भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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१२६मानन्दरामायणे[ सर्गः ११

इत्युक्त्वा त्वरितं गत्वा मेघनादो निकुम्भिलाम् । रक्तमाल्याम्बरधरो हवनायोपचक्रमे ॥ १६५ ॥
रथार्थं दिव्यशस्त्रार्थं जयार्थमभिचारकैः योगिनावट्वाधोभूम्यां गुहायां संस्थितो रहः ॥ १६६ ॥
तोयानिलानलव्याघ्रसर्पराक्षसकण्टकैः आत्मनः परितः कृत्वा परिखान् सप्त दुर्गमान् ॥ १६७ ॥
होमकुण्डोर्ध्वतः सर्पं बद्ध्वा कृष्णमधोमुखम् । रक्तपुष्पांबरधरो रक्तचन्दनलेपितः ॥ १६८ ॥
रक्तपुष्पाक्षता गुञ्जा सर्षपश्चदनेक्षुभिः । खदिरप्रपलाशोदुम्बरभल्लानकास्थिभिः ॥ १६९ ॥
समिद्भिर्माषमांसादिमन्लानकफलैरपि । अर्कतिंववाजपूगकृष्णधत्तूरगोस्तनैः ॥ १७० ॥
अपामार्गवदरिकानलदालकबंधुकैः । नरमुंडैः समांसैश्च विभीतकफलादिभिः ॥ १७१ ॥
सर्पखंडैश्च मण्डूकैस्त्वग्वसास्नायुलोमभिः । नानावनेचराणां च मांसैरपि समन्त्रकम् ॥ १७२ ॥
इत्थं चकार होमं स निमील्य नयने रहः । विभीषणोऽपि तं दृष्ट्वा होमधूमं भयावहम् ॥ १७३ ॥
प्राह रामाय सकलं होमार्थं दुरात्मनः । समाप्यते चेद्धोमोऽयं मेघनादस्य दुर्मतेः ॥ १७४ ॥
स चाजय्यो भवेद्राम मेघनादः सुरासुरैः । अतः शीघ्र लक्ष्मणेन घातयिष्यामि रावणिम् ॥ १७५ ॥
यस्तु द्वादश वर्षाणि निद्राहारविवर्जितः । तेनैव मृत्युर्निर्दिष्टो मेघनादस्य दुरात्मनः ॥ १७६ ॥
लक्ष्मणोऽयं यदाऽयोध्यापुर्यांस्त्वामनुनिर्गतः । तदादि निद्राहारत्यागं प्राप्तः स रघूत्तम ॥ १७७ ॥
सेवार्थं तव राजेन्द्र ज्ञातं सर्वमिदं मया । ततो रामाज्ञया गत्वा लक्ष्मणेन विभीषणः ॥ १७८ ॥
हनुमत्प्रमुखैर्वीरैर्यथैः सर्वतो वृतः । लक्ष्मणं दर्शयामास होमस्थानं निकुम्भिलाम् ॥ १७९ ॥
अङ्गदस्कंधपारूढो वह्नयस्त्रेणाथ कंटकान् । ज्वालयामास सौमित्रिरजघान राक्षसांश्छरैः ॥ १८० ॥
गारुडास्त्रेण सर्पांश्च पर्वतास्त्रेण दंष्ट्रिणः । अनलं शान्तमकरोत्पर्जन्यास्त्रेण लक्ष्मणः ॥ १८१ ॥
प्राशयामास हनुमाननिलं क्षणमात्रतः । जलं संशोषयामास वायव्यास्त्रेण लक्ष्मणः ॥ १८२ ॥


मेरा बल देख ॥ १६४ ॥ इतना कहकर मेघनाद तुरन्त निकुम्भिला नामक पद्मिनी गुफामें गया। वहाँ लाल फूलोंकी माला तथा लाल वस्त्र धारण करके वह हवनकी तयारी करने लगा ॥ १६५ ॥ दिव्य रथ, दिव्य अस्त्र तथा जयलाभके लिए अभिचारक्रिया करनेका निश्चय करके वह गुफाके भीतर योगीनांवटक पास एकान्तमें जा बैठा ॥ १६६ ॥ उसने वहाँ अपने सुरक्षामें लिये अग्नि जल वायु सिंह सर्प राक्षस तथा कांटोंके अपने आगे और सात दुर्ग बना लिये ॥ १६७ ॥ होमकुण्डके ऊपर भागमें अधोमुख करके एक काला सर्प बांध दिया । तदनन्तर रक्त पुष्प तथा रक्तांबर धारण करके शरीरमें रक्त चन्दन लगाया ॥ १६८ ॥ लाल फूल, अक्षत, गुंजा, सरसों, चन्दन, ईख, बेर, आम पलाश तथा भल्लातकी लकड़ियां, समिधा, उर्द, मांस, भल्लातककी गुठली, आक, नीम, भोजपूर, कृष्ण धतूरा संबी, विचदा, वर, चित्रक, दालक, बंधूक, नरमुण्ड, चरबी, विभीतकफल, सर्पखण्ड, मण्डूक, चर्म, दाल, स्नायु, भात, मांस तथा नाना वनचरोंके मांस आदिस उसने मन्त्रोच्चारपूर्वक एकान्तमें हवन प्रारम्भ कर दिया, सहसा विभीषणने होमके भयानक धुएंको उड़ते देखा ॥ १६६-१७३ ॥ तब उन्होंने रामसे कहा-हविभो, उस दुरात्मान होम बारम्भ कर दिया है। यदि उस दुबुद्धि मेघनादका होम निर्विघ्न समाप्त हो गया तो फिर हे राम ! वह दैत्यों तथा देवताओंसे भी अजेय हो जायगा। इसलिए शीघ्र लक्ष्मणके द्वारा मैं उसका मरवा दूंगा ॥ १७४ ॥ १७५ । जो मनुष्य बारह वर्षतक निद्रा तथा आहारस रहित रहा हो, उसीस महान् मेघनादकी मृत्यु कही है ॥ १७६ ॥ लक्ष्मण जब अयोध्यासे निकले हैं, तबसे निद्रा तथा आहार त्यागकर इन्हान आपका सेवा का है यह मै भली भाँति जानता हूँ। पश्चात् रामकी आज्ञासे लक्ष्मण तथा हनुमान आदि वीर सेनापतियोंको साथ लेकर विभीषण वहाँ गये और लक्ष्मणको निकुम्भिला-का होमस्थान बताया ॥ १७७-१७९ ॥ वहाँ जाकर लक्ष्मणने अङ्गदके कन्धेपर सवार होकर अग्निबाणसे कांटोंको जलाकर राक्षसोंको मार डाला ॥ १८० । उन्होंने गरुडास्त्रसे सर्पों तथा पर्वतास्त्रसे दांतवाले सिंह आदि जन्तुओंका समाप्त कर दिया। उन्होंने मेघास्त्रसे अग्निको शान्त किया। हनुमान्ने क्षणभरमें