श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 139, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः १९ ] सारकाण्डम् १२३
भविष्यति रामचन्द्रस्त्वेत्युक्त्वा तमाह सा । अमरान्कदा पूर्वं बालैः कन्दुकपातितान् ॥११६॥ मोचयामासतुस्तौ हि तेन तुष्टाश्च षट्पदाः तावूचूस्ते युवाभ्यां हि मरणाद्रक्षिता वयम् ॥११७॥ यथा तथा युवां चापि रक्षावो मरणाद्वयम् इत्युक्त्वा ते स्थिताश्चात्र ते नीत्वाऽमृतकूपकम् ॥११८॥ तद्रक्तबिन्दून् स्पृष्ट्वा ते प्रकुर्वन्ति संजीविनौ । अमरास्ते तयोर्निद्रास्थाने सन्त्यधुना कपे ॥११९॥ कोटिशस्तान्महीपुत्रो ऽपि तान्मर्दयन्क्षणात् । तत्रैकं शरणं प्राप्तं अमरं प्राह मारुतिः । १२०॥ कुरु पावकगर्भे त्वं गतमुक्षकविम्बवत् । रन्ध्राद्रक्तभोगपरन्धाः षट्पदोऽपितथाऽकरोत् ..१२१॥ ततो निहत्य तौ दैत्यौ पुनर्बाणै रघूद्वहः । अभिषिच्य तयोः स्थाने राज्ये तं मकरध्वजम् ॥१२२॥ यावद्गन्तुं मनश्चक्रे तावन्मकरनिनंदनिनः नगरकन्यागृहं गत्वा नानाचित्रविचित्रितम् ॥१२३॥ दृष्ट्वा तां चारुवदनां सर्वा्वलङ्कारमण्डिताम् धृत्वा करेण तद्धस्तं किंचित्कृत्या स्मिताननम् ॥१२४॥ चकार मञ्चकं भग्नं स्वभारेण रघूत्तमः । ततस्तया प्रार्थितः स रामस्तां पुनरब्रवीत् ॥१२५॥ त्यक्त्वा देहं भुवि गत्वा भूत्वा ब्राह्मणकन्यका । तपस्तप्त्वा चिरं काले तृतीये मय्तु जन्मनि ॥१२६। द्वापरे द्वापरान्ते हि मम पत्नी भविष्यसि मद्रामवचनं श्रुत्वा रामाग्रेऽग्निं प्रविश्य सा ॥१२७। कन्याकुमारी नाम्नाऽसीद्दिव्यकन्याऽधियोगतः मारुतेः स्कन्धमध्योऽभूद्रामगो मुदान्वितः । १२८। राज्यं कृत्वा मन्त्रिणञ्च लक्ष्मणं मकरध्वजः । अकरोत्तु स्वस्कन्धस्थं शेषं ब्रह्माण्डधारकम् ॥१२९। ततः क्षणाज्जगामुस्तौ लंकां श्रीरामलक्ष्मणौ । श्रीरामलक्ष्मणौ दृष्ट्वा गुर्वाग्रायाश्च वानराः । १३० । नानाविध्य मुहुर्नत्वा रघूत्सोपंपूरिताः । रामोऽपि सकलं वृत्तं सुग्रीवादीन्यवेदयन् ॥१३१ ।
अवश्य मरुतिने कहा कि यदि भगवान् आज्ञा तुम्हारे ऊपर कर दें तो वह राम तुम्हारे पति बनेंगे ॥११६॥ एवं 'तथास्तु' कहकर उसने कहा कि पूर्व समयमें एक बार बालकों द्वारा वाटिका में बातपातित भ्रमरोंको इन ऐरावण-मैरावणने छुड़ा दिया था। इससे संतुष्ट होकर उन भ्रमरोंने उन दानास कहा कि तुम दोनों ने हम लोगोंका मरणसे बचाया है ॥११६॥ ११७॥ इसलिए वैसा भी होगा, हम तुम दोनोंकी मृत्युमें रक्षा करेंगे। इतना कहकर वे सब भ्रमर वहीं रहने लगे। वही ये भ्रमर ही इस समय उस अमृत लाकर उसका बिन्दुओंसे इन दोनोंके स्पर्श कराके बारम्बार सजीव कर दिया करते हैं। हे कपि ! वे भ्रमर अभी भी उन दोनोंके शयनस्थानमें विद्यमान हैं ॥११८॥ ११९॥ वे करोड़ोंकी संख्यामें हैं, तुम उन्हें मार डालो। उक्त कथनानुसार हनुमान्जीने जाकर क्षणमात्रमें उन सब भ्रमरोंको मार डाला। उनमेंसे शरणमें आए हुए एक दैत्यसे मारुतिने कहा- । १२० ॥ तुम जाकर पावकके भीतरवर्ती पलंगके भीतरमें रहकर डाकीके द्वारा पाय हुए रुधिरकी बूँदें बन्दर ही अङ्कमें स्थापन कर दो। भ्रमरने वैसा ही किया । १२१॥ बादमें राम- चन्द्रने बाणसे उन दोनों राक्षसों को मार डाला और उनके स्थानमें गुजरातनगर मकरध्वजको अभिषिक्त कर दिया ॥ १२२ ॥ इतना करके इन्द्रादिने उस ही बङ्गाल चक्रवर्ती वंशज की, ऐसे ही मूर्च्छित राक्षस प्रार्थना का कि आप नागकन्याके घर चलकर अनेक चित्र विचित्र गाथा देखें ॥ १२३॥ उसने यथा अलङ्कारसे मण्डित सुन्दर मुखवाली उस कन्याका हाथ पकड़ा तथा कुछ हँसकर उक्त पलङ्गपर बैठकर अपने भारसे उस पलङ्गको तोड़ डाला। यह सब कर लेनेके बाद उस कन्यासे प्रार्थित रामने उनसे कहा- । १२४ ॥ १२५ ॥ तू इस देहको छोड़- कर पृथ्वीपर जा । वहाँ ब्राह्मणकन्याका शरीर धारण करके बहुत कालतक तप करनेके बाद तीसरे जन्म तथा द्वापरके युगमें तू मेरी पत्नी बनेगी। रामके सुन्दर तथा मधुर वाक्यको सुनकर वह रामके सामने ही अग्निमें प्रवेश कर गयी । १२६॥ १२७ । जन्मान्तरमें वह कन्याकुमारी नामकी दिव्यकन्या होकर पृथ्वीपर उत्पन्न हुई। फिर राम मारुतिके कन्धेपर प्रसन्नतापूर्वक आरूढ हुए ॥ १२८ । मारुतिनेने मकरध्वजन भी अपने राज्यका भार मन्त्रीको सौंप दिया और ब्रह्माण्डको धारण करनेवाले शेषके अवतारस्वरूप लक्ष्मणको अपने कन्धेपर बैठा लिया ॥ १२९ ॥ इस प्रकार दोनों भाई राम-लक्ष्मण क्षणमात्रमें लङ्का जा पहुंचे। श्रीराम तथा लक्ष्मणको देखकर सुग्रीव आदि सब वानर बड़े प्रसन्न हुए और बारम्बार आलिङ्गन तथा प्रणाम करने लगे रामने भी