ ॥९५॥
धृतकोदण्डतूणीरौ वन्यगुल्मैश्च शोभिनौ देवालस्यस्य किंचिद्धि द्वारमुद्घाट्य वै शनैः ॥९६॥
मनुष्यार्थं प्रेषणीयायत्र सामग्र्य मानयी येन केन प्रकारेण यो मामद्य प्रपश्यति ॥९७॥
भविष्यति निश्चयेन सोऽन्धो नान्येथ संशयः । तद्देव्या वचनं श्रुत्वा ताहां ज्ञात्वाऽम्बिकां मुदा ॥९८॥
कर लिए नरमांस ला दूंगा। इस बातको सुनकर मारुति फलसंतुष्ट होकर आगे बढ़े ॥८२॥ आगे जाकर उन्होंने उसके द्वारपर मकरध्वजको देखा। तब मकरध्वजने मारुतिको पकड़ लिया और पूछा-॥८३॥ तुम कौन हो और कहाँसे आये हो ? मारुतिने अपना परिचय दिया कि मैं रामका दूत हूँ। सोते हुए राम-लक्ष्मणको इस दुष्ट दैत्य उठाकर इसी पातालमें आज ही ले आये हैं। मैं उन दोनोंकी खोज करते यहाँ आया हूँ यदि तुमको उनका वृत्त पता हो तो बताओ ॥८४॥ ८५॥ मारुतिके इस वचनको सुनकर मकरध्वजने उत्तर दिया कि मेरे पिता अञ्जनीकुमार हनुमान् यहाँ पातालमें हैं ? ॥८६॥ यह सुना तो हनुमान्ने चकित होकर पूछा-अरे हनुमान्की स्त्री ही कौन सी थी कि जिससे तू पैदा हुआ ? उसने मारुतिको उत्तर दिया-॥८७॥ उस हनुमान्ने जब लङ्काको जलाकर अपनी पूंछ समुद्रमें ठण्डी की थी। उस समय उन्होंने जो श्रम जमा हुआ था उसका एक कफ जलमे थूक दिया था। उसे एक मकरीने खा लिया। बस, उसीके गर्भसे मैं उनका पुत्र हुआ हूँ ॥८८॥८९॥ यह सुनकर मारुतिने कहा कि यदि ऐसा है, तब तो मैं ही अञ्जनीपुत्र हूँ। यह बात सर्वथा सत्य है तब मकरध्वजने अपने पिता हनुमान्को प्रणाम किया और सब समाचार भी कह सुनाया ॥९०॥ उसने कहा कि जब वे दोनों असुर यहाँसे राम-लक्ष्मणको लानेके लिए लङ्का गये थे, उससे पूर्व ही उन दोनोंने राम-लक्ष्मणको कामाक्षी देवीके सामने बलिदान देनेका निश्चय कर लिया था। तदनुसार कल उन दोनोंका देवीके सम्मुख बलिदान देना निश्चित हो चुका है। अतः देवालयमे जाकर खड़े हो जाओ और वहाँसे उन दोनोंको उठा ले जाना ॥९१॥ ९२॥ तत्पश्चात् हनुमान् भृङ्गके समान छोटा रूप धारण करके देवालयमें घुस गये तथा अन्दर जाकर चुपचाप खड़े हो गये। उसी समय मारुतिने भीतरसे देवीके जैसा स्वर बनाकर कहा-॥९३॥९४॥ आज तुम लोग दूर-हीसे ही मेरी पूजा कर लो और बादमें धनुष तथा तूणीरको धारण करनेवाले राम-लक्ष्मण नामके दोनों मनुष्योंको वनफूल तथा फलों और पुष्पमालाओसे सुशोभित करके जीवित ही मेरी प्रसन्नताके लिए तनिक-सी किवाड़ खोलकर धीरेसे भीतर कर दो। कोई मनुष्य यदि आज कदाचित् तनिक भी मुझको देखेगा तो वह अवश्य अन्धा हो जायगा। देवीके इस आदेशको