भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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सर्गः ११] सारकाण्डम् १२७


परिक्षेष्वपि नष्टेषु क्वाप्यदृष्ट्वा रिपोः स्थलम् । ययावुन्पाटितु क्रोधाद्धनुमान्योगिनीवटम् । १८३।।
दृष्ट्वा तां दर्शयामास वटस्थां योगिनीगुहाम् । गुहापिधानपाषाणं हनुमानाद्यघूर्णयत् ।।१८४।।
चूर्णीकृत्य गुहामध्यं मेघनादं ह्यतर्जयत् । तदा स मेघनादोऽपिन्यक्त्वा होमं त्वरान्वितः।।१८५।।
क्रोधाविष्टो रथे स्थित्वा ययौ लक्ष्मणमुखम् । शस्त्रास्त्रैः पर्वतार्थैर्मर्मभिद्भिर्निजौकभिः ॥१८६।।
चकार लक्ष्मणेनैव युद्धं तत्रातिभीषणम् । सौमित्रिरपि बाणौघै श्चमथाश्वधनुर्ध्वजम् ।।१८७।।
तद्दृढं कवचं सूतं बिभेद क्षणमात्रतः । ततः सोऽन्येन धनुषा मुक्त्वा बाणान्महद्यशः।।१८८।।
पद्भ्यामेवास्थितो भूम्यां विच्छेद कवचं रिपोः तदा क्रुद्धः स सौमित्रिर्बाणैनेद्रजितश्च हि ॥१८९॥
सशरं दक्षिणं भुजं पातयामास तद्गुरौ तदा स वामहस्तेन मेघनादोऽतिविह्वलः । १९०।।
दुद्राव लक्ष्मणं हन्तुं धृत्वा शूलमनुत्तमम् । तं चापि मार्गणैरेव सशूलं वाममप्यमुम् । १९१।।
मेघनादस्य सौमित्रिश्छित्त्वा रावणसन्निधौ । पातयामास लङ्काया तदद्भुतमिवाभवत् ॥१९२॥
तदा व्यादाय स्वमुखं रावणिर्लक्ष्मणं ययौ । लक्ष्मणेऽपि शरं दिव्यं रामनामाङ्कितं शुभम् ।।१९३।
मुमोच रघुपतीरस्य कृत्वा चिंतनमादरात् । स शरः सशिरस्त्राणं श्रीमदुज्ज्वलितकुण्डलम् ।।१९४॥
प्रमथ्येंद्रजितः कायान्पातयामास तच्छिरः ततः प्रमुदिता देवाः सौमित्रि परितुष्टुवुः १९५।
पुष्पाणि विकिरंतो वै चक्रुर्नीराजनं मुहुः गतश्रमः स सौमित्रिः शशम्बाशुपदद्रणे । १९६।।
श्रुत्वा सीता शंखनादं त्रिजटां प्रेष्य सादरम् । शुश्राव सकलं वृत्त तद्वाक्यात्प्रमुतोष मा ।।१९७॥
ततन्जन्मेघनादस्य शिरः संगृह्य मारुतिः राघवस्य दर्शयितुं त्वरयामास लक्ष्मणम् ।।१९८॥
तदा स वानरैर्युक्तोऽङ्गदस्थः सविभीषणः । नानावाद्यनिनादैश्च सौमित्री राघवं ययौ ।।१९९।।
नत्वा तं दर्शयामास मेघनादस्य तच्छिरः । तद्दृष्ट्वाऽऽलिङ्गय सौमित्रिमस्तुष्टाऽभवत्तदा ।।२००।।


वायु पी लिया और लक्ष्मणने वायव्यास्त्रसे जलको सुखा दिया ॥ १८१ ॥ १८२ ॥ उन सब घरोंके नष्ट हो जानेपर भी जब शत्रु का स्थान नहीं दिखाई दिया तो हनुमान् क्रुद्ध होकर योगिनीवटकी ओर गये वहाँ उन्हें योगिनीवटवाली गुफा दीख पड़ी, तुरन्त गुफाके द्वारपर रखे हुए पत्थरको हनुमान्ने हात मारकर चूर्ण कर डाला और भीतर जाकर मेघनादको ललकारा । तब मेघनादने भी तुरन्त होम छोड़ दिया । १८३-१८५ । तदनन्तर क्रोधके साथ रथपर सवार होकर वह लक्ष्मणके समक्ष गया और अस्त्र-शस्त्र, पर्वत तथा मर्मभेदी बाणोंसे उनको जीतनेकी इच्छासे भयानक युद्ध करने लगा । लक्ष्मणने भी अनवरत बाण छोड़कर उसके अस्त्र, रथ, धनुष, ध्वजा, सूत कवच नग सारथ्याको क्षणभरमें छिन्न-भिन्न कर दिया। तब मेघनाद भी दूसरा धनुष ले तथा नीचे ही खड़े हो दुर्धर्ष बाण छोड़कर उनके कवचको काटना लगा । इस समय लक्ष्मणने क्रुद्ध होकर अपने बाणसे इन्द्रजितका बाणके सहित दाहिना हाथ काटकर उसीके घरमें गिराया तब विह्वल होकर मेघनादने बायें हाथमें त्रिशूल सम्हाला ॥ १८६-१९० । वह उत्तम त्रिशूल लेकर लक्ष्मणको मारनेके लिए दौड़ा । तब मेघनादके त्रिशूल सहित बायें हाथको भी शक्तिपुत्र लक्ष्मणने बाणसे ही काटकर रावणके पास गिराया । यह देखकर लंकामें सबको बड़ा आश्चर्य हुआ । १९१ । १९२ । तब मेघनाद मुँह फाड़-कर लक्ष्मणकी ओर झपटा । तब लक्ष्मणने भी रामका ध्यान करके राघवास्त्रसे अंकित दिव्य बाण छोड़ा । उस बाणने जाकर पगड़ी सहित, शोभायुक्त तथा दीप्तित कुण्डलवाले मेघनादके शिरको धड़से अलग करके धरतीपर गिरा दिया । यह देखकर देवतागण अतीव प्रसन्न हुए और लक्ष्मणकी स्तुति करने लगे ॥ १९३-१९५ ॥ वे उनपर सुमनोंकी वृष्टि करके बारम्बार जयजयकार किया । तब लक्ष्मणने शान्त होकर विजयशंख बजाया ॥ १९६ ॥ यह शंखनाद सुनकर सीताने त्रिजटाको भेजा और उसके मुखसे युद्धका सकल समाचार सुनकर वे बहुत ही प्रसन्न हुईं ॥ १९७ ॥ इधर हनुमान्जीने मेघनादका सिर लेकर रामको दिखलानेके लिये लक्ष्मणसे शीघ्र चलनेको कहा ॥ १९८ ॥ तब लक्ष्मण विभीषण और वानरोंके साथ से तथा अङ्गदके कन्धेपर सवार होकर अनेक बाजे-गाजेके साथ रामके पास गये ॥ १९९ ॥ वहाँ जाकर लक्ष्मणने रामको प्रणाम किया और