श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 138, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें| १३२ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः ११ |
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ततस्तौ पूजनं दैत्यौ गवाक्षेणैव चक्रतुः। पक्वान्नपायसादीनां राशींस्तौ प्रमुमोचतुः ॥९९॥
अंभास्तृतघटांश्चापि कोटिशस्तौ मुमोचतुः । कोटिशः फलभारैश्च शशक्षेप मुमोचतुः ॥१००॥
तन्त्सर्वं भक्षयित्वा स मारुतिः प्राह तौ पुनः। किं दत्तं ग्रासमात्रं मे भोजनं क्षुधिताऽस्म्यहम् ॥१०१॥
तद्देव्या वचनं श्रुत्वा तौ दैत्यावतिविस्मितौ । दूतैर्विलुञ्च्य हट्टांश्च तथा स्वीयपुरौकसाम् ॥१०२॥
भक्षणीयपदार्थांश्चौ गिरीन्निव मुमोचतुः । राजगृहे दिषु स्वेषु यच्चद्रस्वन्त्वस्ति संचितम् ॥१०३॥
तच्चापि दूतैरानाय्य देव्यै शीघ्रं मुमोचतुः । तदा कोलाहलश्चासीत्प्रतिगेहे पुरौकसाम् ॥१०४॥
नासीच्छेषं बालकानां भक्ष्यवस्त्वप्यपि क्वचित् । ततस्तौ वन्यपुष्पायैर्मूत्तिनो रामलक्ष्मणौ ॥१०५॥
धृतकोदंडतूणीरौ द्वारेणैवार्चितौ श्रियै । तौ दृष्ट्वा मारुतिर्नत्वाऽऽलिंग्य श्रीरामलक्ष्मणौ ॥१०६॥
कपाटानि तदोद्घाट्य दैत्ययोः स व्यमंजयत् । ततो रामो लक्ष्मणेन बहिर्देवालयत्तदा ॥१०७॥
निर्गत्य शरजालैस्तौ जघान क्षणमात्रतः । सेवकान् सुहृदश्चैव तयोर्वाणैर्जघान सः ।१०८।
पुनस्तौ जीवितौ दैत्यौ पुनर्भनेन निधानितौ । शतवारं हतावेव नामीन्सुन्युन्भवोऽभवत् ॥१०९॥
ततोऽतिविस्मितो भून्वा त्वरन्त्यान्या स मारुतिः । इतस्ततो भ्रमन्पुर्यां नारीं रहसि संस्थिताम् ॥११० ।
ऐरावणभोगपन्नां पप्रच्छ मारणं तयोः । सा प्राह नागकन्याऽहं बलेनानेन धर्षिता ॥१११॥
मैरावणोऽपि मां नित्यं दुष्टबुद्धयाऽथ पश्यति । उभाभ्यामपि च क्रीडां दातुं नास्ति बलं मयि ॥११२॥
मित्रं स्वेको रिपुस्त्वेकस्त्वित्ति दुःखं तयोर्मम । अनस्तयोर्वधे तुष्टिमंम वापि भविष्यति ।११३॥
मारुते यदि रामो मां स्व स्त्रप हि करिष्यति । तर्ह्यहं कथयाम्यद्य तयोर्मृत्युर्यतो भवेत् ॥११४॥
तच्छ्रुत्वा मारुतिः प्राह यदि श्रीरामभारतः । न भविष्याति भमस्ते चंचकस्तर्हि ते पतिः ॥११५॥
सुनकर दोनों दैत्यों ने समझ लिया कि आज देवी भली भांति हमपर प्रसन्न हुई हैं ॥९५ १८॥ बादम इन्होंने गवाक्षमांत से ही देवाका पूजन किया । बताशे, मिठाई मायूपूए तथा खीर आदि भी झरोखेसे भीतर डाल दिया ॥९६॥ करोड़ों पञ्चामृतके घडे अन्दर उंइले और करोड़ो फलोके ढेर वहींसे भीतर डाल दिये ॥१००॥ वह सब खाकर मारुति पुनः उनसे कहने लगे—क्या तुमने कवलमात्र भोजन दिया है। मै तो अभी बहुत भूखी हूँ ॥१०१॥ देवीके इस वचनको सुनकर वे दोनों दैत्य बड़े विस्मयमें पड़ गये और अपने दूतों द्वारा दूकानोंका माल तथा नगरवासियोंके सब खाद्य पदार्थ सुतवाकर उसके पर्वतसदृश ढेरको भीतर डाल दिया । अपने राजगृहोंमें भी जो कुछ खाने-पीनेकी चीजें संचित कर रखी थीं, वे भी नौकरोंसे मँगवाकर देवीको समर्पण कर दीं । इसमें पुरवासियोंके प्रत्येक घरमे बड़ा भारी कोलाहल मच गया । बच्चोको खानेके लिए भी कहीं कुछ नहीं बचा । तदनन्तर कोदण्ड (धनुष) तथा तूणीर (तरकस) धारण किये हुए राम-लक्ष्मणकी वन्य पुष्पोंसे पूजा करके द्वारके रास्ते भीतर देवीको अर्पण कर दिया । उन्हें देखकर मारुतिने नमस्कार किया और उन दोनोंने हनुमान्को हृदयसे लगाया । एव हनुमान् किवाड़ खोलकर बाहर आये और उन दोनों दैत्योंको ललकारा । बादम राम-लक्ष्मण भी देवालयसे बाहर निकल आये और उन्होंने शरसमुदायकी वर्षा करके उन दोनों राक्षसोंको क्षणभरमें मार डाला । १०५-१०८ । पर वे दोनों राक्षस फिर जी गये । रामने फिर उन्हें मारा तो फिर जी गये और फिर मारा । इस प्रकार उन दोनोंको उन्होंने सौ बार मारे । परन्तु उनकी मृत्यु नहीं हुई ॥ १०९ ॥ तब चकित होकर भारती उनकी मृत्युरे उपायकी खोजमे इधर-उधर भ्रमण करने लगे तो नगरीके एक एकान्त स्थानम स्थित एगवणकी भाशयत्नी (गन्ध) को देखा और उससे उन दोनोंके मरणका उपाय पूछा । उसने कहा कि मैं एक नागकन्या हूँ। मेरे साथ ऐरावणने बलात्कार किया है ॥ ११० ॥१११ ॥ मैरावण भी मुझे कुदृष्टिसे देखता है। इन दोनोंको रतिदान देनेकी सामर्थ्य मेरेमें नहीं है ॥ ११२ । एक मेरा मित्र है और एक शत्रु है । पर उन दोनोंम मुझे दुःख ही मिलता है । अतः इन दोनोंके मारे जानेपर मुझको तो आनन्द ही होगा ॥ ११३ ॥ किन्तु हे मारुते ! यदि राम मुझे अपनी स्त्री बनायें तो मै वह उपाय बतला सकती हूँ, जिसमे कि वे दोनों मारे जा सकें ॥ ११४ ॥ यही